कहानी साल 1980 से शुरु होती है। इंदिरा गांधी लगभग 3 साल सत्ता से दूर रहने के बाद वापसी कर रही थीं। चौथी बार प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बैठी थीं। देश मे कांग्रेस की सत्ता थी। पार्टी की जीत से इंदिरा के घर पर खुशी का माहौल था। पर, उनकी यह खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रही। 23 जून 1980 को एक विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत हो गई। तब संजय गांधी, इंदिरा सरकार में बतौर सलाहकार काम कर रहे थे। उनकी मौत केे बाद राजीव गांधी को उनकी जगह पर लाया गया।

साल 1984, ऑपरेशन ब्लू स्टार का साल। जिससे सिखों की भावनाओं को काफी ठेस पहुंची और फिर 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी के सिख सुरक्षा गार्डों ने उनके आवास में ही उनकी हत्या कर दी।

इंदिरा गांधी की हत्या के दो महीने बाद ही लोकसभा चुनावों का ऐलान किया गया। कांग्रेस ने राजीव गांधी को अपना पीएम उम्मीदवार चुना। पर इंदिरा गांधी के बाद एक नए नवेले उम्मीदवार, जिसके पास राजनीति का उतना ज्ञान नहीं था, को देखकर बीजेपी को लगने लगा कि शायद अब उनकी राह आसान हो गई है और उन्होंने बड़े जोश के साथ चुनाव प्रचार शुरु किया। उस समय बीजेपी की पहचान के तौर पर कुछ नाम थे- अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, मदन लाल खुराना। इन्हीं में एक और नाम था, लाल कृष्ण आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी, फोटो सोर्स: ट्विटर
लालकृष्ण आडवाणी, फोटो सोर्स: ट्विटर

पहले संजय गांधी और फिर इंदिरा गांधी की मौत से कांग्रेस पूरी तरह से टूट चुकी है, ऐसा बीजेपी को लगा। लेकिन, ये दो घटनाएं कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुईं। दिसंबर 1984 में लोकसभा की 542 सीटों में से 515 सीटों पर ही चुनाव हुए थे। असम की 14 और पंजाब की 13 सीटों पर चुनाव 1 साल बाद सितंबर 1985 में हुए। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। बीजेपी मात्र 2 सीटों पर चुनाव जीत पाई थी। फिर यहीं से नई रणनीति और नई जोड़ी बनी, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की।

लालकृष्ण आडवाणी लगातार पार्टी की हार की समीक्षा करते रहे और वाजपेयी के साथ मिलकर नई रणनीतियों पर काम करते रहे। उस चुनाव के बाद नए सिरे से सोचने की ज़रुरत भी थी क्योंकि ऐसा लग रहा था कि बीजेपी का पूरा अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। लेकिन, धीरे-धीरे ही सही, आखिरकार साल 1998 का समय आता है और बीजेपी पहली बार सत्ता में जीत दर्ज करती है। फिर शुरु होती है, पीएम बनने की होड़।

ये भी क्या जोड़ी थी, फोटो सोर्स: गूगल
ये भी क्या जोड़ी थी, फोटो सोर्स: गूगल

बीजेपी की तरफ से दो लोग इस दौड़ में शामिल हुए पहला नाम वाजपेयी का और दूसरा आडवाणी। इसी बीच आडवाणी कराची चले जाते हैं। वहां जाकर उन्होंने जिन्ना की भर कर तारीफ की। जब कराची से भाषण देकर वापस भारत आए तो उन्हें ऐसा लगा कि यहां कुछ बदल सा गया है। लोगों का उनको लेकर नजरिया बदल चुका था। दरअसल, बीजेपी की विचारधारा आरएसएस की बुनियाद पर खड़ी थी। आडवाणी का जिन्ना की तारीफ करना किसी को ठीक नहीं लगा।

कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि आडवाणी का पाकिस्तान जाना, जिन्ना की तारीफ करना, सब एक चाल थी। दरअसल, जिन्ना की तारीफ करके अडवाणी भारतीयों के बीच अपनी एक उदार छवि बनाने के लिए मास्टर स्ट्रोक खेले थे। लेकिन, यह मास्टर स्ट्रोक उनकी राजनीतिक जीवन को खत्म करने के लिए काफी था। पीएम के तौर पर वाजपेयी जब कुर्सी पर बैठे तो, अडवाणी को लेकर RSS में चर्चाा होने लगी थी। दरअसल, वाजपेयी के ही कार्यकाल में RSS के अंदर इस बात की चर्चा हो रही थी कि पीएम के तौर पर आडवाणी को कुर्सी पर बैठना चाहिए था। लेकिन, अब यह मौका हाथ से निकल गया था।

पीएम मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी, फोटो सोर्स: गूगल
पीएम मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी, फोटो सोर्स: गूगल

ऐसे में वाजपेयी के सबसे करीबी माने जाने वाले रज्जू भैया आगे आए। रज्जू भैया वाजपेयी के पास गए और उन्होंने कहा कि हमें लाइन में लगे दूसरों को भी मौका देना चाहिए। चूंकि रज्जू भैया जब यह बात वाजपेयी से कह रहे थे तो, उस वक्त उन्होंने खुद अपना पद छोड़ दिया था। केसी सुदर्शन, रज्जू भैया की जगह ले चुके थे। शायद इसलिए रज्जू भैया ने वाजपेयी से ऐसा कहने की हिम्मत कर ली थी। लेकिन, वाजपेयी ने कही न कही यह समझ लिया कि ये सब आडवाणी की चाल है।

इसके बाद साल 2002, गुजरात दंगा, गोधरा कांड। आडवाणी का राजनीतिक जीवन एक और करवट लेता है। लालकृष्ण आडवाणी को एक शिष्य मिलता है जो उनसे राजनीति के गुण सीखकर आगे जाना चाहता था। उस शिष्य का नाम है नरेन्द्र दामोदर दास मोदी। जिन्होंने आडवाणी को अपना गुरु मानते हुए एक पार्टी कार्यकर्ता से लेकर भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री तक का सफर तय कर लिया।

फोटो सोर्स: गूगल
फोटो सोर्स: गूगल

पर हम वापस आते हैं साल 2002 पर। नरेन्द्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। गुजरात दंगे के आरोपियों में नरेन्द्र मोदी का भी नाम शामिल होता है। तब आडवाणी ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी राजनीतिक बल और पहचान से नरेन्द्र मोदी को बचाया था। कहा जाता है कि वाजपेयी चाहते थे कि मोदी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें। लेकिन, वाजपेयी के इस विचार को बदलने में दो लोगों ने साथ दिया। पहला नाम अरुण जेटली और दूसरा प्रमोद महाजन। क्योंकि दिल्ली से गोवा जाते वक्त वाजपेयी के साथ विमान में दो लोग थे। आडवाणी तो थे ही नहीं। इन्हीं दो लोगों ने रास्ते में वाजपेयी को समझाया कि ये पार्टी के हित में नहीं है और पणजी आते-आते वाजपेयी ने मान भी गए थे।

इसी के बाद से नरेंद्र मोदी और आडवाणी के बीच एक दरार पड़नी शुरु हो गई थी। 2004 और 2009 के चुनाव ने इस दरार को और गहरा कर दिया। क्योंकि लगातार दो हार के बाद अब इस बात को लेकर भी चर्चाएं शुरु हो गई कि पार्टी की कमान किसी नए और युवा लीडर के हाथों में दी जानी चाहिए। यह चर्चा इसलिए भी शुरु हुई थी क्योंकि कांग्रेस के बीच यह सुनने में आया था कि अब पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथों में देने की तैयारी की जा रही है। ऐसे में आडवाणी को यह लगने लगा कि शायद पार्टी में अब उनको कोई जगह नहीं मिलेगी। ऐसे में इस चर्चा को उन्होंने वही दबा दिया और उस समय के कार्यकारी अध्यक्ष वेंकैया नायडू को इस्तीफा देने का आदेश दे दिया। नायडू ने इस्तीफा दिया और अडवाणी खुद उनकी जगह ले लिए। मतलब पार्टी के नए अध्यक्ष। इस बात का असर बीजेपी के सहयोगी पार्टियों पर कुछ ठीक नहीं दिखा।

2014 लोकसभा चुनाव में बनी बीजेपी की नई जोड़ी, फोटो सोर्स: गूगल
2014 लोकसभा चुनाव में बनी बीजेपी की नई जोड़ी, फोटो सोर्स: गूगल

लेकिन जब पार्टी की लगातार दो लोकसभा चुनाव में हार हुई। उसके बाद आडवाणी की छत्रछाया में बढ़ने वाले नरेन्द्र मोदी ने उनकी जगह ले ली। फिर ऐसा लगने लगा कि आडवाणी का राजनीतिक करियर खत्म हो गया है। 1991 में जिस गांधीनगर सीट पर वाजपेयी ने बीजेपी का परचम लहराया था, उस लोकसभा सीट पर साल 1998 से 2014 तक लगातार आडवाणी ने जीत दर्ज की। लेकिन, जब बीजेपी ने साल 2019 लोकसभा चुनाव में आडवाणी की जगह अमित शाह को गांधीनगर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बना दिया। अमित शाह ने इस चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी। अब यह पूरी तरह से मान लिया गया था कि आडवाणी का कद पार्टी में न के बराबर रह गया है।

एक ऐसा नेता जो किसी पार्टी को धरातल से आसमान तक ले गया हो। पर, आज पार्टी में सिर्फ आशीर्वाद देने के लिए ही मौजूद हो तो, ये बात कभी-कभी तर्कसंगत नहीं लगती है। क्योंकि पीएम मोदी हो या फिर अमित शाह सब ने यही कहा है कि हम आडवाणी जी के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में जिस पद और सम्मान के हक़दार वो खुद को मानते थे, उसके बजाय पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में बैठना शायद आडवाणी को भी अखरता होगा।