देश में बच्चें लगातार मर रहे हैं. संख्या घटने की बजाय बढ़ती जा रही है. कभी चमकी बुखार तो कभी ऑक्सिजन सप्लाई रुकना इसकी वजह बताई जा रही है. कहीं-कहीं तो हालात इतने खराब हैं कि डॉक्टर्स को बच्चों के मरने की वजह ही नहीं पता है. नेता नारे लगातें हैं बच्चे कल का भविष्य हैं. हम भी पीछे-पीछे नारे लगाते हैं बच्चे कल का भविष्य हैं. बच्चे मर जाते हैं. नेता नारे लगाना बंद कर देते हैं. नारे लगाना तो दूर की बात बच्चों पर बात करना ही बंद कर देते हैं. हम जो नेताओं के पीछे-पीछे नारे लगा रहे थे. गूंगे हो जाते हैं. क्योंकि हमारे सिस्टम में सवाल पूछना नहीं, नारे लगाना फीड कर दीया गया है. यही वजह है कि आज भी बच्चे मर रहें हैं.

दरअसल, यूपी के बदायूं में एक सरकारी अस्पताल है. इसे जिला महिला अस्पताल के नाम से जाना जाता है. इसी अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में बीते 50 दिनों के भीतर 32 बच्चों की मौत हो चुकी है. आश्चर्य की बात ये है कि ये बच्चे क्यों मर रहे हैं इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है. जब इन बच्चों को अस्पताल में भर्ती करा गया तब प्राथमिक जांच से ये तो पता चला कि वो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं लेकिन, ये बीमारी है क्या इसके बारे में अभी तक कोई कुछ पता नहीं लगा पाया है.

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जिला महिला अस्पताल बदायूं, फोटो सोर्स: गूगल

इस अस्पताल में कुल 52 बच्चे इस बीमारी से पीड़ित भर्ती कराए गए थे. जिसमें से 32 बच्चों की मौत हो गई है. वहीं 20 बच्चों को प्राथमिक इलाज के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया था.

जिला महिला अस्पताल की सुपरीटेंडेंट डॉ.रेखा रानी ने इस पूरे मामले को लेकर कहा है कि

इस महीने ज्यादा बच्चे भर्ती हुए हैं. वहीं इनमें से कई बच्चों के सारे अंग फेल हो चुके थे. जबकि करीब 20 बच्चों का इलाज करके डिस्चार्ज कर दिया गया है.

वहीं इस मामले को तूल पकड़ता देख अब जिला प्रशासन सामने आया है. बदायूं के मुख्य चिकित्सा अधिकारी मनजीत सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि भर्ती किए गए बच्चों के बचने की संभावना बहुत कम थी.

इस तरह का बयान सरकार और प्रशासन की नाकामी को दर्शाता है. इससे साफ पता चलता है कि वो कितनी निकम्मी है. अगर समय रहते बीमारी का पता लगा लिया जाता. इस बिमारी के रोक-थाम के उपाय कर लिए जाते तो शायद ये बच्चे इस तरह नहीं मरते.

स्थानीय मीडिया से ये ख़बरे सामने आ रही हैं कि बदायूं में मौसम में बदलाव के चलते बुखार और डायरिया बहुत तेज़ी से फैल रहा है. कई बच्चे इसकी चपेट में आ रहे हैं. डॉक्टर्स का कहना है कि गांवों और दूरदराज में रहने वाले लोगों ने पहले बच्चों का इलाज स्थानीय डॉक्टर्स से कराया. जब हालात काबू में नहीं आए तब बच्चों के जिला अस्पताल में लेकर आया गया. हालांकि तब तक तबीयत काफ़ी ज्यादा खराब हो चुकी थी.

यूपी में बच्चों की मौत कोई नई घटना नहीं है. ये राज्य भारत में बच्चों के मौत के मामले में सबसे ज्यादा तरक्की कर चुका है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसके लिए सम्मानीत किया जाना चाहिए. दरअसल, साल 2017 में भी गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में ऑक्सिजन की कमी से कई बच्चों की मौत हो गई थी.

इतना ही नहीं जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और एक्यूट इंसेफेलाइट सिंड्रोम (चमकी बूखार) के चलते पिछले 3 सालों में तकरीबन 678 मरीज़ों ने भी अपनी जानें गवाई हैं. इन मरीज़ों में भी सबसे ज्यादा संख्या बच्चों की है. सिर्फ यूपी ही नहीं बिहार,ओडिशा और असम में भी कई बच्चों ने इन बीमारियों के चलते अपनी जाने गवाई थी, लेकिन तब भी सरकार ने न स्थानीय प्रशासन ने इस बिमारी से बचने के लिए कोई ठोस कदम उठाया था. यही वजह है कि आज बदायू में 35 बच्चों की मौत हो जाती है. और डॉक्टर्स के पता ही नहीं है कि वो क्यों मर रहे हैं.

सोचिए आप डॉक्टर के पास अपनी बीमारी का इलाज कराने जा रहे हैं. डॉक्टर को ये पता ही न हो कि आपको बिमारी कौन-सी है. आप झल्ला जाएंगे कि इसे डॉक्टर किसने बना दिया. दरअसल, इसमें गलती न सरकार की है और न डॉक्टर्स की. इसमें गलती है आपकी क्योंकि आपने सरकार के फैसले पर सवाल उठाना छोड दिया और जो सरकार ने आपके लिए मुकर्रर कर दिया उसे सीने से लगा कर बैठे रहे.

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