केंद्रीय कैबिनेट भवन के एनेक्सी बिल्डिंग में मिटींग हुई। इस मिटींग के अध्यक्ष थे पीएम नरेन्द्र मोदी। इस मिटींग में नागरिकता संशोधन और निजी डाटा संरक्षण विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी दी गई। तभी से यह बिल चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो, वही सत्ता पार्टी के सदस्य इसका महत्व बताने में लगे हुए हैं। ये विधेयक जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था। उस वक्त देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह थे। पहले यह लोकसभा में और उसके बाद में आज इसे राज्य सभा में भी मंजूरी मिल गई।

आखिर इस बिल में है क्या?

हमारे देश में नागरिकता संसोधन बिल 1955 काम करता है। इसमें भारत की नागरिक होने के लिए शर्तों की बात कही गई है। यानि उस बिल के अंतर्गत जो भी बाते भारतीय नागरिक होने के लिए कही गई है अगर आप उसके अनुसार फिट बैठते हैं तो, आपको वो हर सुविधा दी जाएगी जो, एक भारतीय नागरिक को मिलती है। सरकार इसमें कुछ संशोधन करना चाहती थी इसलिए इसे नागरिकता संसोधन बिल भी कहा गया।भारत में जितने भी बिल अभी तक पास हुए या जिनपर चर्चाएं हो रही है उनमें से सबसे बवाल इसी बिल को लेकर हुआ है। अब इसकी वजह क्या है?

दरअसल, यह बिल सिर्फ 6 धर्मों के बारे में बात करता है- हिन्दू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध तथा पारसी। यानि जिन धर्मों के बारे में इस बिल में बात की गई है उस धर्म के लोग बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आकर भारत में नागरिकता ले सकते हैं। इस बिल में मुस्लिम धर्म के बारे में कोई बात नहीं कही गई है। इसलिए इस  बिल को लेकर बवाल मचा हुआ है। कुछ लोग इसे संविधान के विरुद्ध कहा है। उनका मानना है कि जब देश का संविधान किसी धर्म के आधार पर नहीं बना है तो, सरकार ऐसा बिल कैसे ला सकती है जो धर्म प्रधान हो। सरकार का इस बवाल पर तर्क है कि जिन तीन देशों की बात कही गई है उनमें इन धर्मों को प्रताड़ित किया जाता है।

इस बिल से भारत को क्या मिलने वाला है? 

साल 2014 के बाद से एनडीए को इस बात का एहसास हो गया है कि भारत में हिंदू वोट बैंकिंग हैं। देश से 60% हिंदू वोट है। इसलिए खासकर भाजपा हिंदू राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी भावनाओं को भूनाने की पूरी कोशिश कर रही है। लेकिन, एनडीए के कुछ राजनीतिक पार्टी जिनका वोट बैंकिंग मुस्लिम धर्म है वो, इसका विरोध कर रही है। भाजपा बखूबी जानती है कि इस बिल के आने से असम और पश्चिम बंगाल में उन्हें नुकसान होगा लेकिन,  कुछ नुक़सान से अगर अन्य राज्यों में फ़ायदा मिलता है तो यह रणनीति बेहतर मानी जाएगी।

फोटो सोर्स: ट्विटर

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पहले दलित वोट बैंक होता था, मुस्लिम वोट बैंक होता था लेकिन, अब सभी को पता है कि भारत में हिंदू वोट बैंक का सबसे मजबूत जरीया बन चुका है। यही कारण है कि इस बिल के खिलाफ कोई भी राजनीतिक पार्टी विरध नहीं करने वाली है। जिन राजनीतिक पार्टियों का वोट मुस्लिम वोट बैंकिंग के ऊपर टिका हुआ है, वह भी इस बिल के विरोध में आवाज नहीं उठाने वाली है। भाजपा को इसका मुख्य रूप से फ़ायदा पश्चिम बंगाल में होगा जहां पहले बंगाली होना ही पहचान थी. अब पश्चिम बंगाल में मामला ‘बंगाली हिंदू’ बनाम ‘बंगाली मुस्लिम’ का हो चुका है।

भारत में पहले नागरिकता पाने की अवधी 11 साल हुआ करती थी जिसे, हटाकर एक साल से 6 साल तक कर दिया गया है। यानि अगर बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से कोई आकर एक से 6 साल तक भारत में लगातार रहता है तो, उसे भारत की नागरिकता मिल जाएगी। ऐसे में इस बिल के पास होने का एक ही मकसद वोट बैंकिंग को मजबूत करना है, ऐसा विपक्ष का आरोप है।