कभी-कभी सोचता हूँ कि आखिर फिल्में भी अपने आप में एक अलग ही दुनिया हैं। बॉलीवुड हमारे समाज में इस कदर घुला हुआ-सा लगता है कि मानों फिल्में ही असली दुनिया हो। वैसे काफी हद तक़ सिनेमा समाज का आईना भी होता है।
बड़ी विचित्र-सी दुनिया है फिल्मों की। एक वो कहानी है जो लोगों के सामने पर्दे पर चलती है और बाकी की वो कई अनकही कहानियाँ जो पर्दे के पीछे चलती हैं।

वैसे बॉलीवुड की मेन स्ट्रीम फिल्मों के बीच एक फिल्म ऐसी भी आई जिसने शायद लोगों के लिए फिल्मों का मतलब ही बदल दिया। हीरो-हीरोइन और एक विलेन को लेकर बनी प्यार, इश्क़ और मोहब्बत वाली फिल्में, जो ख़यालों की दुनिया को थोड़ी देर के लिए सच कर दिया करती थी। सालों तक लोग जिनकी कहानियाँ याद किया करते थे और शायद वही फिल्मों की परिभाषा हुआ करती थी।

फिल्म निर्देशक: अनुराग कश्यप , फोटो सोर्स: गूगल

आज से सात साल पहले 2012 में आई एक फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ एक ज़बरदस्त हिट मूवी बन कर सामने आई जिसने रियलिस्टिक सिनेमा को बॉलीवुड की दुनिया में पहचान दी।

फिल्म देखने और बनाने, दोनों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए ये एक नई तरह की कहानी थी जिसके अंदाज-ए-बयां ने लोगों के दिलों में घर कर लिया। यहीं से इस फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप के करियर की बड़ी शुरुआत हुई थी।

अनुराग कश्यप की एक फोटो अपनी फिल्म के पोस्टर के साथ। फोटो सोर्स: गूगल

आज फिल्म को आए सात साल हो गए हैं। जिस पर फिल्म के डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने भी ट्वीट करके अपनी खुशी ज़ाहिर की। पर, उनके इस ट्वीट में खुशी के साथ-साथ थोड़ा दुःख भी दिख रहा है।

पहले वो ट्वीट पढ़ना ज़रूरी है जो अनुराग ने गैंग्स ऑफ वासेपुर की सातवीं सालगिरह पर लिखा है।

अनुराग ने लिखा :

“आज से ठीक सात साल पहले मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई थी। तब से हर कोई चाहता है कि मैं बार-बार वही चीज करूं। जबकि मैं उस चाहत से दूर भागने का असफल प्रयास कर रहा हूं। खैर, उम्मीद करता हूं कि 2019 के अंत तक साढ़ेसाती खत्म हो जाएगी।”

अब ये बात बड़ी साधारण है और इस पर ऐसी खबरें भी बनाई जा सकती हैं जैसे- ‘अनुराग के सिर पर सवार हुई सक्सेज या अनुराग को नहीं है कदर कला की’ या ऐसी कोई भी तड़कती भड़कती लाइन के साथ इस ट्वीट पर बात की जा सकती है।

लेकिन ये छोटा सा ट्वीट बहुत कुछ कहता है। अनुराग ने इस पोस्ट में अपनी सबसे बड़ी हिट फिल्म को अपनी ज़िंदगी की बर्बादी का कारण बताया है। अगर ध्यान से इन लाइनों को पढ़ा जाए तो अनुराग ने अपनी ज़िंदगी के एक अनचाहे से दुःख की बात की है। ये ऐसी तकलीफ है जिसके शिकार शायद कई और लोग हुए होंगे।

जब इसी समाज से निकल कर आप समाज को आईना दिखाते हैं, इस उम्मीद से कि शायद लोग आपकी बात को समझ पाएंगे। वैसे लोग समझ भी लेते हैं लेकिन काफी बार ऐसा भी होता है कि फिर समाज आपको अपने आप से अलग करके आपको आईना दिखाने वाले की नज़र से ही देखने लगता है।

ऐसे तो अनुराग ने अग्ली, नो स्मोकिंग जैसी तमाम फिल्में और भी बनाई हैं लेकिन लोग जितनी बातें गैंग्स ऑफ वासेपुर की करते हैं शायद ही साधारण ऑडियन्स के बीच अनुराग की किसी और फिल्म का वैसा ज़िक्र किया जाता है।
शायद अनुराग ने इस ट्वीट में वही दर्द ज़ाहिर किया है। वैसे दुःख तो होगा ही। अगर हम रोज़ अलग-अलग रंग के कपड़े पहने मगर लोग तारीफ सिर्फ काली शर्ट की करे।

फिल्में और फ़िल्मकार दोनों ही ज़्यादातर पाबंदियों से दूर ही पाये जाते हैं इसलिए हमें भी किसी भी निर्देशक को एक रंग के साथ नहीं जोड़ना चाहिए। बल्कि वो अपनी कहानी के जरिये कितने अलग-अलग रंग बिखेरता है वो देखना चाहिए।

अंत में एक लाइन याद आ रही है कि-

‘अंदाजे बयान ही बदल देता है हर बात, वरना दुनिया में कोई बात नयी बात नहीं होती।’

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