इन दिनों देश का राजनीतिक व सामाजिक माहौल गरम है। अभिनंदन पाकिस्तान से सकुशल वापस अपने देश आ चुके हैं, इसके साथ ही लोकसभा चुनाव भी नजदीक ही आ गया है। ऐसे में देश का माहौल गरम होना स्वाभाविक है।

भारत के सरगर्मी का ही असर है कि कल तक जिस ओआईसी संगठन को इमरान खान और उनके मंत्री अपना घर बताते थे, उस ओआईसी की मीटिंग में नहीं जाकर पाकिस्तान अपने ही घर से बेघर हो गया। अब, जब देश के गरम माहौल का असर पाकिस्तान तक हो रहा है, तो भारत इससे अछूता कैसे रह सकता है। कोई न कोई असर तो देश में भी दिखना ही था। ये असर हमारे मुल्क के नेताओं के मानसिक व जुबानी स्तर पर भी दिख रहा है।

भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पहले से ही गर्म दिमाग के हैं, अबकी बार उनकी सनक ने सभी सीमाओं को तोड़ दिया है। सच तो यह है कि भाजपा के बड़े नेताओं ने कभी गिरिराज जैसे नेताओं के लिए कोई सीमा ही नहीं तय किया।

जब भी सीमा तय करने का प्रयास किया गया तो गिरिराज सिंह ने उस सीमा को सफलता पूर्वक तोड़ दिया। यही वजह है कि कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क होने के बावजूद सिर्फ कथनी (बड़बोलेपन) की ताकत पर बिहार के ये भूमिहार नेता अब बड़े नेताओं की लिस्ट में शामिल हो चुके हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शपथ लेते समय संविधान की कसम खाने वाले ये नेता जी बात-बात पर समाज के एक खास संप्रदाय के लोगों को विदेश भेजने की बात करते रहते हैं।

पटना में होने वाले संकल्प रैली में हिस्सा नहीं लेने वाले लोग देशद्रोही है

अबकी बार तो गिरिराज सिंह ने हद ही कर दिया…. बताइए जब देश में लोग पुलवामा हमले के बाद शोक में थे, तब केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह संकल्प रैली में प्रधानमंत्री मोदी को सुनने के लिए सभा में नहीं आने वाले को देशद्रोही कह रहे थे। हलाँकि, यह कोई नई बात नहीं है पहले भी गिरिराज सिंह राहुल गाँधी को मेंटल और उनकी माँ सोनिया गाँधी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं।

गिरिराज का विवादित बयान

यही नहीं कैलाश विजयवर्गीय ने कुछ दिनों पहले जो कहा वह न सिर्फ निचले स्तर का बयान है बल्कि उस बयान से आ रही सांप्रदायिकता की बू को कोई भी इंसान महसूस कर सकता है। दरअसल, विजयवर्गीय ने मध्यप्रदेश मे चुनाव हारने वाले भाजपा नेता के समर्थन में बयान देते हुए कहा कि उन्हें भाजपा नेता की हार से अधिक बीफ खाने वाले नेता के जीतने का दु:ख है।

इस तरह की भाषा कहाँ तक जायज है?

ऐसा नहीं है कि बयानों के मामले में सिर्फ भाजपाई नेता ने ही अपना संतुलन खोया है। कांग्रेसी नेता और उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राज बब्बर ने पिछले दिनों राजस्थान में चुनाव प्रचार के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की मां के बारे में विवादित बयान दिए। इस दौरान राज बब्बर ने कहा, ‘प्रधानमंत्री महोदय, आपने तो तब इज्जत से उनका नाम नहीं लिया था, लेकिन हमारी परंपरा यह नहीं कहती। हम तो यह कहना चाहेंगे कि आज रुपया गिरकर आपकी पूजनीय माताजी की उम्र के करीब पहुंचना शुरू हो गया है।’ इसी तरह राहुल गाँधी द्वारा फेंकु और चोर कहा जाना भी सही नहीं है, जब तक कि उनके उपर लगाए गए आरोप सही से साबित नहीं हो जाते हैं।

प्रधानमंत्री पर कांग्रेस नेताओं का विवादास्पद बयान

जब देश की सत्ता में बैठे दल के नोताओं और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेताओं के भाषा का स्तर इतना गिरते जा रहा है, तब यह सोचने की जरूरत है कि आखिर हमसबों ने खुद के तार्किक शक्ति को कितना बचा रखा है। किसी पार्टी का समर्थन और विरोध करना अपनी जगह है, लेकिन राजनीति के महत्व को उच्च मानक के साथ बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। हमें सोचने की जरूरत है कि जब नेता इस तरह के बयान दे रहे हैं तो भीड़ का हिस्सा बन लाइक कमेंट करने के बजाय क्या हमने इसके मायने को समझने का प्रयास भी कभी किया है? यदि नहीं किया है तो कीजिए क्योंकि जिंदा होने और जिंदादिल मुल्क का वासिंदा होने के नाते अपने देश की विधी-व्यवस्था पर सोचने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। हम सब ही मिलकर देश के राजनीति की दिशा और दशा तय करते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here