हम अपने को छोटी-सी समस्या को भी बड़ा मानकर उससे भागने लगते हैं। जबकि हमारे बीच ऐसी शख्सियत रहती हैं जो शरीर से कमजोर होकर भी पूरी दुनिया में अपनी पहचान का माद्दा रखते हैं। ऐसी ही शख्स थे, स्टीफन हाॅकिंग। जिनका  पिछले साल आज के ही दिन लंदन में निधन हुआ था। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन को याद करते हैं।

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जब मैं छोटा था। मुझे अक्सर अपने टीचरों से ऐसे व्यक्ति के बारे में सुनने को मिलता। जो चल नहीं सकता, बोल नहीं सकता। वह कंप्यूटर के माध्यम से अपनी सारी बातें कहता है। इन सबके बावजूद वह बहुत बड़ा वैज्ञानिक है। हम यह सुनकर तालियां ठोककर वाह-वाह करते हैं। सोचते थे कि वह सारी बातें कंप्यूटर के माध्यम से कैसे कहता होगा?

मोटर न्यूराॅन से थे पीड़ित

स्टीफन 21 साल की उम्र से मोटर न्यूराॅन की बीमारी से पीड़ित थे। इस बीमारी से उनके दिमाग के अलावा शरीर का कोई अंग काम नहीं करता। 1963 में उनको इस बीमारी का पता चला। डाॅक्टरों ने तो कह दिया था कि हाॅकिंग्स दो साल से ज्यादा नहीं जी पायेंगे। लेकिन हाॅकिंग्स ने उस दो साल को 55 साल तक ले गये। हाकिंग्स जल्दी ही पूरे शरीर से अक्षम हो गये। उन्होंने लेक्चर्स देने बंद कर दिये।

स्टीफन 21 साल की उम्र से मोटर न्यूराॅन की बीमारी से पीड़ित थे। हॉकिंग ने सापेक्षता (रिलेटिविटी), ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में अहम भूमिका निभाई थी। साल 1988 में उनकी किताब ए ब्रीफ हिस्टरी ऑफ टाइम आई जिसकी एक करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिकीं।

विकलांगता को हावी नहीं होने दिया

हाॅकिंग दिमाग को छोड़कर एक जिंदा लाश की तरह थे। लकिन उन्होंने कभी इस विकलांगता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अपनी विकलांगता का तोड़ निकालकर अविष्कारों की दुनिया में प्रवेश कर गये। उन्होंने अपनी सामान्य जिंदगी को दूसरों से अच्छी तरह जिया। उन्होंने पैसा, शोहरत और इज्जत में महारथ हासिल की।

जब हर किसी ने आशा छोड़ दी थी कि एक जिंदा लाश क्या कर पायेगा? तब हाॅकिंग ने अपनी जिंदगी में इतिहासों की इबारत लिखने की शुरूआत कर दी। उनके कारनामों के कारण उनके पास 12 मानद उपाधियां है। यह उनकी सफलता को बताने के लिए काफी है। वे अपनी बीमारी को एक वरदान के रूप में लेते थे।

‘‘21 की उम्र में मेरी सारी उम्मीदें शून्य हो गईं थीं और उसके बाद जो पाया वह बोनस है।’’

इस बीमारी ने उनको एक कंप्यूटर और व्हीलचेयर पर लाकर बैठा दिया। लेकिन वह व्हीलचेयर पर बैठकर एक जगह रूके नहीं। इसी व्हीलचेयर पर बैठकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाते रहे, अपने शोध कार्यों में अपने दिमाग को लगाते रहे। बीमारी ने उनके शरीर को तो कमजोर कर दिया, लेकिन दिमाग को काबू नहीं कर पाये। उसी दिमाग की बदौलत उन्होंने विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई अविष्कार किये, कई दीर्घकालीन घोषणाएं भी कीं।

आज के दिन उस व्यक्ति का जन्म हुआ था जिसने कहा था पूरी उम्र एक ही बात कही कि मौत निश्चित है। लेकिन इसे कैसे जीना है यह सिर्फ हम पर निर्भर करता है, डरकर या चुनौती स्वीकार करके।

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