CAA यानि नागरिकता संशोधन कानून में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। यानि मूल रूप से दो बातें हैं। पहली, ग़ैर-मुसलमान प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देना और दूसरी, अवैध विदेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजना, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान हैं। ठीक, पढ़ लिया। अब प्रधानमंत्री सार्वजानिक मंच से पढ़ लेने की गुहार लगाएं तो ऐसा थोड़ी न होता है कि हम न पढ़ें, हम एक जिम्मेदार नागरिक हैं।

अब आते है मुद्दे पर पहले नोटबंदी करके कहा गया कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे वो दूरगामी इतनी दूर हैं कि अब दूरबीन से भी नजर नहीं आते हैं अब नेटबंदी करके कहा जा रहा है ये सब शान्ति स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि चार दिन के लिए आप एक ऐसे कमरे में बंद हो जिसमें न फोन हो न टीवी हो न इंटरनेट हो तो आप क्या करेंगे? क्या आप अपने बाल नोचने लग जाएंगे? क्या आप अपना सर पटकने लग जाएंगे या अपने नाखूनों से दीवार खरोंचने लग जाएंगे?

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

सोचिये चार दिन बिना इंटरनेट के सोच कर आप सहम जाते हैं लेकिन कश्मीर के लोग बीते 140 दिनों से बिना इंटरनेट के रह रहे हैं। क्या आप ऐसे नरक में रहना चाहेंगे जहाँ इंटरनेट का इस्तेमाल करने के लिए घंटो का सफर तय करके आपको अपने घर अपने शहर से दूर जाना पड़े? कश्मीर के लोग बीते 4 महीने से यही कर रहे हैं। इंटरनेट बंद होने के कारण ऑनलाइन व्यापार ठप पड़ चुका है। छात्र नौकरी का फॉर्म भरने के लिए चार-चार घंटे किसी साइबर कैफ़े के बाहर खड़े रहने को मजबूर हैं। कश्मीरियों को व्हाट्सएप ग्रुप से हटा दिया गया है क्योंकि व्हाट्सएप की अपनी पॉलिसी है कि 120 दिनों से ज़्यादा कोई यूजर अगर एक्टिव नहीं रहता है तो उसका अकाउंट व्हाट्सएप से हटा दिया जाता है। क्या आप ये सब सुन कर भी सहज हो सकते हैं? वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट आपको पढ़नी चाहिए इसलिए कि भारत की मीडिया के पास इस स्तर की रिपोर्ट करने की आत्मशक्ति नहीं बची है और इसलिए भी पढ़नी चाहिए ताकि आप समझ सकें कि कश्मीर के लोगों के जीवन को नरक कैसे बनाया गया है।

संयुक्त राष्ट्र के फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन मामलों के जानकार डेविड केय कहते है, “The original idea that was asserted by the government for shutting down communications was to prohibit unrest, but that really can not be the argument after four months” यानि, अगर अशांति रोकने के लिए इंटरनेट बंद किया गया था तो चार महीने बाद अब ये तर्क नहीं चल सकता।
रमन जीत सिंह चीमा जो Asia-Pacific Director हैं एक्सेस नाउ के। वो कहते हैं कि

इतनी बड़ी जनसंख्या वाले लोकतांत्रिक देश के एक हिस्से में लम्बे समय तक इंटरनेट पर पाबंदी लगा कर रखना कोई साधारण बात नहीं है।

कश्मीर में पांच अगस्त से लेकर ये खबर लिखने तक इंटरनेट बंद है। बगैर इंटरनेट के कश्मीर के पत्रकार क्या कर रहे हैं? क्या वो भी इंटरनेट न मिलने पर दिल्ली के पत्रकारों की तरह पराठे वाली गली में पराठे खाने चले जाते हैं? या न्यूज़रूम में आकर कोई चुटकुला सुना रहे होते हैं? इंटरनेट पर रोक का मतलब सिर्फ व्हाट्सएप, फेसबुक पर पहुँच से दूर रखना नहीं है इसका मतलब सूचनाओं को रोक देना भी है। इसका मतलब खबरों के हाथ पैर बाँध देना भी है। ये समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है कि इंटरनेट शटडाउन ने कश्मीर की पत्रकारिता और कश्मीर के पत्रकारों को किस कदर अपाहिज कर दिया है। कश्मीर लाइफ एक साप्ताहिक पत्रिका है जो श्रीनगर से प्रकाशित होती है जिसमें एक कवर स्टोरी छपी है “The Labour of Journalism” कश्मीर के कई पत्रकार आज पत्रकारिता छोड़ कर दूसरा काम करने को मजबूर हैं। इनमें से ही एक नाम है, मुनीब-उल- इस्लाम। मुनीब फ्रीलान्स फोटो जर्नलिस्ट थे मगर घाटी में जब से इंटरनेट शटडाउन किया गया है, मुनीब अपना कैमरा छोड़ कर दिहाड़ी मजदूरी करने लग गए हैं क्योंकि उन्हें अपने परिवार का पेट पालना है। मुनीब पहले सेल्समैन का काम करना चाहते थे मगर कश्मीर के हर व्यापार में भारी नुकसान को देखते हुए उन्होंने दिहाड़ी मजदूरी का रास्ता चुना। मुनीब की खींची हुई तस्वीरों को कभी देसी-विदेशी मीडिया ने अपने पन्ने पर जगह दी थी मगर आज मुनीब मजदूर बनकर रह गए हैं कारण ‘इंटरनेट शटडाउन’. वही कहानी है मीर वसीम की जो बीते 6 सालों से कश्मीर के एक दैनिक अखबार के लिए काम कर रहे थे मगर जब से सरकार ने इंटरनेट पर रोक लगाई है उनका काम चौपट हो गया और वो अपने चाचा की दुकान में अब हेल्पर हैं। वही कहानी है, बशीर अहमद की जो बीते 10 सालों से दिल्ली स्थित एक उर्दू दैनिक अखबार के लिए जम्मू-कश्मीर का कवरेज करते थे मगर सितम्बर के महीने से उनकी सैलरी आनी बंद हो जाती है। बशीर कहते हैं कि “कोई कारण नहीं बचता कि एक रिपोर्टर को बिना काम किये उसका संस्थान उसे तनख्वाह दे.” कश्मीर के हर पत्रकार की अपनी अलग कहानी है, अपनी अलग मजबूरी है, अपने अलग हालात हैं मगर पत्रकारिता छोड़ कर ईंट-पत्थर ढोने और मजदूरी करने के पीछे का कारण एक ही है, इंटरनेट शटडाउन। दिल्ली का कोई पत्रकार एक संस्थान छोड़ कर दूसरे संस्थान जाता है तो उस पर हेडलाइनें छप जाती हैं, की-बोर्ड पर उँगलियाँ दौड़ जाती हैं। मगर कश्मीर के सैकड़ों ऐसे पत्रकार हैं जिनके हाथों में माइक, कैमरा और कलम होना चाहिए, उनके हाथों में अब छेनी और हथौड़ी है। उसी छेनी हथौड़ी से वो अपने दिन काट रहे है कि कब घाटी में इंटरनेट सेवा बहाल होगी और वो वापस अपने काम पर लौट पाएंगे।

सवाल सिर्फ इतना सा नहीं है कि घाटी में इंटरनेट सेवाएं कब बहाल होंगी, सवाल ये भी है कि क्या कश्मीर की हर खबर, हर सूचना आप तक पहुँच रही है? या आप अजित डोवाल की बिरयानी खाते हुए वीडियो देख कर ये मान बैठे हैं कि कश्मीर में हालात सामान्य हैं? जब हुकूमत चार-चार महीने तक देश के किसी हिस्से में इंटरनेट पर पाबंदी लगा दे तो हालात सामान्य नहीं, इसको हालात असामान्य कहते हैं।

इंटरनेट शटडाउन सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं है अब ये महामारी देश के दूसरे राज्यों में भी तेजी से फैल रही है। NRC और नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के चलते असम में पूरे 9 दिनों तक इंटरनेट शटडाउन रहा, यूपी के 21 जिलों में इंटरनेट सेवाएं रोक दी गई हैं। बैंगलुरु में कई दिनों तक इंटरनेट कनेक्शन बंद, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में इंटरनेट कनेक्शन को शटडाउन किया गया, यहाँ तक कि दिल्ली के भी कई इलाकों में गुरुवार को इंटरनेट बंद कर दिया गया। इस हिसाब से अब सरकार को दस बीस अजीत डोभाल और लगेंगे इन राज्यों में हालात सामान्य बताने के लिए। क्या सरकार के पास इतने सारे अजीत डोभाल का स्टॉक है? हमें नहीं पता। मगर इतना जरूर पता है कि हम उस दौड़ में हैं जब आपके और हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों को रिमोट कंट्रोल खिलौने वाली कार समझ लिया गया है। जिसमें सरकार उस बच्चे की तरह है जो एक बटन दबा कर आपके तमाम अधिकारों को जब चाहे कंट्रोल कर सकती है। एक लोकतंत्र में आप कब इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे और कब नहीं, क्या ये सरकार तय करेगी?

यहाँ पर हाँगकाँग का प्रसंग याद करना जरुरी हो गया है, 2019 के जून महीने में हाँगकाँग में कई चरणों में विरोध प्रदर्शन हुए। पहला चरण प्रत्यर्पण संबंधी बिल के विरोध में था. फिर दूसरे चरण में प्रदर्शनकारियों को जेल से बाहर निकालने के लिए प्रदर्शन हुए। जब प्रदर्शनकारी जेल से निकल आए तो प्रदर्शन, पुलिस की बर्बरता की जाँच करवाने के लिए शुरू हो गए। लोकतंत्र के समर्थकों द्वारा किए जा रहे ये प्रदर्शन कभी शांतिपूर्वक किए गए तो कभी हिंसा ने भी बीच में अपनी जगह बनाई। लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और डरे हुए हाँगकाँग के प्रशासन ने बिल वापिस ले लिया लेकिन, कभी इंटरनेट पर पाबंदी नहीं लगायी गयी। हमें ये भी समझना पड़ेगा कि चीन में लोकतंत्र नहीं है वहां कुलीनतंत्र है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने प्रर्दशनकारियों पर ‘आतंकवादी’ गतिवधियों के इल्ज़ाम लगाए और इस विरोध को चीन विरोधी कहा गया जैसे महान लोकतंत्र वाले भारत में किसी सरकारी नीति पर विरोध दर्ज करवाने वालों को अर्बन नक्सल और एंटी नेशनल कह दिया जाता है और ऐसा कहने वालों में खुद प्रधानमंत्री भी शामिल होते हैं। भारत में हर छोटे बड़े विरोध प्रदर्शन में इन्टरनेट शटडाउन किया जाना अब आम हो चला है। 2014 में जब बीजेपी सत्ता में आयी, उस साल 6 बार इंटरनेट शटडाउन किया गया, 2015 में ये बढ़ कर 14 बार हो गया, 2016 में 31 बार इंटरनेट रोका गया, 2017 में ये बढ़ कर 80 बार हो गया, 2018 में इंटरनेट शटडाउन करने के मामले में भारत विश्वगुरु बन गया और 134 बार इंटरनेट पर पाबंदी लगायी गयी। इस साल 2019 में अब तक 95 पर इंटरनेट रोका गया है। क्या आप इन आंकड़ों को सुन कर भी सहज हो सकते हैं? कागजों पर महान लोकतंत्र लिख देने से नहीं होता, जमीं पर लोकतंत्र नजर आना भी चाहिए। फोर्ब्स की एक रिपोर्ट कहती है कि इंटरनेट शटडाउन करने के मामले में भारत इराक़ और सीरिया जैसे युद्धग्रस्त इलाकों से भी आगे है। विडंबनाओं से भरे इस देश में प्रधानमंत्री का ट्विटर हैंडल भी किसी हिपोक्रेसी से कम नहीं है। असम में इंटरनेट शटडाउन करके इंटरनेट के द्वारा ही उनके लिए ट्वीट करते हैं, जिनके पास उनका ट्वीट पढ़ने के लिए इंटरनेट नहीं था।

रामचंद्र गुहा की बांह थामे पुलिस वालों की तस्वीरें हमारे समय की सबसे भयावह तस्वीरें हैं, हो सके तो इन तस्वीरों का प्रिंटआउट कर अपने पास रख लें ताकि अगली पीढ़ी के अपने बच्चों को आप बता सकें कि ये वो दौर था जब गोडसे को पूजने वाले छुट्टे घूम रहे थे और गांधी पर लिखने-पढ़ने वालों को धर-पकड़ के जेल में डाला जा रहा था। ये वो दौर था, जब विश्वविद्यालय में घुस कर बच्चों को रौंदने वाले पुलिसवालों की पीठ प्रधानमंत्री थपथपाते हैं। ये दौर न चुप रहने का है न हिंसक होने का है। अगर प्रदर्शन हिंसक हो जाए तो उसका असली उद्देश्य गर्त में चला जाता है और हिंसक होना भी क्यों है जब आप कविताओं, नज़्मों, गीतों से ही आप हुकूमत की नींव हिला सकते हैं। जाते-जाते आमिर अजीज़ की आवाज में ये गीत सुनते जाइये।

“ये सब देखकर मेरे लब मुस्कुरा गए, था जिसका इन्तजार वो अच्छे दिन आ गए।” लिंक नीचे दे रहे: