Edited: Aman Pandey

ठीक 3 साल पीछे जाइए और अपने दिमाग पर ज़ोर डालते हुए सोचिए कि आज के दिन इस वक़्त आप कहाँ थे?

जवाब क्या आया ? एटीएम की लाइन मे!

आज के दिन हीं प्रधानमंत्री द्वारा एक फैसला लिया गया, वो फैसला था नोटबंदी का। 

तो चलते हैं तीन साल पहले। साल था 2016 और दिन 8 नवंबर, रात 8 बजे अचानक से सभी न्यूज़ चैनलों की टीआरपी छत फाड़ के निकाल गई। मामला था कि मोदी जी टीवी पर थे और बात कह रहे थे कि पुराने 500, 1000 के नोट अब नहीं चलेंगे। उसी समय 50 दिन का समय भी दिया गया कि अपने पुराने नोट बदलवा लें। फिर तो बैंको मे जो भीड़ उमड़ी, उसके बारे में याद करके भी रूह काँप जाती है। सभी अगली सुबह से एटीएम की लाइनों में। घरों और दफ्तरों से ज्यादा हम लोग एटीएम की लाइनों मे पाए जाने लगे। रात दिन का पता नहीं, बस यह पता चल जाए कि किस ATM में पैसे हैं फिर तो लोग पूरी रात उस ATM के सामने रेंगने को तैयार बैठे रहते थे।

यह तो बात हुई नोट बंदी से पहली परेशानी की। कई बार तो ऐसी खबरें भी आयीं कि कुछ लोग लाइन में लगे-लगे हीं निकल लिए। बहुत बुरा दौर था। 4 महीने की जो एक भागम-भाग और अफरा-तफरी थी, उससे शांति मिली मार्च में। यह तो तफरी वाली बात हुई। अब कुछ सीरियस बात करते हैं।

नोट बंदी के तीन साल पूरे होने पर हम एक विश्लेषण करते हैं।

पिछले एक साल के डाटा को देखते हुए हमें जरा भी आश्चर्य नही होता, जहां यह कहा जाता है कि नोटबंदी की वजह से छोटे और लघु उद्योगों को बड़ा नुकसान हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर विश्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट, आलोचकों को केंद्र सरकार पर निशाना साधने का एक और मौक़ा देती नज़र आ रही थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि नोटबंदी की वजह से होने वाली परेशानियों और उत्पाद व सेवाकर (GST) के चलते पैदा हुईं अनिश्चितताओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित किया है। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक़ साउथ एशिया इकोनॉमिक फ़ोकस शीर्षक से प्रकाशित अपनी छमाही आर्थिक रिपोर्ट आई।

विश्व बैंक ने अनुमान जताते हुए कहा था कि साल 2015 में भारत की विकास दर 8.6 प्रतिशत थी, जो 2017 में सात प्रतिशत तक रह गई और फिलहाल तो स्थिति यह है कि यह विकास दर किस धरातल में जा चुकी है इसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल हो गया है। अगर किसी देश की विकास दर 5 प्रतिशत से भी नीचे चली जाती है तो, यह कहना भी मुश्किल हो जाता है कि हमरा देश किस विकास की तरफ अग्रसर है। 

बैंक ने यह भी कहा था कि भारत की विकास दर में आई गिरावट का असर दक्षिण एशिया की विकास दर पर भी पड़ा है। इसके चलते पूर्वी एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र ने दक्षिण एशिया को दूसरे स्थान पर ढकेल दिया है। हालांकि, विश्व बैंक ने यह भी कहा कि सार्वजनिक व्यय और निजी निवेश में संतुलन के लिए बनाई गई नीतियों के चलते 2018 तक जीडीपी विकास दर बढ़कर 7.3 प्रतिशत हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक़ एक तरफ़ सातवें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने और सामान्य मानसून व कृषि में आई तेज़ी की वजह से, ग्रामीण क्षेत्र की बढ़ती मांग के बाद सार्वजनिक व निजी खपत में तेज़ी आई है, और दूसरी तरफ़ घटते सार्वजनिक निवेश की वजह से संपूर्ण मांग में कमी आई है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो एक सफल ब्रांडिंग मे गड़बड़ माल बेचा गया और बेचा जा भी रहा है। सही फैसले को गलत तरीके और गलत समय पर लागू करने से ही नोटबंदी के फ़ेल होने की बात की जाती है। लागू करने के साथ, पहले काले धन की बात की गयी, वहाँ बात न बनी तो कैश लेस इंडिया की बात हुई, फिर वहाँ भी मामला बिगड़ता दिखा तो आतंकवाद का मुद्दा भी जोड़ दिया गया। किसी तरह से माल बिके बस इसकी पूरी कोशिश की गयी सिर्फ एक सफल इंप्लीमेंटेसन को छोड़ कर।

नोटबंदी ने क्या दिया?

आज नोटबंदी के तीन साल पूरे हो गए हैं। इन तीन सालों में हमनें क्या पाया? इस सवाल का जवाब जानना आपका हक़ है। पहली बात जब नोटबंदी हुई तो, कितने न्यूज़ चैनलों को मसाला मिला। देखते ही देखते TRP की भूूखी यह मीडिया नोटबंदी की ख़बरों का बखान करने लगी। ऐसा इसलिए कि नए नोट जो मार्केट में आने वाले थे, उसमें चिप लगी है, ऐसी अफवाहें उड़ने लगी। फिर क्या था, कई चैनल्स के प्रमुख एंकर्स जिन्हें आप रोज ‘प्राइम टाइम’ में देखते हैं, उन्होंने बाकायदा उस पर एक प्रोग्राम बना दिया। जिसमें डिटेल से दर्शकों को बताया गया कि नए नोट में लगी चिप कैसे काम करेगी। ऐसे में उन न्यूज़ चैनल एंकर्स की वजह से भारतीय मीडिया को एक नई पहचान मिली ‘गोदी मीडिया’।

बात यहीं खत्म हो जाती तो समझ में आता लेकिन, इस नोटबंदी के पीछे कई सारे वादे भी किए गए थे। जब सब कुछ फेल होता दिखाई दिया तो, सरकार ने आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया था लेकिन, साल 2016 में आतंकवादियों के 155 मामले सामने आए थे जो, नोटबंदी के अगले साल यानि 2017 में बढ़ कर 184 हो गए थे।

आखिर नोटबंदी के पीछे आर्थिक विकास सबसे मेन मुद्दा था लेकिन, जीडीपी जिस तरह से बद्तर हालात में है, उसे देख कर सभी यही कहेंगे कि कुछ नहीं मिला नोटबंदी से। हां इतना जरुर था कि बैंक में काम करने वाले कर्मचारियों को रात के 8 बजे तक काम करते देखा गया। इतना ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में जो सहायक बैंक हैं, उनमें नोट गिनने की मशीनें नहीं होती हैं। ऐसे में वहां काम कर रहे कर्मचारी खुद नोट गिनते थे और एक दिन में इतने सारे नोट गिनने के बाद अगर कुछ गड़बड़ होती थी, तो अपनी पॉकेट से पैसे भी भरते थे। अब जिन कर्मचारियों की सैलरी 25 हज़ार रुपये हो और एक दिन पैसा काउंटिंग में गड़बड़ी के कारण, 10-20 हज़ार पॉकेट से चले जा रहे हों तो, उनका क्या हल होगा?

इतना ही नहीं, नोटबंदी लाने का एक और कारण था कि बैंकों में कैश की कमी हो गई है, ऐसे में उन्हें भरना था। लेकिन, आज तीन साल बाद भी वही स्थिति है। हां, यह जरुर है कि बैंकों की संख्या ही कम कर दी गई है। लोगों का मरना, लाइन में लगना, या जिसके घर में शादी थी उस व्यक्ति का एटीएम में अपनी बारी का इंतज़ार करना, ये सब पुराना मामला है लेकिन, फिलहाल PMC मामला इसका ताजा उदाहरण है इसको ही याद रखिए।