लगभग 8 साल से यहां हर रोज तबाही मचती है। कभी लड़ाकू विमान उपर से बम गिराते हैं तो कभी साइनाइड की बारिश करते हैं। इस जंग में लोग जिंदा रहने से ज्यादा मरना पसंद कर रहे थे। लोग काम पर नहीं, बच्चे खेलने नहीं जा रहे थे, औरतें खाना नहीं बना रहीं थीं क्योंकि उन्हें पता था, अब मौत आने ही वाली है। ये जंग का कोई काल्पनिक दृश्य नहीं है, ये एक क्रूर तानाशाह की सोची-समझी योजना है। जिसने एक देश को मिटाना चाहा, जिसने एक धर्म को मिटाना चाहा और लाखों लोगों को मौत की इस जंग में झोंक दिया। ये निर्दयी तानाशाह सद्दाम हुसैन था।

Image result for saddam husseinसद्दाम हुसैन जिसने दो देशों को जंग का मैदान बना दिया। वो भी एक-दो महीने नहीं, पूरे 8 साल। इरान-इराक युद्ध 1980 में शुरू हुआ और 1988 में खत्म हुआ। सद्दाम हुसैन को 2006 में फांसी दी गई। लेकिन उसके इस क्रूर बनने की वजह उसका बचपन है।

सद्दाम हुसैन का जन्म 28 अप्रैल 1937 को इराक के टिक्रत शहर में हुआ था। सद्दाम जब कुछ ही महीनों का था तब उसके पिता कहीं गायब हो गये। उसके बाद उसका भाई कैंसर के कारण मर गया। इन हादसों से सद्दाम की मां को सदमा लगा और वो पागल हो गईं। सद्दाम उस वक्त 3 साल का था। उसको अपने रिश्तेदार के यहां भेज दिया गया, जो बगदाद में रहते थे।

राजनीति की पनाह

जब सद्दाम बड़ा हो गया तो वो वापस अपने शहर आया। वो अपनी मां के साथ रहना चाहता था लेकिन उसकी मां ने किसी से शादी कर ली थी। दुखी होकर सद्दाम हुसैन वापस बगदाद आ गया। सद्दाम को उसके बचपन ने कठोर बना दिया और आगे चलकर वही कठोरता, क्रूरता में बदल गई। सद्दाम हुसैन ने राजनीति में आने का मन बनाया। साल 1957 में वो उस समय की विपक्षी पार्टी ‘बाथ पार्टी’ में शामिल हो गया।

बाथ पार्टी को सत्ता में आना था लेकिन जब तक प्रधानमंत्री के पद पर अब्द-अल-करीम थे, उनका सत्ता में आना नामुमकिन था। बाथ पार्टी किसी भी हालत में सत्ता में आना चाहती थी और उन्होंने प्रधानमंत्री को मारने का प्लान बनाया। प्रधानमंत्री को मारने के लिए ऐसे लोगों की टीम बनाई, जिन्हें कोई न पहचानता हो। सद्दाम हुसैन पार्टी में अभी-अभी आया था, नया होने के कारण उसे कम लोग पहचानते थे। उसे भी प्रधानमंत्री को मारने के लिये भेज दिया। उनको कहा गया था, किसी भी हालत में प्रधानमंत्री को मारना है लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

Related imageप्रधानमंत्री को मारने गया सद्दाम घायल हो गया लेकिन वो वहां से भाग निकला। हर तरफ सद्दाम हुसैन को खोजा जाने लगा। सद्दाम पहले सीरिया और फिर ईजिप्ट चला गया। कुछ समय बाद इराक की सत्ता पर बाथ पार्टी का राज आ गया। सद्दाम हुसैन को अब कोई डर नहीं था। वो वापस बगदाद आ गया और कानून की पढ़ाई करने लगा। कुछ समय बाद ही बाथ पार्टी की सत्ता को छीन लिया गया और सद्दाम को उसके पुराने जुर्म के लिये पकड़ लिया गया। उसे जेल में डाल दिया गया जहां से वो भाग निकला।

तानाशाह की इबारत

जेल से निकलकर सद्दाम हुसैन ने पार्टी की कमान संभाल ली। पार्टी की कमान संभालते ही बाथ पार्टी फिर से सत्ता में आ गई। साल 1979 में राष्ट्रपति ने इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह पर अब बैठ गया सद्दाम हुसैन। सद्दाम हुसैन अपना असली खेल अब दिखाने वाला था। लोग अब तक उसे बाथ पार्टी और उपराष्ट्रपति के रूप में जानते थे लेकिन अब वो नरसंहारक और तानाशाह का रूप लेने वाला था।

1980 में सद्दाम हुसैन ने इरान पर हमला कर दिया। उसने ऐसी जंग की शुरूआत कर दी जो सालों तक खत्म नहीं होने वाली थी। ऐसी जंग जिसने कई नस्लें बर्बाद कर दीं। सद्दाम हुसैन क्रूर तानाशाह था। उसे कुर्दों से नफरत थीं। उसने उनको मरवाना शुरू कर दिया। सद्दाम हुसैन सुन्नी था और इरान में शिया रहते थे। कुर्द की आबादी इराक में ही रहती थी लेकिन वो सद्दाम के शासन से खुश नहीं थे। 1980 में दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया। जब कुर्द लोगों ने इरान का साथ दिया तो सद्दाम ने कुर्दों को मारने के लिये साइनाइड की बारिश करा दी। जिसने वहां का खाना-पानी खराब कर दिया। उसका असर आज तक है। आज भी लोग जन्म से ही उस साइनाइड के प्रभाव में आ जाते हैं।

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आज भी है उसका प्रभाव

इराक वो युद्ध एक तानाशाह के इशारे पर लड़ रहा था और इरान अपने-आपको बचा रहा था। सद्दाम मूडी आदमी था जो मन करता था वही करता था। उससे लोग परेशान हो गये थे। कुछ लोगों ने उसे मारने की कोशिश की। उसने उन सबको मौत का फरमान सुना दिया। इरान-इराक युद्ध 8 साल तक चला। लगभग 10 लाख से ज्यादा लोगों ने उस जंग में अपनी जान गंवाई। आखिर में मिला किसी को कुछ भी नहीं। सद्दाम हुसैन इरान के बाद कुवैत पर आ गया। उसने कुवैत पर हमला कर दिया। रातों-रात कुवैत की सड़कों पर इरान के सैनिक लोगों को मौत के घाट उतारने लगे।

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सद्दाम ने एक और जंग का बिगुल बजा दिया था। लेकिन इस बार अमेरिका शांत नहीं रहा। इरान-इराक के युद्ध में अमेरिका ने इराक का ही साथ दिया था। अमेरिकी सैनिकों ने कुवैत में घुसकर इराकी सेना पर हमला कर दिया। सद्दाम हुसैन ने अपनी सेना को वापस बुला लिया। अमेरिका अब समझ गया था कि सद्दाम हुसैन सबके लिये खतरा बन गया है, उसे रोकना बहुत जरूरी है। अमेरिका ने सेना को इराक भेजा, सद्दाम को पकड़ने के लिये। सद्दाम को इस बात का पता चल गया और कहीं छुप गया।

कई महीनों की छापेमारी के बाद सद्दाम पकड़ा गया और जेल में डाल दिया। उस पर उसके जुर्म का केस चला। अदालत में उसने बचने की पूरी कोशिश की लेकिन बच नहीं पाया। अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई और 30 दिसंबर 2006 को उस क्रूर तानाशाह को फांसी दे दी गई। सद्दाम हुसैन, अमेरिका की ही शह पर तानशाह बना लेकिन जब अमेरिका को लगा कि अब वो अमेरिका के लिए खतरा बन सकता है। अमेरिका ने उसे मौत की नींद सुला दिया।

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