बहुत से लोग अलग-अलग जगहों पर ‘जाति’ और ‘धर्म’ के कॉलम खाली छोड़ देते हैं लेकिन एमए स्नेहा के लिए यह आधिकारिक हो गया है. तमिलनाडु राज्य की 35 वर्षीय स्नेहा जो कि तिरुपति की रहने वाली है. जिन्हें सरकार ने  सर्टिफिकेट दिया है. जिसमें लिखा है कि स्नेहा की न कोई जाति है और न ही धर्म. तहसीलदार, टीएस सत्यमूर्ति ने उन्हें ये सर्टिफिकेट दिया है. स्नेहा ने फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर सबको यह जानकारी दी. जिसके बाद उनको बधाई मिलना शुरू हो गई है. इससे पहले स्नेहा के माता-पिता हर फॉर्म में ‘जाति’ और ‘धर्म’ के कॉलम को खाली छोड़ दिया करते थे लेकिन अब स्नेहा के लिए यह औपचारिक रूप से मान्य हो गया है.

 

एम ए स्नेहा का पहचान पत्र फोटो सोर्स गूगल

स्नेहा एक ऐसे परिवार से आती हैं जिनके लिए जाति और धर्म कोई मायने नहीं रखता. स्नेहा आनंदकृष्णन की सबसे बड़ी बेटी है. स्नेहा के माता-पिता दोनों अलग-अलग जाति से हैं, जिनकी शादी बिना रस्मों और परंपराओं के बिना हुई है. उनके यहां पिता के नाम का पहला अक्षर अपने बच्चे के नाम में रखने की परंपरा है. स्नेहा के माता-पिता ने इस परंपरा को तोड़ा. स्नेहा के माता-पिता ने दोनों के नाम के पहले अक्षर को साथ रख कर बेटी का नाम रखा एम ए स्नेहा.

एम ए स्नेहा अपने पहचान पत्र के साथ फोटो सोर्स गूगल5 फरवरी 2019 को तिरुपतुर तहसीलदार टी.एस. सत्यमूर्ति ने सर्टिफिकेट देते हुये कहा, स्नेहा की कोई जाति और धर्म नहीं है. स्नेहा को दिया गया ये प्रमाण पत्र सामाजिक परिवर्तन का एक नाया कदम है. जिसमें जाति और धर्म का कोई स्थान नहीं है.

स्नेहा ने मीडिया से कहा –

“मेरे सभी प्रमाण पत्र में ‘जाति’ और ‘धर्म’ कॉलम रिक्त हैं. इसमें मेरा जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल प्रमाण पत्र शामिल हैं. वे एक भारतीय के रूप में मेरा उल्लेख करते हैं. लेकिन मुझे अहसास होने लगा कि हर आवेदन फॉर्म में जाति प्रमाण पत्र देना ज़रूरी होता है. इसलिए, मुझे एक सेल्फ एफ़िडेविट पत्र प्राप्त करना था. तभी मुझे पता चला कि मुझे एक पहचान की जरूरत है, जो जाति और धर्म के अनुसार थी. जब जाति और धर्म को मानने वाले लोगों के पास सर्टिफिकेट हैं, तो हम जैसे लोगों के सर्टिफिकेट क्यों नहीं जारी कर सकते?” 

स्नेहा ने 2010 में जाति और धर्म एक बगैर पहचान पत्र बनवाने के लिए प्रयास करना शुरू किया था.

“मैंने 2010 में प्रमाण पत्र के लिए आवेदन भरना शुरू कर दिया, लेकिन अधिकारियों ने किसी कारण से इसे अस्वीकार कर दिया. कुछ ने कहा कि देश में कोई मिसाल नहीं है. 2017 से मैंने अपना पक्ष अधिकारियों के सामने रखना शुरू किया जिसके बाद उन्हे समझ आया. मैंने अपने रुख को उचित ठहराते हुए कहा कि उन्हें मेरे अनुरोध पर गौर करना चाहिए क्योंकि मैंने कोई सरकारी योजना या आरक्षण नहीं लिया है.” स्नेहा ने कहा

बी प्रियंका पंकजम पहले तिरुपत्तूर के उप-कलेक्टर हैं जिन्होने इस मामले में हरी झंडी दिखाई और मेरी मांग को जायज़ ठहराया.

“वह किसी जाति और किसी धर्म से संबंधित नहीं होना चाहती थी. हमें यह जाँचना था कि उसके दावे सही थे या नहीं. हमने उसके सभी स्कूल और कॉलेज के दस्तावेजों का सत्यापन किया और दो कॉलम खाली पाए. इसलिए, जब हमें कोई मिसाल नहीं मिली, तो हमने तय किया कि हम आगे बढ़ें और उसे प्रमाणित करें क्योंकि यह किसी को प्रभावित नहीं करेगा या किसी अन्य व्यक्ति के अवसर को छीन नहीं लेगा.” उप कलेक्टर ने कहा.

जब स्नेहा फर्स्ट स्टैंडर्ड में थी, तब स्कूल के अधिकारियों ने उसके माता-पिता से उसकी जाति के बारे में पूछा था. जब उन्होंने जवाब दिया कि मेरी कोई जाति नहीं है. उन्होंने जब धर्म पूछा, जिसके लिए उन्होंने फिर से नकारात्मक उत्तर दिया. यह उसके शुरुआती वर्षों के दौरान जारी रही, यहां तक ​​कि कॉलेज के दौरान, उसने आवेदन फॉर्म भरते समय जाति और धर्म के कॉलम को खाली छोड़ दिया था. मीडिया से बात करते हुए उसने बताया

“हमारे दोस्तों और रिश्तेदारों ने हमेशा जीवन के इस तरीके का समर्थन किया है और मुझे स्कूल में एक रोल मॉडल भी माना जाता था.” 

एम ए स्नेहा अपने पति और तीनों बच्ची के साथ फोटो सोर्स गूगल

यह परवरिश सिर्फ उसके लिए सीमित नहीं थी, उसकी छोटी बहनें मुमताज सूरिया और जेनिफर को भी ऐसे ही नाम दिए गए थे जो अलग-अलग धर्मों के थे. स्नेहा ने कहा कि यह परवरिश चुनौतियों और ताने-बाने के बिना नहीं थी, उनके परिवार अक्सर पूछते थे कि वे लड़कियों की शादी कैसे करवाएंगे और कैसे वे जाति प्रमाण पत्र या धर्म में आस्था के बिना आरक्षण लाभ प्राप्त करेंगे. स्नेहा ने प्रोफेसर प्रतिभा राजे से शादी की है. इस दंपति की तीन बेटियाँ हैं, अतीरा नाज़रीन, आथिला इरीन और आरिफ़ा जेसी है, जिनका नाम इस तरीके से रखा गया है, जो धर्म और जाति की पहचान से दूर हो. कार्ल मार्क्स, डॉ अंबेडकर और पेरियार के आदर्शों में उनका दृढ़ विश्वास मुख्य प्रेरणा है.

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