9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद लगा कि अयोध्या विवाद सुलझ गया है पर कुछ लोगों को ये बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्हें इस फैसले में सांप्रदायिकता की बू आने लगी. इसलिए न वो खुद चैन से रह रहे हैं और न ही सुप्रीम कोर्ट को चैन से रहने दे रहे हैं. इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है.

बाबरी मस्जिद के लोकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है, फोटो सोर्स: गूगल

बाबरी मस्जिद के लोकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है, फोटो सोर्स: गूगल

दरअसल, 40 बुद्धिजीवियों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या पर दिए फैसले के खिलाफ ये याचिका दायर की है. इनमें इतिहासकार इरफ़ान हबीब, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक एक्सपर्ट प्रभात पटनायक, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर, नंदिनी सुंदर और जॉन दयाल शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने को लेकर इनका तर्क है कि

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में तथ्यातमक एवं कानूनी गलतिया हैं.

हालांकि, अब सवाल ये उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इन बुद्धिजीवियों की पुनर्विचार याचिका पर विचार करेगा? क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 14 मार्च 2019 को ही ये क्लियर कर दिया था कि

सिर्फ मूल पक्षकारों को ही इस मामले में अपनी दलील पेश करने की इजाजत होगी और इस विषय में कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था.

ये लोग अकेले नहीं इनके अलावा अखिल भारत हिंदू महासभा ने भी सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है. अखिल भारत हिंदू महासभा उन वादियों में से है, जिन्होंने रामजन्म भूमि को लेकर अपना दावा पेश किया था. बुद्धिजीवियों का तो पता नहीं लेकिन, इनकी पुनर्विचार याचिका में सांप्रदायिकता की बू जरूर आ रही है. अखिल भारत हिंदू महासभा ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा है कि

विवादित ढांचे पर मुसलमानों का कोई अधिकार या मालिकाना हक नहीं है. इसलिए उन्हें पांच एकड़ जमीन नहीं दी जा सकती तथा किसी पक्षकार ने इस तरह की कोई जमीन मुसलमानों को आवंटित करने के लिए ऐसी कोई दलील नहीं दी. मुसलमानों द्वारा अतीत में की गई गलती के लिए मुआवजा नहीं दिया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट, फोटो सोर्स: गूगल

सुप्रीम कोर्ट, फोटो सोर्स: गूगल

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में फैसला दिया था कि

2.77 एकड़ भूमि रामलला विराजमान को दी जाती है. जहां मंदिर का निर्माण किया जाएगा. इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार को ये दिशा-निर्देश दिए थे कि वो मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन दे.

जब सदियो पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. लगा अब सब शांत हो जाएगा. इस चक्कर में जो बाकी अहम मुद्दे बचे थे. सुप्रीम कोर्ट और सरकार उस पर ध्यान केन्द्रित कर पाएगी. लेकिन, इस फैसले के आते ही पूर्व जजों, समाज सेवकों और विपक्षी नेताओं ने इस फैसले में मिस्टेक निकालना शुरू कर दिया है. अब देखना होगा कि कोर्ट इनकी याचिकाओं पर क्या फैसला सुनाता है.