लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से

इस शेर को पढ़ने के बाद मेरे ज़ेहन मे एक उबाल-सा आया, साथ ही ये सवाल कि इस शायर ने मोहब्बत के किस इमकान पर पहुँचकर इस शेर को बांधा होगा? जब कोई आशिक़ी की बात करता है, मोहब्बत के मयारों का ज़िक्र करता है और इंकलाब को किनारे रख देता है तो मुझे चिढ़ होने लगती है। लेकिन इस शेर के साथ ऐसा नहीं है, यहाँ शायर इंकलाब और मोहब्बत के बीच के तालमेल को समझता है, उसे मालूम है कि मोहब्बत और बगावत एक ही सिक्के के पहलू हैं।

ये शेर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की कलम से मुकम्मल हुआ और देशभक्ति के साहित्य को इसी के साथ एक बेहतरीन ग़ज़ल मिल गयी।

आज हम राम प्रसाद बिस्मिल के जन्मदिन पर उनकी शायरी के पीछे के फ़लसफे और उनके जीवन के बारे में बात करेंगे और उनकी शायरी के ज़रिये ये समझने की कोशिश करेंगे कि ऐसे कौन से एहसास और ख़्याल किसी शख्स के ज़हन में आते हैं जिनके रहते वो हँसते-हँसते फांसी पर झूल जाता है और ये भी कह कर गया होता है कि उसकी तमन्ना थी कि वो फांसी से लिपटकर प्यार कर सके।

राम प्रसाद बिस्मिल, फोटो सोर्स- गूगल

बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को शाहजहाँपुर में हुआ था, और बचपन से ही उनके पिता ने उन्हें हिन्दी साहित्य और भाषा की तालीम देनी शुरू कर दी थी, साथ ही उन्हें मौलवी के पास उर्दू सीखने के लिए भी भेजा जाता था। पिता के विरोध के होते हुए भी बिस्मिल का दाख़िला एक अंग्रेजी स्कूल में हुआ और उसके बाद वो आर्य समाज में भी शामिल हुए। इसी बीच बिस्मिल के इंकलाबी शायरी लिखने के हुनर पर उनके गुरुओं की नज़र पड़ी।

बिस्मिल के शेर और नज़्में इंकलाब के आँगन में खिले सुर्ख लाल फूलों की तरह हैं और इन फूलों की खुशबू जावेदां है। बिस्मिल जब कहते हैं-

साहिले-मक़सूद पर ले चल खुदारा नाखुदा
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है !

तब हमें उनके ज़ेहन में देश की दुर्दशा पर उठ रही चिंताओं के बारे में समझ आता है। एक शख़्स जिसकी ख़ुद की ज़िंदगी में हज़ार मसाइल हों, वो जब ख़ुदा से अपने देश, अपनी ज़मीन, अपने लोगों के मसअलों पर संवाद करता है तब पढ़ने वालों को एक सोच में डाल देता है कि वो कैसी जवानी थी जो सारी बातों से ऊपर उठ कर समाजवाद और देश की आज़ादी पर चिंतित थी। हम ऐसे क्यों नहीं बन पाये? आज के जमानें में इस बात को समझ पाना मुश्किल है की कैसे कोई शेर गुनगुनाते हुए फांसी पर लटक गया।

एक और ग़ज़ल में बिस्मिल कहते हैं-

आँख ख़ातिर तीर हो, मिलती गले शमशीर हो
मौत की रक्खी हुई आगे मेरे तस्वीर हो

यहाँ भी बिस्मिल का बेखौफ व्यक्तित्व और देशप्रेम किसी बच्चे की तरह खेलता चला आता है, एक ऐसा बच्चा जिसको हर वो चीज़ चाहिए जिस पर उसकी नज़र गयी है और इतिहास इसका गवाह है कि इस बच्चे ने हर वो चीज़ ले भी ली जिसकी उसे ख़्वाहिश थी।

जैसा कि मैंने पहले कहा कि मोहब्बत और इंकलाबी शायरी हमेशा साथ ही चलती हैं और कोई एक दूसरे के बिना जब लिखी जाती है तो वो एक बनावटी शेर या कविता के सिवा कुछ नहीं रह जाती। बिस्मिल नें अपने दिल का सारा प्रेम अपनी मिट्टी, अपने देश की जानिब मोड़ दिया और देश के हर हिस्से में उठ रहे इंकलाब को एक बुलंद और संजीदा आवाज़ दी।

सरदार भगत सिंह, बिस्मिल के शेरों के कायल थे। अक्सर उन्हें गुनगुनाया करते थे, बिस्मिल की शायरी उनकी कलम से निकलकर हर इंकलाबी के ज़बान का गहना बन गई और उनकी एकता के एक मज़बूत पहलू के रूप में शामिल हुई।

बिस्मिल का ही एक और शेर है-

ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या !   

मुझे नहीं मालूम आपको इन शेरों को पढ़ कर क्या ख़्याल आते हैं, आपके ज़हन में कौन सी तस्वीरें उभरती है; मैं यहाँ सिर्फ अपनी बात कर सकता हूँ।

मैंने आज तक बिस्मिल के जितने भी अशआर पढ़ें हैं उनमें एक अजीब-सी दीवानगी देखने को मिली है, मोहब्बत का वो मयार जहां आशिक कुछ भी कर गुज़रने के लिए तैयार बैठा है। अपने देश की रूह को अपने महबूब की रूह की शक्ल में देखना किसी आम शख्स के लिए बेहद कठिन साबित हो सकता है। मगर बिस्मिल और उनके सभी क्रांतिकारी साथियों ने बहुत आसानी से ऐसा कर के दिखा दिया। इन लोगों ने अपने बाद आने वाली तमाम नस्लों के लिए एक उदाहरण दिया कि वक़्त की चीख़ पर हमें ख़ुद को एक अच्छे और बेहतर कल के ख्वाब की ओर मोड़ना चाहिए। हमें अपनी ज़मीन और लोगों के लिए लड़ना चाहिए और इस से पहले कि सब कुछ तबाह हो जाये हमें चीजों और लोगों की वैल्यू समझनी चाहिए।

सन् 1924 की जनवरी में राम प्रसाद बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी साथियों ने मिलकर ‘स्वराज पार्टी’ का यूथ विंग बनाया और बिस्मिल उसके नेता निर्वाचित हुए। 3 अक्टूबर 1924 की तारीख़ को कानपुर में हुई पार्टी बैठक में ये निर्णय लिया गया कि पार्टी का नाम ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोशिएशन’ होगा और ये विंग बिस्मिल की लीडरशिप में काम करेगा।

वो बिस्मिल ही थें जिन्होनें काकोरी लूट की रणनीति तैयार की और उसे अंजाम भी दिया।

काकोरी कांड में शहीद क्रांतिकारियों की याद में बना स्मारक, फोटो सोर्स- गूगल

अगर हम बिस्मिल के द्वारा किए गए क्रांतिकारी और बेखौफ कामों की फेहरिस्त बनाएं तो शायद वो फेहरिस्त कभी पूरी न हो सके।

मैं बिस्मिल के जन्मदिन पर ये लेख लिखते हुए सोच रहा हूँ कि काश! मोहब्बत के वो मयार मैं भी छू सकूँ जहाँ आशिक़ मौत से मोहब्बत करने की बात करता है, जहाँ वो अपने वतन, अपने महबूब वतन के लिए फांसी के फंदे को गले लगा लेता है लेकिन इसके बाद भी वो ये कहता है कि काश! उसे क़ैद करने वालों ने उसके हाथ न बांधे होते तो वो फांसी के फंदे से लिपट कर प्यार कर सकता।

इन सारे अशआरों के पीछे खुली बाहों और होंठो पर एक बेतहाशा दीवानगी से सराबोर हंसी लिए जो बिस्मिल खड़ा है और मैं उसको सलाम करता हूँ। उस शायर को, उस क्रांतिकारी को जिसने अपने बाद आने वाली हजारों पुश्तों के लिए एक खुशबू से भरा आँगन छोड़ दिया और ख़ुद हँसते-हँसते शहीद हो गया।

खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।

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