आजादी की लड़ाई में लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। ऐसे जाबांज़ी और साहसी लोग फांसी से पहले खुश होते थे। ऐसे देशभक्त में तीन लोगों का नाम एक साथ लिया जाता है भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव। 23 मार्च 1931 को तीनों को लाहौर सेंट्रल में फांसी दी गई थी। जब तीनों को फांसी दी जा रही थी उन्होंने पहले फांसी के फंदे को चूमा। जिसे देखकर जेल वाॅर्डन ने कहा, इन लड़कों के दिमाग खराब हैं, ये पागल हो गये हैं। उन तीनों में से एक ने जवाब दिया था, हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव की मूर्तियाँ. फोटो सोर्स- गूगल

ये तीनों देश की क्रांति की मसाल बने थे। जब भी हम सुखदेव की बात करते हैं तो साथ में भगत सिंह की भी करते हैं। हम सिर्फ सुखदेव के बारे में कुछ जानकारी खोज लाये हैं, उनको जान लीजिए।

सुखदेव

  • सुखदेव का पूरा नाम है, सुखदेव थापर। 15 मई 1907 को लुधियाना के चैरा बाजार में पैदा हुए। सुखदेव के पिता का नाम था, राम लाल थापर ओर मां का नाम था रल्ली देवी।
  • सुखदेव जब 3 साल के थे और उनकी मां एक और संतान को जन्म देने वाली थीं। अपने भाई के पैदा होने से 3 महीने पहले उनके पिता का देहांत हो गया।
  • ऐसे स्थिति में सुखदेव के ताऊ लाल अचिन्त राम ने मदद की और उनके परिवार को अपने घर लायलपुर ले आये। जो आज फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है। सुखदेव का बचपन यहीं बीता और ताऊ अचिन्तराम ने पाला। अचिन्त राम आर्य समाज को मानने वाले थे, जिसका असर सुखदेव पर भी पड़ा। सुखदेव ने भी छूआ-छूत को मानना छोड़ दिया और अछूत कहे जाने वाले लोगों के साथ उठने-बैठने लगे।
  • उनके बचपन का एक किस्सा है। सुखदेव ने एक बार अपने बाएं हाथ पर बने ‘ॐ’ के गोदने पर तेजाब डाल लिया था। ऐसा उन्होंने अपनी सहन शक्ति को जानने के लिए किया था। फिर उसके निशानों को हटाने के लिए सुखदेव ने हाथ को मोमबत्ती से जला डाला।
  • सुखदेव थापर की प्रारंभिक पढ़ाई लायलपुर में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए नेशनल लाहौर काॅलेज चले गए। ये काॅलेज उस समय कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। यहां उन्हीं को एडमिशन मिलता था जिन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया हो। इसी काॅलेज में सुखदेव की दोस्ती भगत सिंह, यशपाल और जयदेव गुप्ता से हुई। सुखदेव, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के मेंबर थे। सुखदेव ने भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया।
  • 1927 में साइमन कमीशन का गठन हुआ। जब ये कमीशन भारत आया तो इसका जगह-जगह विरोध हुआ। जिसे अंग्रेजों ने लाठी से दबाने की कोशिश की। ऐसे ही एक विरोध में लाला लाजपत राय घायल हो गये और बाद में उनका देहांत हो गया। जिससे कई युवा, अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश में आ गये और बदला लेने का मन बना लिया। उसमें सबसे आगे भगत सिंह और सुखदेव ही थे।
  • स्काॅट से बदला लेने का प्लान बनाया गया। 18 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और राजगुरू ने स्काॅट को गोली मारी, सुखदेव ने भी इस प्लान का साथ दिया था। बाद में पता चला कि वो स्काॅट नहीं सांडर्स है। इस हत्याकांड के बाद अंग्रेज चारों तरफ भगत सिंह को ढ़ूंढ़ रहे थे, कड़ी चौकसी के बाद भी भगत सिंह को लाहौर से बाहर भेज दिया गया।
    डिफेंस इंडिया एक्ट के विरोध में एक और बड़े क्रांतिकारी काम को अंजाम देना था, असेंबली में बम फेंकना।
  • पहले भगत सिंह को वो काम अंजाम नहीं देना था क्योंकि पुलिस पहले से ही उनकी तलाश कर रही थी। लेकिन सुखदेव अड़ गए कि भगत सिंह ही बम फेंकेंगे। क्योंकि भगत सिंह ही लोगों में क्रांति पैदा कर सकते हैं। सुखदेव की बात भगत सिंह ने भी मान ली। इसके बाद वो कमरे में जाकर फूट-फूटकर रोए क्योंकि अपने फैसले से उनका दोस्त कुर्बान हो रहा था।
भगत सिंह, फोटो सोर्स- गूगल
  • 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंके और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए। ये देश को आजादी के मतवालों का बिगुल था। बाद में सुखदेव को लाहौर षड़यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया। अब जेल में सुखदेव, राजगुरू और भगत सिंह एक साथ थे।
  • जेल में कैदियों के साथ हो रहे अत्याचार के विरोध में भगत सिंह ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। सुखदेव ने भी अपने साथी का पूरा साथ दिया। भगत सिंह अगर विचार थे तो सुखदेव उस विचार को आंदोलन देने वाले शख्स थे।
  • 17 मार्च 1931 को फैसला सुनाया गया कि 24 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव थापर को फांसी दी जाएगी। लेकिन जब अंग्रेजों को आभास हुआ कि उस दिन बड़ी क्रांति हो सकती हो तो 23 मार्च 1931 को ही तीनों को फांसी दे दी। सुखदेव थापर, भगत सिंह, शिवराम और राजगुरू के शवों को रहस्मय तरीके से सतलुज नदी के किनारे जला दिया गया।
फोटो सोर्स- गूगल

सुखदेव अपने सिर्फ 24 साल की उम्र में देश के लिए न्यौछावर हो गये। सुखदेव की मां उनसे कहा करती थी मैं तुम्हारी शादी धूमधाम से करूंगी और तुम घोड़ी चढ़ोगे। जिसे सुनकर सुखदेव ने मुस्कुराकर कहा, घोड़ी चढ़ने के बदले मैं फांसी पर चढ़ लूंगा। बाद में सुखदेव ने अपनी बात सही कर दी।

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