एक पेड़ की शाखाओं में एक हैलीकाॅप्टर फंसा हुआ है। जब उस हैलीकाॅप्टर को नीचे उतारा गया तो उसमें से दो लाशें निकलीं। जिसे वहीं लाल कंबल में लपेट कर रख दिया गया और इंतजार होने लगा देश के प्रधानमंत्री का। क्योंकि इन दो लाशों में एक शख्स प्रधानमंत्री का बेटा है। प्रधानमंत्री आईं लेकिन प्रधानमंत्री बनकर नहीं, एक मां बनकर। प्रधानमंत्री ने जब अपने बेटे को देखा तो वो फफक कर रो पड़ीं। ये प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हैं और उनके सामने लाल कंबल में लिपटी लाश जिस शख्स की है, वो संजय गांधी की है। तब की बात में आज कहानी संजय गांधी की।

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इंदिरा गांधी सबकी बात टाल सकती थीं लेकिन अपने छोटे बेटे संजय गांधी की नहीं। संजय गांधी का जन्म 14 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली में हुआ था। अपने बड़े भाई राजीव की तरह ही संजय पहले वेल्हम बाॅयज स्कूल और फिर देहरादून के दून स्कूल चले जाते हैं। संजय को तेज रफ्तार वाली गाड़ियां बहुत पसंद थीं और उसी में अपना करियर बनाना चाहते थे। इसके बाद संजय गांधी इंग्लैंड चले गये और वहां 4 साल की अपरेंटशिप करने लगे। लेकिन 3 साल होने के बाद संजय ने अपनी मां को बताया कि वो वापस आना चाहता है।

तब इंदिरा ने 21 फरवरी 1966 को पीएन हक्सर को एक चिट्ठी लिखी जिसमें उन्होंने बताया,

‘शायद आपको पता हो कि मेरा छोटा बेटा संजय गांधी इंग्लैंड में ही रोल्स रोयस फैक्ट्री में अप्रेंटिशप कर रहा है। अब तक वो खुश था और वहां से रिपोर्ट भी अच्छी मिल रही थी। लेकिन अब संजय को लगता है कि अब उसे कुछ नया नहीं सिखाया जा रहा है और वो वापस आना चाहता है। मुझे लगता है ऐसा करना सही नहीं होगा क्योंकि अभी वापस आने का मतलब है उसके पास कोई डिग्री नहीं होगी। अगर आप कुछ मदद कर सकें तो आभारी रहूंगी’।

पी एन हक्सर को ये चिट्ठी मिली और उन्होंने जवाब लिखा। पी एन हक्सर ने लिखा,

‘आप दोनों लड़कों के बारे में चिंता छोड़ दीजिए। मेरी संजय से कोई बात तक नहीं होती, राजीव से बात होती। राजीव अच्छा लड़का है, वो आता है दुनियाभर की बातें करता है। लेकिन संजय के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। फिर भी संजय को वो कोर्स पूरा करना ही चाहिए’।

Related imageबाद में क्या हुआ? सब जानते हैं संजय गांधी ने बीच में ही कोर्स छोड़ा और भारत लौट आया। संजय 1967 में भारत लौटे एक सपने के साथ, सपना देश की पहली जनता कार बनाने का। इंदिरा की बचपन की दोस्त पुपुल जयकर संजय के बारे में बाद में बताती हैं, ‘संजय बेहूदा और आवारा था। उलझा हुआ और कार से खिलवाड़ करता हुआ। जिसके दोस्तों की संगत बहुत खराब थी’। संजय और राजीव में बहुत अंतर था। राजीव पश्चिमी मिजाज के थे, वे खूब घूमते-फिरते थे। यूरोप और अमेरिका का फैशन उनको बहुत भाता था। वहीं संजय पूरी तरह से देसी फितरत वाले थे, उनको हिंदी बोलना बहुत भाता था और वो कुर्ता-पायजामा पहनना पसंद करते थे।

संजय की मारुति बनाने का सपना मां ने सर आंखों पर उठा लिया। उन दिनों व्यापार करने के लिये सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था। नवंबर 1968 को लोकसभा में बताया गया कि संजय गांधी ने देश की सस्ती कार बनाने का लाइसेंस मांगा है। 22 साल के संजय को सरकार ने 50,000 कार बनाने का लाइसेंस दे दिया और इस लाइसेंस को देने वाले थे, औद्योगिक मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद। वही फखरुद्दीन जो आगे चलकर देश के राष्ट्रपति बनने वाले थे और देश में आपातकाल लगाने वाले चिट्ठी पर आंख मूंदकर दस्तखत करने वाले थे। कैबिनेट के इस फैसले का विपक्ष ने खूब विरोध किया और हंगामा मचाया। समाजवादी धड़े के सांसद जाॅर्ज फर्नांडीज ने गुस्से में कहा, ‘इंदिरा बेहयाई से भाई-भतीजावाद अपना रही हैं’। इन सबका इंदिरा पर कोई असर नहीं हुआ। साल 1971 में मारुती मोटर्स लिमिटेड कंपनी बनी और संजय उसके प्रबंध निदेशक बने।

Related imageपुरानी दिल्ली के गुलाबी बाग इलाके में संजय की वर्कशाॅप शुरु हो गई। इंदिरा सरकार संजय के लिए मानो बिछ गई। संजय को 75 लाख कर्ज दिया गया, वो भी बिना गारंटी के। संजय अपनी मां के पद का अच्छा फायदा उठा रहे थे। सेंट्रल बैंक के अध्यक्ष धर्मवीर तनेजा ने संजय को बताया कि वे उनको और पैसे नहीं दे सकते। संजय ने तनेजा को प्रधानमंत्री आवास 1, सफरगंज रोड बुलाया और पद से हटाने की धमकी दी। तनेजा धमकी के बाद भी नहीं माने तो तनेजा को उनके पद से हटा दिया गया। ये संजय का दौर था, जो इंदिरा के नाम पर तानाशाही चल रही थी। खूब पैसा और संसाधन लगाने के बाद संजय अच्छी मारुति कार बनाने में नाकाम रहे।

1973 में संजय पत्रकार उमा वासुदेव को मारुति का मुआयना कराने ड्राइव पर ले गये। संजय अपनी बनाई गाड़ी को 80 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चला रहे थे। उसमें से तेल चूने लगा और गाड़ी गर्म हो गई। संजय ने ऐसी कार बनाई थी जो उनको मंजिल तक नहीं पहुंचा सकती थी। इसके बाद ये सब कुछ धांधली में बदल गया और संजय भी मारुति को छोड़कर राजनीति में आ गये। इस योजना को 1977 में जनता सरकार ने बंद कर दिया। बाद में संजय की मौत के बाद इंदिरा ने 1981 में मारुति उद्योग को सरकारी कंपनी बना दिया, जिसने ‘मारुति सुजुकी‘ को बनाया।

Related imageअब वापस संजय पर आते हैं। 29 सितंबर 1974 को संजय गांधी ने मेनका गांधी से शादी की। 1975 में इलाहाबाद हाइकोर्ट का वो फैसला आता है और इंदिरा 25 जून 1975 को देश भर में आपातकाल लगा देती हैं। आपातकाल के इस दौर में देश का माहौल अलग ही हो जाता है। सेंसरशिप लागू हो जाती है, जो सरकार का विरोध करता उसे जेल में डाल दिया जाता। हर फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय से लिया जा रहा था। फैसले पर नाम तो इंदिरा का होता लेकिन लेते संजय गांधी थे। संजय गांधी का उस समय का मशहूर नारा, ‘बातें कम, काम ज्यादा’। आपातकाल की आड़ में संजय गांधी ने अपनी मनमानी शुरु कर दी। संजय गांधी ने उसी आपातकाल में पांच सूत्री कार्यक्रम चलाया। जिसमें सबसे घातक था, नसबंदी कार्यक्रम। अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं, 1977 में लोकसभा चुनाव का ऐलान हो जाता है और इंदिरा के खिलाफ संयुक्त मोर्चा खड़ा हो जाता है। इस मोर्चे की कमान एक बूढ़े व्यक्ति के हाथ में होती है, जयप्रकाश नारायण।

1977 में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई और पहली बार सत्ता से बाहर होना पड़ा। खुद संजय गांधी भी रायबरेली से चुनाव हार गये। तब राजीव गांधी ने संजय के बारे में कहा, ‘मैं मम्मी को ऐसी हालत में पहुंचाने के लिये संजय को कभी माफ नहीं करूंगा। इन सबके लिये वही जिम्मेदार है’। इंदिरा को भी राजीव ने यही बोला लेकिन वो कुछ बोली नहीं। लेकिन 1980 में फिर से कांग्रेस सरकार आ गई। क्योंकि जनता को समझ में आ गया था कि ये जनता पार्टी सरकार चलाने के काबिल नहीं है। 1980 के चुनाव में कांग्रेस की जीत संजय गांधी की रणनीति का नतीजा रहा। संजय गांधी ने खुद अपनी पसंद के लोगों को चुनाव में खड़ा किया था। 1980 में इंदिरा ने घोषणा कर दी कि संजय अब से कांग्रेस के महासचिव होंगे।

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संजय गांधी को गाड़ी चलाना पसंद था उतना ही हवा में चाॅर्टर प्लेन से कलाबाजियां करना भी। धीरेन्द्र ब्रम्हचारी इंदिरा के योग गुरु जो उस वक्त इंदिरा के यहां ही रहते थे। 21 जून 1980 को संजय रोज की तरह चाॅर्टर प्लेन की तरफ जा रहे थे, तभी उनको धीरेन्द्र ब्रम्हचारी मिले। संजय ने धीरेन्द्र ब्रम्हचारी से कहा, चलिये आपको हवा की सैर करवाता हूं, मेरी स्टाइल में। धीरेन्द्र ब्रम्हचारी ने कहा, मैंने तुम्हारी रफ्तार के किस्से सुने हैं मुझे छोड़ दो। कुछ दिन पहले ही एक नया चाॅर्टर प्लेन आया था, पिट्स एस-2ए। जो आराम से आसमान में गुलाटियां खा सकता था। अगले दिन चाॅर्टर प्लेन में संजय के साथ थीं उनकी पत्नी मेनका गांधी।

वो प्लेन में दो घंटे तक रहीं और संजय की कलाबाजी को देखकर चीखतीं रहीं। मेनका गांधी घबरा गईं और घर पहुंचकर अपनी सास इंदिरा से कहा, ‘मां मुझे आपसे एक अनुरोध करना है कि आप संजय को इस विमान को उड़ाने से मना कर दीजिए। वे चाहे तो और कोई भी विमान उड़ाएं मगर ये वाला मत उड़ाने दीजिए।‘ इंदिरा ने संजय से तब कहा, ‘मेनका ने किसी भी बात का कभी आग्रह नहीं किया है। यदि वो कह रही है कि न जाओ तो न जाओ’। तभी आरके धवन आये और कहने लगे, ‘अरे ये तो मर्दो का जहाज है। मेनकाजी ऐसा बोल रही हैं क्योंकि वो औरत हैं’। तब इंदिरा ने पूछा, संजय क्या वो सुरक्षित है? मेनका गांधी ने घबराहट भरी आवाज में कहा, नहीं वो विमान सुरक्षित नहीं हैं। संजय गांधी ने कहा, दो-तीन दिन में वो प्लेन ठीक हो जायेगा और इसे भी उसकी आदत पड़ जायेगी’।


संजय को उस प्लेन को ठीक होने का इंतजार करना था लेकिन इतिहास गवाह है वो ऐसा नहीं कर पाये। 23 जून 1980 को संजय गांधी सुबह-सुबह प्रधानमंत्री आवास 1, सफरगंज से हरे रंग की एक गाड़ी निकलती है जिसको चला रहे थे संजय गांधी। संजय गांधी वहां से सफदरगंज एयरपोर्ट पहुंचे जहां पहले से ही फ्लाइंग ट्रेनर सुभाष सक्सेना इंतजार कर रहे थे। संजय, सुभाष सक्सेना के साथ उसी पिट्स एस-2ए पर सवार हुये और उड़ान भरी। कुछ मिनटों में ये चाॅर्टर प्लेन कलाबाजियां करने लगा। लेकिन कुछ ही देर बाद संजय का चाॅर्टर प्लेन से नियंत्रण छूट गया। थोड़ी ही देर में प्लेन आवाज करते हुये नीचे गिरा। संजय गांधी का प्लेन क्रैश हो गया और वो एक पेड़ के बीच में फंस गया था।

कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई और एंबुलेंस और फायरब्रिगेड भी आ गई। पेड़ की शाखाओं को काटा गया और प्लेन को नीचे उतारा गया। उसमें से दो लाशें निकालीं गईं, एक संजय गांधी की और एक सुभाष सक्सेना की। संजय गांधी की लाश को वहीं रखा गया और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का इंतजार होने लगा। थोड़ी देर बाद इंदिरा गांधी अपने निजी सचिव आरके धवन के साथ आईं। इंदिरा ने संजय की लाश को देखा और वो फफक कर रोने लगी। ये एकमात्र मौका था जब लोगों ने इंदिरा को रोते देखा। इंदिरा अपने पति फिरोज और पिता जवाहर लाल नेहरु की मौत पर भी नहीं रोईं थीं। संजय गांधी की लाश को दो दिन तक रखा गया क्योंकि संजय के बड़े भाई राजीव उस समय इटली में छुट्टियां मना रहे थे। दो रोज बाद राजीव गांधी आये और संजय गांधी का अंतिम संस्कार किया गया।

Image result for sanjay gandhi before deathसंजय गांधी की मौत के बाद एक बड़ा सवाल सामने आ गया था। कांग्रेस को आगे कौन ले जायेगा, संजय के बड़े भाई राजीव या संजय की पत्नी मेनका गांधी? तब इंदिरा ने पुपुल जयकर से कहा था, ‘संजय की जगह कोई नहीं ले सकता। वो मेरा छोटा बेटा था लेकिन सहारा देने के मामले में बड़े भाई के समान था। राजीव के भीतर संजय की गतिशीलता और सरोकारों का अभाव है’। इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी को चुना। राजीव गांधी को कभी राजनीति में नहीं आना था लेकिन संजय की अचानक मौत से उनकी राजनीति में एंट्री हुई। इस फैसले से इंदिरा गांधी का परिवार टूटने वाला था, संजय की पत्नी मेनका गांधी अपनी सास इंदिरा की खुलेआम बुराई करने वाली थीं। वो किस्सा कभी और बतायेंगे लेकिन आज कहानी संजय गांधी की।

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