1952 का पहला आम चुनाव एक बड़ी समस्या के रूप में जाना गया। जिसमें चुनावी मुद्दे कम, चुनाव को सही तरीके से कराने की चुनौती ज्यादा थी। इसके बाद आने वाले सभी आम चुनाव में राजनीति होती रही है और इस राजनीति की शुरूआत होती है दूसरे आम चुनाव से। ये वो चुनाव है जिसमें देश के वो नेता जीते जो आगे चलकर देश का नेतृत्व करने वाले थे। ये वो चुनाव है जिसमें वो नेता हार गये जो जवाहर लाल नेहरू को हटाने की कोशिश कर रहे थे। ये वो चुनाव है जिसमें पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी तीन जगह से चुनाव लड़ते हैं और संसद में पहुंचते हैं। चुनाव की बातों में आज कहानी 1957 में हुये दूसरे आम चुनाव की।

Related image1952 से 1957 के बीच सियासत और देश की स्थिति में काफी बदलाव आ गया था। जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बने 10 साल हो गये थे। साल 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुर्नगठन भी हो चुके थे। देश में शिक्षा के लिए प्लान बन रहे थे, पंचवर्षीय योजनाओं को लाया जा चुका था और भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हो चुका था। अपने इन्हीं कामों को लेकर जवाहर लाल नेहरू एक बार फिर से चुनाव के केन्द्र में थे। वहीं दूसरी तरफ कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ ने केन्द्र को चुनौती देने का ठान लिया था। इनके अलावा इस आम चुनाव में कई क्षेत्रीय पार्टियां भी उभर आईं थीं। जिसमें अखिल भारतीय हिंदू महासभा, झारखंड पार्टी, आल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडेरेशन भी शामिल थीं।

24 फरवरी 1957 को शुरू हुए ये आम चुनाव 14 मार्च 1957 को खत्म हो गये। इस चुनाव में जवाहर लाल नेहरू को किसी पार्टी ने बड़ी चुनौती नहीं दी। कम्यूनिस्ट पार्टी एकमत थी लेकिन उसका दबदबा ज्यादा नहीं था। साल 1952 में बनी जेबी कृपलानी की किसान मजदूर पार्टी और लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी। 1955 में इस पार्टी का विभाजन हो गया और लोहिया ने अपनी अलग सोशलिस्ट पार्टी बना ली। तब तक कांग्रेस के धड़े से निकले जनसंघ के मुखिया श्यामा प्रसाद मुखर्जी का देहांत हो चुका था।

जनसंघ ने तब एक बड़ा दांव खेला और अपनी पार्टी का सबसे अच्छे वक्ता को तीन जगह से चुनाव लड़वाया, लखनउ, मथुरा और बलरामपुर। लखनउ में अटल बिहारी वाजपेयी दूसरे नंबर पर रहे। मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई और बलरामपुर की जनता ने उनको जीता कर संसद में पहुंचा दिया।

Image result for atal bihari vajpayee in 19571957 के इस चुनाव में 494 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुये और इतने ही उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस ने 490 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, कम्युनिस्ट पार्टी ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी 189 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। करीब 119 सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियां भी चुनावी भी मैदान में थीं। 494 लोकसभा सीटों के लिए 1519 उम्मीदवार मैदान में थे, जिसमें 481 उम्मीदवार निर्दलीय लड़ रहे थे। इस चुनाव में 45 महिलाओं ने चुनाव लड़ा और 22 महिलाओं ने चुनाव जीता था। साल 1952 की तरह ही इस चुनाव में प्रचार-प्रसार के लिए नेताओं ने तांगा, बैलगाड़ी, रिक्शा का ही उपयोग किया था। कई बड़े नेताओं ने पैदल तो कईयों ने कार का इस्तेमाल किया।

रिजल्ट आया तो इसने नेहरू के प्रभाव को और भी बढ़ा दिया। कांग्रेस की इस चुनाव में 371 सीटें आईं। कांग्रेस के इस जीत ने विपक्ष को बौना कर दिया था। पहले आम चुनाव की तरह ही इस बार भी लोकसभा में कोई विपक्ष का नेता नहीं था क्योंकि उनके पास इतनी सीटें ही नहीं थी जिससे विपक्ष का दर्जा मिल पाता।

कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी सीपीआई बनी, सीपीआई की 27 सीटे आईं थीं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के खाते में 19 सीटें आईं, वहीं जनसंघ की इस चुनाव में मात्र 4 ही सीटें आईं। 31 सीटों पर क्षेत्रीय दलों ने जीत पाई। इस आम चुनाव का एक और बेहतरीन आंकड़ा है। 312 सांसद एक सीट से चुन लड़कर जीते थे और 182 सांसद दो सीटों पर लड़कर लोकसभा पहुंचे थे।

Image result for second general election in indiaये आम चुनाव कई दिग्गज नेताओं की जीत और कुछ दिग्गज नेताओं की हार के लिये भी याद किया जाता है। इस चुनाव में ऐसे 3 नेता जीतकर आये थे जो आगे चलकर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले थे। इलाहाबाद से ही कांग्रेस के टिकट पर लाल बहादुर शास्त्री जीते। कांग्रेस के ही टिकट पर सूरत से मोरार जी देसाई की जीत हुई, बलरामपुर से अटल बिहारी वाजपेयी जीते।

इसी आम चुनाव में मद्रास के तंजावुर सीट से आर. वेंकटरमन जीते जो आगे चलकर देश के राष्ट्रपति बनने वाले थे। यही वो चुनाव है जब ग्वालियर की गुना सीट से कांग्रेस के टिकट पर विजया राजे सिंधिया चुनाव जीतीं। ये विजय राजे का एकमात्र आम चुनाव था जब वो कांग्रेस से लड़ीं थी, आगे चलकर वे कांग्रेस छोड़कर संघ से जुड़ने वाली थीं।

1952 के आम चुनाव में हारे कुछ नेता इस आम चुनाव में जीत गये। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता और कांग्रेस के पुराने वरिष्ठ नेता जेबी कृपलानी बिहार की सीतामढ़ी सीट से जीते। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता श्रीपाद अमृत डांगे मुंबई मध्य से चुनाव जीते। जवाहर लाल नेहरू फिर से फूलपुर से लड़े और जीते भी, फिरोज गांधी ने अपना आखिरी चुनाव रायबरेली से लड़ा और जीता भी। इसी तरह से अबुल कलाम आजाद, अतुल्य घोष, गुलजारी लाल नंदा जैसे बड़े नेता ये चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। इस चुनाव में समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस के वीवी गिरी तो मात्र 565 वोटों से हार गये। बलिया के चन्द्रशेखर का ये पहला चुनाव था। उन्होंने पीएसपी की सीट रसड़ा से ये चुनाव लड़ा, लेकिन ये चुनाव वे हार गये।

चुनाव के बाद 18 अप्रैल 1957 को जवाहर लाल नेहरू ने तीसरे मंत्रिमंडल का गठन किया। जिसमें जवाहर लाल नेहरू एक बार फिर से प्रधानमंत्री बने और गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत बने। ये वो चुनाव है जहां कांग्रेस मजबूत हुई थी, कई पार्टियां और नेताओं ने राजनीति में कदम रखा था। जो आगे चलकर कांग्रेस को चुनौती देने वाले थे, कांग्रेस को तोड़ने वाले थे और चुनावी लोकतंत्र की कहानी बदलने वाले थे।

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