पिछले साल 6 सितंबर को भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही धारा 377  को कोर्ट ने हटा कर समलैंगिकता को कानूनी रूप से हरी झंडी दे दी और देश-विदेश में कोर्ट के इस फैसले का ज़ोर-शोर से स्वागत किया गया। लेकिन भारत ऐसा देश है जहाँ लोग अपनी मानसिकता और आदत से समझौता करने में बहुत वक़्त लगा देते हैं, चाहे वो मानसिकता और आदत कितनी ही घटिया क्यों न हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आए एक साल पूरे होने को आए हैं लेकिन, सामाजिक मामले में शायद अभी तक बदलाव नहीं आ पाया है। चेन्नई से एक ऐसा ही मामला सामने आया है जिस से पता चलता है कि हम सोच के मामले में आज भी वहीं हैं जहाँ हम साल भर पहले खड़े थे।

होमोफोबिया, इमेज सोर्स – गूगल

“ये मेरी ग़लती नहीं है कि मैं गे हूँ”

ये बात मुंबई के अविंशु पटेल ने अपने आखिरी फेसबुक पोस्ट में लिखी। अविंशु चेन्नई में नेल आर्टिस्ट का काम कर रहे थे और बहुत अच्छे नेल आर्टिस्ट थे। अविंशु ने 2 जुलाई को अपने आख़िर फोन कॉल में अपने दोस्त से कहा कि उन्होंने जहर खा लिया है लेकिन, इसके पीछे का कारण नहीं समझाया। अगले दिन अविंशु की लाश चेन्नई के नीलनकराई बीच से बरामद की गयी और पुलिस के अनुसार लाश पर कोई मार पीट या किसी भी तरह के उत्पीड़न का निशान नहीं मिला।

अविंशु / इमेज सोर्स – फेसबुक

अपनी मौत के पहले अविंशु ने दो फेसबुक पोस्ट लिखे। पहला पोस्ट 2 जुलाई की रात के करीब 9:45 पर किया जिसमें अविंशु ने कुछ ऐसी बातें लिखीं जिसे पढ़ने के बाद हमें शर्म आनी चाहिए कि हम इतने आगे आकर भी अपनी सोच में इतना बदलाव नहीं ला सके कि किसी समलैंगिक व्यक्ति के अस्तित्व को खुशी-खुशी अपना सके।

अपने पहले पोस्ट में अविंशु ने बहुत सी बातें लिखीं लेकिन, जो एक बात सबसे ज़्यादा उदास करने वाली थी वो यह थी कि अविंशु ये नहीं समझ पा रहा था कि वो जैसा है उसके वैसे होने के लिए भारतीय समाज उसे एक्सेप्ट क्यों नहीं कर रहा है? उन्होनें लिखा कि उन्हें ‘हिजड़ा’ जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं और साथ ही जब वो ईश्वर से मिलेंगे तो सवाल करेंगे कि ईश्वर ने उन्हें ‘गे’ बना कर हिंदुस्तान में क्यों भेजा? वो यह भी पूछेंगे कि इतनी नफरत करने वाले लोगों को क्यों बनाया जो उनके माँ-बाप को उनके गे होने का जिम्मेदार ठहराते हैं। वो ईश्वर से ये भी बोलेंगे कि अगर किसी को हिंदुस्तान में जन्म दे तो, उन्हें समलैंगिक न बनाएँ।

इसके साथ ही अविंशु ने ये भी कहा कि उनकी मौत का जिम्मेदार कोई नहीं है। अपने साथ काम करने वाले लोगों के, अपने दोस्तों के और अपनी माँ बाप के सपोर्ट के लिए उन्होनें शुक्रिया अदा किया और साथ ही ख़ुदकुशी करने के लिए माफी भी मांगी। अविंशु ने ये पोस्ट टूटी-फूटी अँग्रेजी में लिखा और साथ ही ये भी लिखा कि वो जानते हैं कि उनकी अँग्रेजी अच्छी नहीं है और वो इसके लिए माफी भी मांगते हैं।

जो एक बात अविंशु ने अपने इस पोस्ट में बार-बार कही है वो ये कि उनकी ख़ुदकुशी के लिए किसी को भी जिम्मेदार न माना जाए।

अविंशु ने अपना दूसरा पोस्ट 2 जुलाई को ही रात 10:21 पर किया जिसमें उन्होंने लिखा।

“आप सब से विनती है। मेरे मरने का किसी भी व्यक्ति और मुझसे जुड़े कोई भी कंपनी या शहर को जिम्मेदार ना ठहराये। मैं आपकी नज़र में वो आदमी हूँ जिसे आप हिजड़ा और ‘बाइल्य’ नाम से पुकारते हैं। मैं लड़का हूँ सब जानते हैं, बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएँ बोलना, सब एक लड़की के जैसा है। बस यही बात सब भारत में रहने वाले लोग पसंद नहीं करते। मैं इसलिए मेरी स्वयं इच्छा से ख़ुदकुशी कर रहा हूँ। और एक बात, मेरी आखिरी विनती है आप लोगों से, मेरे मरने का आरोप किसी भी व्यक्ति या मुझसे जुड़े कंपनी और लोग या मेरे परिवार, साथ ही रिश्तेदार, और किसी भी दोस्त पर न लगाएँ

आखिरी इच्छा- मेरा परिवार गरीब है तो आप मदद करिए और समझाइए, मैं मर रहा हूँ, आऊँगा, जब आप अपनी और अपने भारत की…. “

इतना ही लिखने के बाद अविंशु ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

अविंशु के दोनों फेसबुक पोस्ट चीख-चीख कर एक ही बात कह रहे थे, ‘मेरी क्या ग़लती है कि मैं ऐसा हूँ?’ अविंशु इस देश के समाज से इस कदर परेशान हो गया था कि उसने अपने अपनी जान लेना बेहतर समझा। एक हँसता-खेलता 19 साल का लड़का क्यों एक रात में ही अचानक अपनी ज़िंदगी खत्म करने के फैसले पर आ जाएगा? हाँ, ये बात भी बिल्कुल सही है कि ख़ुदकुशी को किसी भी तरीके से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। अविंशु को मदद ढूंढनी चाहिए थी, जो उसे कहीं न कहीं ज़रूर मिलती। लेकिन हम इस बात को भी नहीं नकार सकते कि आज भी हमरा समाज समलैंगिकता को एक गंदी नज़र से देखता है। आज भी अगर कोई लड़का या लड़की समलैंगिक है तो उसे खुल कर समाज में ये बात बताने पर हज़ार भद्दी-भद्दी बातें सुनने को मिलती हैं। कोई समलैंगिकता को बीमारी कहता है तो कोई कहता है कि ये बस दिमाग़ का फितूर है। कोर्ट के फैसले के बाद भी लोगों ने अपनी सोच नहीं बदली है और ये सोच ही अविंशु और उसके जैसे न जाने कितने LGBTQ कम्युनिटी के लोगों की मौत का कारण है।

तमाम NGO और संस्थाएं LGBTQ कम्युनिटी के लोगों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ समाज बनाने के लिए काम कर रही हैं लेकिन अभी तक आवाम के एक बड़े हिस्से की सोच घटिया ही है।

किसी के सेक्सुअल ओरिएंटेशन के लिए अगर उसे सताया जा रहा है तो ये कितनी ज़्यादा भयावह बात है इसका अंदाज़ा लगाना भी हमारे लिए मुश्किल है। कोर्ट कानून में बदलाव कर सकती है, मगर अपनी सोच और मानसिकता में हमें खुद से ही बदलाव करने पड़ेंगे। अगर आपके घर वाले, दोस्त या कोई भी शख्स LGBTQ कम्युनिटी के लोगों से नफरत करता है तो उन्हें समझाइए, उनकी सोच बदलने की कोशिश करिए।

इमेज सोर्स – गूगल

इसके साथ ही LGBTQ कम्युनिटी के समर्थन में आवाज़ उठाईये, उन्हें अकेला न महसूस होने दीजिये। शायद आपकी आवाज़ से किसी अविंशु को एक उम्मीद मिल जाये कि दुनिया में ऐसे लोग हैं जो उसके होने पर कोई सवालियां निशान नहीं लगाते और उसे खुली बाहों से गले लगा सकते हैं। शायद आपकी एक आवाज़ अगले अविंशु को ख़ुदकुशी करने से रोक सके और इंसानियत पर एक और काला धब्बा लगने से रह जाये।

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here