साल 1967 का आम चुनाव कांग्रेस के वर्चस्व का चुनाव था। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बन चुकी थीं। कामराज को इंदिरा और मोरारजी में से किसी एक को चुनना था और कामराज ने चुना नेहरु की बेटी इंदिरा को। जो कामराज की सबसे बड़ी भूल बनने वाली थी।

1967 का चुनाव नेहरु की बेटी के नाम पर ही लड़ा जा रहा था। इंदिरा गांधी के कुछ फैसलों ने सिंडीकेट को परेशान कर दिया था। वो इंदिरा को हटाना चाहते थे लेकिन वो इस आम चुनाव के खत्म होने के इंतजार में थे। कामराज को पता था ये चुनाव नेहरु की बेटी के नाम पर ही जीता जा सकता है। इंदिरा ने अपने आपको नेहरु का वारिस समझना शुरु कर दिया था। इंदिरा इस चुनाव की सरपरस्ती बनने वाली थी, इंदिरा इस चुनाव की कहानी बदलने वाली थी। ये राजनीति के सबसे अहम आम चुनाव की कहानी है, ये इंदिरा गांधी के उभरने की कहानी है। आज चुनावों की बातों में बात होगी चौथे आम चुनाव की।

Image result for 1967 general election indira gandhiसाल 1962 के बाद देश में काफी कुछ बदल गया था। भारत चीन से युद्ध हार चुका था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु का देहांत हो चुका था। उसके बाद प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री। उनके प्रधानमंत्री बनने के नौ महीने के अंदर पाकिस्तान ने 1965 में हमला कर दिया। तब शास्त्री ने कड़ा फैसला लिया और पाकिस्तान को मुंह-तोड़ जवाब दिया। उसके बाद ताशकंद समझौता हुआ और वहीं लाल बहादुर शास्त्री का देहांत हो गया। इसके बाद 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने तीसरे प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली।

जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तब देश एक बड़ी समस्या से जूझ रहा था, खाद्यान्न की कमी। तब इंदिरा गांधी अमेरिका से मदद मांगने गईं। अमेरिका ने भारत की मदद तो कर दी लेकिन एक बड़ी कीमत वसूल ली। आजादी के बाद पहली बार भारतीय रूपये का अवमूल्यन किया गया। इंदिरा गांधी के इस फैसले से सियासी गलियारे में भूचाल आ गया। जिसका विरोध विपक्ष ही नहीं, उनकी पार्टी भी कर रही थी। तब इंदिरा प्रधानमंत्री इसलिये बनी रह पाईं क्योंकि आम चुनाव आ गये थे और कांग्रेस को इंदिरा गांधी की जरूरत थी।

Image result for 1967 general election indira gandhiदेश में हालात कुछ अच्छे नहीं थे। खाद्यान्न की समस्या बड़ी समस्या थी। कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन के निर्देशन में हरित क्रांति पंजाब, हरियाणा में रंग दिखा रही थी। हिंदी को राजभाषा बनाने को लेकर भी बहुत बहस हो रही थी। इंदिरा गांधी का विरोध खुद उनकी पार्टी कर रही थी और सबसे ज्यादा मोरारजी देसाई कर रहे थे। जो इंदिरा गांधी की वजह से प्रधानमंत्री नहीं बन पाये थे। इस चुनाव में विपक्ष भी काफी मजबूत दिख रहा था। विपक्ष में जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी और कई क्षेत्रीय पार्टियां मैदान में थीं।

ये पहली बार था, जब देश में लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ हो रहे थे। इस बार आम चुनाव के साथ-साथ 6 राज्यों के भी चुनाव साथ ही में हो रहे थे। वो राज्य थे, मद्रास, केरल, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और गुजरात। इसके बाद कभी भी लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ नहीं हुये हैं। देश अब तक जवाहर लाल नेहरु के प्रभाव से मुक्त हो गया था। अब मैदान में कांग्रेस पट्टी का नया नेता आ गया था। देश की आजादी के बाद 20 साल तक जम्मू-कश्मीर में लोकसभा चुनाव नहीं हुये। 1967 के आम चुनाव में पहली बार जम्मू-कश्मीर में भी लोकसभा चुनाव हुये।

Related imageसाल 1967 के लोकसभा चुनाव 17 फरवरी 1967 को शुरु हुये और खत्म हुये 21 फरवरी 1967 को। 520 सीटों के लिये देश भर में चुनाव हुये। देश में तब 25 करोड़ मतदाता थे, 15 करोड़ लोगों ने वोट डाला। सबसे ज्यादा सीटें कांग्रेस की आईं, कांग्रेस के खाते में आईं 283 सीटें। जो अब तक के हुये आम चुनाव में सबसे कम थीं। पहले आम चुनाव की तुलना में कांग्रेस की इस चुनाव में 81 सीटें कम हो गईं थीं। सोनिया गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ा और जीता भी। कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका केरल, मद्रास में लगा। जहां कांग्रेस के खाते में एक भी सीटें नहीं आईं थीं। इस चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ इंदिरा को हटाने की सोच रखने वाले सिंडीकेट को। सिंडीकेट के कई नेताओं को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस के सबसे बड़े नेता कामराज भी इस चुनाव में हार गये।

इन चुनाव में विपक्ष के कई बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। जेबी कृपलानी, मध्य प्रदेश की रायपुर सीट से लड़े और कांग्रेस के एल. गुप्ता से हार गये। जनेश्वर मिश्र जवाहर लाल नेहरू की सीट फूलपुर से लड़े। वे नेहरु की बहन विजयलक्ष्मी पंडित से हारे। 1962 में बलरामपुर से हार का स्वाद चखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी इस बार उसी सीट से जीते। वाजपेयी की आम चुनाव में ये दूसरी जीत थी। वे दूसरी बार संसद जा रहे थे लेकिन इस बार संसद की आभा में नेहरुमंडल नहीं, इंदिरा का वर्चस्व था।

अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा जार्न फर्नांडीस, राम मनोहर लोहिया, नीलम संजीव रेड्डी भी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। राम मनोहर लोहिया, उत्तर प्रदेश की कन्नौज सीट से जीते और जार्ज फर्नांडीज साउथ मुंबई से जीते। मध्य प्रदेश की गुना सीट से सोशलिस्ट पार्टी की उम्मीदवार विजयाराजे सिंधिया चुनाव जीतीं।

Related imageकांग्रेस 283 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। दूसरे नंबर पर 44 सीट जीतकर आई स्वतंत्र पार्टी। सीपाई और संयुक्त समाजवादी दल के 23-23 उम्मीदवार जीते। जनसंघ की 35 सीटें आईं जो उसकी अब तक की सबसे ज्यादा सीट थीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 19 सीटें जीतीं और प्रजा सोशलिस्ट के खाते में आईं 13 सीटें। इस चुनाव में 2369 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे जिसमें से 1203 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सबसे ज्यादा वोटिंग हुई लक्षद्वीप में, जहां 83 फीसदी लोग वोट डालने पहुंचे। सबसे कम वोटिंग करने वाला राज्य नागालैंड बना। जहां का वोट प्रतिशत शून्य रहा।

कांग्रेस के लिये सबसे ज्यादा नुकसान गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हुआ था। केरल में 19 सीटों में से कांग्रेस की सिर्फ 1 सीट आई थी। केरल में सीपीएम ने सबसे ज्यादा 9 सीटें जीतीं। इसी तरह मद्रास की 39 सीटों में कांग्रेस के खाते में आईं सिर्फ 3 सीटें। जहां डीएमके ने 25 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सभी पर जीत दर्ज की। लोकसभा चुनाव के साथ 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हुये। जिसमें केरल में सीपीआई की सत्ता दोबारा वापस आई।

केरल वही राज्य है, जहां इंदिरा गांधी ने नेहरु के समय में सीपीआई की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। ऐसा ही कुछ हाल कांग्रेस का मद्रास के विधानसभा चुनाव में हुआ। कांग्रेस ने 232 को उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा और जीते सिर्फ 58। डीएमके ने 138 सीटें जीतकर कांग्रेस को मद्रास से हमेशा के लिये उखाड़ फेंका। जम्मू-कश्मीर जहां पहली बार लोकसभा चुनाव हुये थे। कांग्रेस ने 5 सीटों में से 4 सीटें अपने नाम की।

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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही और मुख्यमंत्री बने चन्द्रभानु गुप्ता। लेकिन चन्द्रभानु की ये सरकार 1 महीने ही चल पाई। चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और भारतीय दल क्रांति नाम की पार्टी बना ली। कांग्रेस सरकार गिरी गई और चौधरी चरण सिंह ने कई पार्टियों के साथ गठजोड़ करके सरकार बना ली। ये सब देश के चौथे लोकसभा चुनाव में हुआ था। चौथे आम चुनाव में कांग्रेस का ग्राफ बहुत नीचे गिरा था, जिसका सबसे बड़ा फायदा इंदिरा गांधी को हुआ। मोरारजी देसाई फिर से इंदिरा गांधी को चुनौती देने वाले थे लेकिन इंदिरा अब तक सियासत को भी समझ गईं थीं और सियासी पाले को भी।

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