इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन यानि कि ISRO जितनी तारीफ की जाए कम क्योंकि, आज इस ऑर्गनाइजेशन पर पूरा देश गर्व कर रहा है। चन्द्रयान-2 को लेकर ISRO की पूरी टीम दिन-रात मेहनत करने में अभी भी लगी है। ISRO के साथ वाहवाही हो रही है भारत सरकार की और वाहवाही हो रही है पीएम मोदी की भी। रुस ने जहां पीएम की तारीफ की थी तो NASA ने ISRO की  तारीफों के पुल बांधे थे। इन सब के बीच ISRO से जुड़ा एक लफड़ा जो जुलाई में ही शुरु हुआ था, एक बार फिर से ताजा होता दिख रहा है।

एक तरफ तो सरकार के साथ पूरा देश ISRO के वैज्ञानिकों की तारीफें कर रहा है लेकिन, इसी मोदी सरकार ने इस साल जुलाई में ISRO के वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स को मिलने वाले इंसेंटिव को बंद करने का ऐलान कर दिया था। जिसको लेकर स्पेस इंजीनियर्स एसोशिएशन यानि SEA प्रमुख प्रेसीडेंट ए. मणिरमन ने ISRO प्रमुख के सिवन को लेटर लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि

वेतन आयोग द्वारा इन इंक्रीमेंट्स को हटाने के पीछे छठे वेतन आयोग के तहत संशोधित भुगतान का हवाला दिया गया था। हालांकि वेतन आयोग ने खुद ही 1996 के इंक्रीमेंट्स को जारी रखने की सिफारिश की थी।

इस लेटर की अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। यानि जिन वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स की तारीफें आज पूरी दुनिया कर रही है, वो भारत सरकार की वजह से वेतन की मार झेल रहे हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

चलिए अब जरा पीछे चलते है और जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर पूरा मामला क्या है? ISRO में अभी लगभग 16,000 वैज्ञानिक और इंजीनियर्स काम कर रहे हैं। इनमें से लगभग 80 से 90 प्रतिशत वैज्ञानिक और इंजीनियर्स छठे वेतन की मार झेल रहे हैं।  इसके पीछे वजह है सरकार का एक फैसला।

इसरो चीफ को लिखा गया लेटर का फ्रंट पेज, फोटो सोर्स: गूगल
इसरो चीफ को लिखा गया लेटर का फ्रंट पेज, फोटो सोर्स: गूगल
 इसरो चीफ को लिखा गया लेटर का बैक पेज, फोटो सोर्स: गूगल
इसरो चीफ को लिखा गया लेटर का बैक पेज, फोटो सोर्स: गूगल

1 जुलाई 1996, सरकार द्वारा ISRO के वैज्ञानिको और इंजीनियर्स के लिए एक प्रोत्साहन राशि शुरु की गई थी। इसकी वजह ISRO के प्रति वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना और संस्थान छोड़कर जाने से रोकना था। ऐसे में सरकार के इस फैसले से लगभग 80 से 90 प्रतिशत वैज्ञानिको और इंजीनियर्स की सैलरी 8 से 10 हज़ार रुपये कट गई। केवल प्रोत्साहन राशि के नाम पर अगर कुछ बचा तो वो था परफॉर्मेंस रिलेटेड इंसेंटिव स्कीम यानि कि PRIS.

केंद्र सरकार की आदेश कॉपी, फोटो सोर्स: गूगल
केंद्र सरकार की आदेश कॉपी, फोटो सोर्स: गूगल

एक और बात जानना जरुरी है कि जब तक देश में आर्थिक स्थिति को लेकर कोई गंभीर समस्या न हो तब तक सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं काटी जाती है। ISRO के वैज्ञानिको और इंजीनियर्स की सैलरी काट कर सरकार तो पहले ही बता चुकी है कि देश इस वक्त कितनी बदतर स्थिति से गुजर रहा है। अब ये भी जान लीजिए कि ISRO में किसी की भी ज्वॉइनिंग C ग्रेड से शुरु होती है और टेस्ट के बाद प्रमोशन। खासकर वैज्ञानिकों के लिए D, E, F और उससे आगे के भी ग्रेड्स होते हैं।

इसरो प्रमुख के सिवन, फोटो सोर्स: गूगल
इसरो प्रमुख के सिवन, फोटो सोर्स: गूगल

अब फिलहाल में इसी मुद्दे को एक बार फिर से उठाया गया है और सरकार से यही सवाल पूछा जा रहा है कि ISRO के वैज्ञानिको के साथ ये कैसा इंसाफ है? सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को तेजी से उठाया जा रहा है। एक ट्वीटर यूजर्स ने लिखा है कि

क्या यह हमारे असली हीरो ISRO के वैज्ञानिकों के साथ क्रूर मजाक नहीं है।  

मामला जितना भी गंभीर हो लेकिन, एक बात तो इससे क्लियर हो गई है कि देश की आर्थिक स्थिति इतनी बदतर है कि सरकार भी खुद सरेंडर कर चुकी है। एक आरटीआई से पता चला था कि साल 2012-2017 के बीच सैलरी और अन्य कारणों की वजह से 289 वैज्ञानिक पद छोड़ चुके हैं। इसे इसरो के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

इसरो के जिन प्रमुख केंद्रों में से सबसे ज्यादा वैज्ञानिकों ने नौकरी छोड़ी है- वे हैं सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र तिरुवनंतपुरम, सैटेलाइट सेंटर बेंगलुरू और स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद। ये बाते इसलिए बताना जरुरी है  कि साल 2017 से पहले जब सरकार वज्ञानिकों और इंजीनियर्स को पूरी सैलरी के साथ इंसेंटिव और PRIS देती थी तो उस वक्त 289 वैज्ञानिकों ने पद छोड़ दिए और अब इसका कितना नुकसान उठाना होगा ये तो समय के साथ पता चलेगा।

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