हम ये मान कर चल रहे हैं कि जो भी ये आर्टिकल पढ़ रहे हैं वो काम-धंधा करने वाले हैं. ऐसा मानना हमारी मजबूरी है क्योंकि, बेरोज़गारी के बारे में बात करने से कुछ लोगों को तकलीफ होती है. जिन लोगों को तकलीफ होती है उनमें से कुछ लोग बेरोजगार भी होंगे और कुछ शायद काम-क़ाज़ी भी होंगे, पर वे सभी लोग दिमाग से बेरोज़गारी से ग्रसित हैं. तभी तो खुद बेरोजगार होकर भी कहते हैं कि रोज़गार तो बहुत है. ऐसे लोगों को अँधा कहते हैं और ऐसे लोगों के लिए ट्रेंडिंग वर्ड है अंधभक्त.

बेरोज़गारी की बात हम इस लिए कर रहे हैं क्योंकि मोदी जी ने कश्मीर में इतने पैसे ‘बांटे’ हैं कि अब फिर से उम्मीद जाग गयी है कि जॉब मिलेगी. ऐसी ही एक उम्मीद तब जागी थी जब GST लाया गया था पर समय के साथ-साथ GST के समय जागी हुई उम्मीद भी सो गयी. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 7 साल बाद 2018 में चुनाव हुआ था और तब से लेकर अब तक बीजेपी सरकार इन राज्यों को 2000 करोड़ रूपए दे चुकी है. इससे पहले मोदी सरकार ने ‘ग्रूप ऑफ़ मिनिस्टर’ का गठन किया था जो कश्मीर में किये जाने वाले डेवलपमेंट का ब्लूप्रिंट बना रही है. बिना कश्मीरियों को साथ लिए क्या किसी तरह का डेवलपमेंट संभव है?

वैसे आपको बता दें कि सरकार ने बिना किसी योजना के पैसे बाँट दिए हैं. किन योजनाओं पर कश्मीर में काम होना है यह अभी तक तय नहीं हुआ है लेकिन, योजनाओं में लगने वाली राशी बांटी जा चुकी है. ऐसा न हो कि सरकार की योजना तैयार होने तक योजनाओं वाली राशि खर्च हो जाए. इस अमीर सरकार द्वारा विकास कार्य के लिए बांटा गया पैसा गाँवों तक पहुँच चूका है पर पंचायत को समझ ही नहीं आ रहा कि वह इस पैसे को किस विकास काम में लगाये.

फोटो सोर्स गूगल

जो ‘ग्रूप ऑफ़ मिनिस्टर’ का गठन किया गया है उसके मेंबर हैं रवि शंकर प्रसाद, थावर चंद गहलोत, नरेंदर तोमर और धर्मेन्द्र प्रधान. ये अनुमान लगाया जा रहा है कि यह लोग अपनी रिपोर्ट 31 अक्टूबर तक सरकार को सौंपेंगे. समझ ये नहीं आ रहा हैं कि सरकार ज़रुरत के हिसाब से डेवलपमेंट करना चाहती है या पैसे के हिसाब से डेवलपमेंट. एक और अहम सवाल यह भी है कि अगर आवंटित राशी से कम में डेवलपमेंट का काम हो गया तो क्या पंचायत पैसा सरकार को लौटा देगी? ऐसी कोई खबर तो कभी सुनी नहीं है पर हो सकता है ऐसा हो. क्योंकि सरकार तो ‘हरिश्चंद’ की है इसलिए पैसे पहले बंटवा दिए. जानते हैं कि अगर कम में काम हो गया तो पैसे वापस आ जायेंगे.

जब सरकार से सवाल पूछा गया कि पैसे पहले क्यों दे दिए गए, तब उनका कहना था कि पंचायत और सरपंच को सशक्त करने के लिए पैसे दिए गए हैं. सशक्त करना था तो दूध, दही बंटवा देते. पंचायत इन सब चीज़ों को खा कर बलिष्ट हो जाता या तो फिर योजनाएं बता देते जिस पर पंचायत काम करके खुद को सशक्त करती. इस तरह से कौन-सा सशक्तिकरण सरकार कर रही है?

कश्मीर, फोटो सोर्स गूगल
कश्मीर ,फोटो सोर्स गूगल

सरकार ने पहले 800-800 करोड़ करके 4 इनस्टॉलमेंट में वहां के पंचायतों को पैसे भेजने का फैसला किया है. पहला इनस्टॉलमेंट उनके खाते में भेजा जा चुका है. यह पैसा उस वक़्त बांटा गया जब वहां डेवलपमेंट का चर्चा शुरू ही हुआ था. इसके बाद सरकार ने पिछले हफ्ते और 1200 करोड़ रूपए देने का ऐलान किया. अगर इतना ही सरकार के पास अथाह पैसा है तो सरकार ये पैसे और भी डेवेलपमेंट के काम में लगा सकती हैं क्योंकि डेवलपमेंट के मुद्दे सिर्फ कश्मीर में नहीं है.

शीतल नंदा जम्मू-कश्मीर के पंचायती राज और रूरल डेवलपमेंट की सेक्रेटरी हैं. द प्रिंट से बात करते हुए उन्होंनें बताया कि पहली बार इतना बड़ा अमाउंट जम्मू-कश्मीर को डेवलपमेंट के नाम पर दिया गया है. जितनी राशि इस बार दी गयी है उतना 2011 से 2016 तक नहीं दी गयी थी. शीतल नंदा ने यह भी बताया कि पैसे डायरेक्ट सरपंच के अकाउंट में जा रहे हैं इससे उसे बार-बार सरकारी कार्यालय जाने की ज़रुरत नहीं पड़ रही है. नंदा का यह भी कहना है कि पैसे ट्रान्सफर होने के बाद यह ज़िम्मेदारी सरपंच की है कि वह पैसे को कहाँ खर्च कर रहा है.

शीतल नंदी/फोटो सोर्स गूगल
शीतल नंदी/फोटो सोर्स गूगल

कितने पैसे किस राज्य को दिए जायेंगे ये फैसला वहां का क्षेत्र और जनसँख्या के हिसाब से तय किया जाता है.वैसे इतना कुछ सुन कर लग तो ऐसा रहा है कि कश्मीर में कुछ अच्छा होने वाला है. पर हमें लगता नहीं है कि कोई डेवलपमेंट की ज़रुरत है क्योंकि जब लोग घरों में ही बंद रहेंगे तो डेवलपमेंट करके क्या ही फायदा?

         

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