अनुराग कश्यप. यह नाम पढ़ते ही आपके दिमाग में पहली चीज़ क्या आई? ठांय की आवाज़? बुशर्ट पर लगा खून? इसके अलावा कुछ? एक जीप. नवाज़ुद्दीन के मुँह से गाली. और?

अनुराग कश्यप आज 47 साल के हो गए हैं. ज़िन्दगी के इन 47 सालों में से 22 साल उन्होंने सिनेमा को दिए. बॉलीवुड को दिए. इस देने में उन्होंने बॉलीवुड को क्या कुछ नहीं दिया. बिस्तर पर लेटे आपके माशूक की आवाज़ से ज़्यादा महीन लिखाई दी. नानी-दादी से हट कर कहानियां दी. इंसान नहीं दिया. लेकिन इंसान बनाने के लिए मांस, खून और भावनाएं दे दी. भावनाओं में उसने सनक, हवस, प्यार और पाप दे दिया. लेकिन, बदले में बॉलीवुड ने उसे एक ही इमेज दी.

इमेज; जिसमें कट्टा हाथ में लेकर एक आदमी खड़ा है, जो अपनी स्क्रिप्ट में किसी भी वक़्त, किसी पर भी गोली और गाली चला देगा.

फोटो क्रेडिट- फोर्ब्स इंडिया

भारतीय सिनेमा को ‘कल्ट सिनेमा’ में बदल देने वाले अनुराग कश्यप पर यह आरोप लगता आया है कि उन्होंने हिंसा, क्रूरता और खून को हमेशा Glorify किया, उसका महिमामंडन किया। क्या सच में अनुराग कश्यप ने सिनेमा को यही दिया है? क्या AK-47 और गालियों से परे हट कर भी कोई अनुराग है?

ओ वुमनिया

2009 में आई ‘देव डी’ और 2013 में रमन राघव. देव डी से पहले देवदास के कई वर्ज़न आ चुके थे. लेकिन, देव डी और बाकियों के बीच एक मूल अंतर था. पारो. देव के जाने के बाद ये पारो कुछ समय परेशान है लेकिन, फिर अपने जीवन में आगे भी बढ़ जाती है. देव को संभालने जब पारो आती है तो पता चलता है कि वक़्त के साथ पारो ‘स्मार्ट’ हो गई है. वही पारो जिसे किसी और के साथ सेक्स करने का इल्जाम लगा कर छोड़ दिया जाता है, वही पारो देव को बोलती है कि वो अपने पति के साथ अपनी सेक्स लाइफ में खुश है. इससे उलट देव अपनी Toxic Masculinity (जहर पुरुषत्व) के साथ शराब पीता है और सड़ जाता है.

रमन राघव फिल्म के एक सीन में सिम्मी, राघव से शादी के बारे में पूछती है. राघव अपनी Toxic Masculinity के साथ सिम्मी को धमकाता है, अपनी बन्दूक से डराता है. पीछे से सिम्मी की मम्मी का फ़ोन आता है और सिम्मी फ़ोन पर ऐसे बात करती है, मानों राघव उसके जीवन में कोई हो ही न. राघव की Masculinity खतरे में बौखला उठती है, जिसे राघव संभाल नहीं पाता। वो बाथरूम में जाता है और उसी बौखलाहट के साथ रोता है।

Raman Raghav 2.0

ये दोनों फ़िल्में डार्क है. अधेड़ हैं. एक साँस में देख डालेंगे तो हो सकता है हिंसक भी लगें. लेकिन, एक परत के नीचे देखेंगे तो अनुराग की बुनी अलग ही दुनिया दिखती है.

सिस्टम

अंग्रेजी के एक महान लेखक हुए थे. फ्रेंज़ काफ्का। सिस्टम में फंसे लोगों पर लिखने के लिए वो इतना फेमस हुए कि मुसीबत में पड़े किसी भी ऐसे आदमी, जिसकें चारों ओरर की चीजें उसे नीचे गिराने में लगी हों, के हालातों को ‘काफ़्काईन सिचुएशन’ बोलने लगे. अनुराग उसी ‘काफ़्काईन सिचुएशन’ का भारतीय वर्ज़न पर्दे पर दिखाते हैं.

मुक्केबाज में श्रवण सिंह को हर तरीके की मुश्किलों से लड़ना पड़ता है. जातिवाद, सरकारी भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता, गरीबी वगैरह-वगैरह. श्रवण इन सब चीजों से बाहर भी निकलता है. लेकिन भगवान बन कर नहीं, इंसान बन कर। सिस्टम से लड़ते हुए खिलाड़ियों की कहानियां सबने दिखाईं। लेकिन उन खिलाड़ियों को अंत में भगवान बना दिया गया. लेकिन अनुराग का मुक्केबाज खिलाड़ी ही रहता है, इंसान ही रहता है।

प्रेम, किन्तु जमीनी

क्या तुमने कभी किसी से प्यार किया? हाँ, किया। लेकिन बॉलीवुड वाला नहीं।

अनुराग अपने किरदारों को प्यार तो करवाते हैं. लेकिन, जमीनी। मनमर्ज़ियाँ में रूमी, विक्की से प्यार करती है. विक्की भी रूमी से प्यार करता है. लेकिन, अपने नेचर की वजह से दोनों शादी नहीं कर पाते। आखिर में रूमी को रॉबी से शादी करनी पड़ती है. जो बदले में उसे वैसा ही प्यार देता है, जैसा कायदे से विक्की को दे देना चाहिए था. इस प्यार के त्रिकोण के बीच कारें नहीं उड़ती, केवल मुश्किलें और मम्मी-पापा, भाई-बहन के ताने हवा में उड़ते हैं. जैसा कि हर जमीनी प्यार की कहानी में होता है.

तो, अनुराग अपने किरदारों से प्यार भी करवाते हैं और खून भी. उनके किरदार गर्दन काटते फैज़ल खान भी होते हैं और सीट बेल्ट डालकर गाड़ी चलाते रॉबी भी

किरदारों की इस श्रृंखला में अगर आपको सिर्फ फैज़ल खान याद रहता है तो इसमें अनुराग की कोई गलती नहीं।

AK-47 और गालियों से परे हट कर एक अनुराग है. आपको वो नहीं दिखा, इसमें अनुराग की कोई गलती नहीं।