केरल के अलप्पुज़ा जिले में लोकप्रिय चेतिकुलंगरा देवी का मंदिर हैं. कई सालों से यहाँ एक प्रथा चलते आ रही है जिसका नाम है ‘चूरल मुरियल’. इस प्रथा में 10 साल से कम उम्र के बच्चों के छाती और पेट के बीच में से सोना, चांदी या बांस की सीक बदन के आर पार कर दी जाती है.

केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने साल 2017 के फरवरी में इस प्रथा पर बैन लगा दिया था. प्रतिबंध लगने के बावजूद मंदिर के अधिकारी और भक्त इस प्रथा को फिर से मनाने के लिए तैयार हैं और इसके लिए वह कानून को भी ताक पर रखने को तैयार हैं.

इस तरह के प्रथा से अगर कोई भगवान खुश होते हैं तो मैं ऐसा कोई भी भक्त बनने से बचना चाहूँगा। जो लोग इन बातों का समर्थन करते हैं वह इसलिए करते हैं क्योंकि यहाँ उनके बेटे के साथ अमानवीय सलूक नहीं हो रहा है. बच्चा किसी और का है तो हमे क्या ही फर्क पड़ता है.

चूरल मुरियल के लिए तैयार बच्चे, फोटो सोर्स – गूगल

साल 2016 में राज्य आयोग ने यह कह कर इस प्रथा पर रोक लगाई थी कि इस प्रथा में बच्चे को शारीरिक और मानसिक दर्द से होकर गुज़रना पड़ता है. मामला अदालत में भी गया लेकिन फरवरी 2018 में हाईकोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए बैन को बरकरार रखा.

क्या है ‘चूरल मुरियल’? 

इस प्रथा में माँ भद्रकाली की पूजा होती है. आम तौर पर, पड़ोस के अमीर परिवार के लोग एक सप्ताह के लिए 8 से 14 आयु के लड़कों को पैसे देकर खरीदते हैं और एक सप्ताह तक सबसे अलग रखते हैं. इन बच्चों के चेहरों को सफ़ेद रंग से रंगा जाता है. गले के चारों ओर फूल की माला पहनाई जाती है. सिर पर कागज से बना मुकुट पहनाया जाता है. इसके बाद एक सोने के सीक को छाती और पेट के बीच के हिस्से से आर-पार कराया जाता है.

बच्चे को तैयार किया जाता है चूरल मुरियल डांस करने के लिए. देवता के सामने डांस करने के बाद इस सोने की सीक को निकाल दिया जाता है और सीक पर लगी रक्त की बूंदों के साथ लड़के को भी देवी पर चढ़ाया जाता है. गुरुवार के दिन चूरल मुरियल मनाया जाएगा. 10 दिनों तक चलने वाला यह त्यौहार शिवरात्रि के दिन से ही शुरू हो जाता है और आखिरी दिन चूरल मुरियल के साथ खत्म होता है.

मंदिर के अधिकारियों ने बुधवार को कहा कि चूरल मुरियल केवल घरों में ही किया जा रहा है, मंदिर में नहीं. जो डांस सिखाता है उसने बताया है कि इस बार भी उसने कई लड़कों को डांस कि ट्रेनिंग दी है. उसने कहा –

“मैंने 13 समूहों में से दो को प्रशिक्षित किया है। लेकिन मैं अदालत के आदेश का सम्मान करता हूं, इस लिए मैंने उनके शरीर पर सुनहरे कुंडल छेदना बंद कर दिया है.” 

अब बताइये जिस संत महात्मा की बात हम मानते हैं अगर वही झूठ और ढोंग का व्यापार करने लगे तो कौन इन पर यकीन करेगा?  

अदालत के आदेश पर ध्यान नहीं देते हुए, मंदिर अधिकारियों ने 2018 के इस कथित समारोह में भाग लेने वाले 24 लड़कों के साथ इस रीति को निभाया था. डेक्कन क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भक्तों ने 26 लड़कों को चुना है. प्रोत्साहन जोकि एक एनजीओ है वह इस मुद्दे पर मदद लेने और मंदिर को अनुष्ठान करने से रोकने के लिए सरकार के उच्च अधिकारियों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है.

चूरल मुरियल के पीछे की कहानी

दरिका नाम का एक असुर था, जिसका वध भद्रकाली ने किया था. वध करने के बाद भी भद्रकाली काफी क्रोध में थी. उनका क्रोध देख कर शिव जी खुद उनके पैरों के नीचे आ गए. शिव जी के पैरों के नीचे आ जाने से वह काफी पछता रही थीं तभी शिव जी ने बच्चे का रूप धारण कर लिया जिसे देख कर वह काफी खुश हो गयीं. भद्रकली के साथ भूत रहते थे वह भद्रकाली को खुश देख कर नृत्य करना शुरू कर दिये. इसके आधार पर यह परंपरा चली आ रही है. बच्चों को इसी वज़ह से भगवान को सौंपा जाता है जिससे भद्रकाली खुश रहें और इसी कारण से बच्चों से डांस भी करवाया जाता है.

चूरल मुरियल अनुष्ठान, फोटो सोर्स -गूगल

बच्चों को काली को सौंपना और बच्चों को जख्म देकर अपने माँ को सौंपने में अंतर है. शिव जी ने बच्चे का रूप धारण किया होगा घायल बच्चे का नहीं. कहानी के अनुसार बच्चे शिव जी का रूप लेते थे, कहानी में यह देखकर भूत नाचने लगते हैं न की शिव जी। इस लिए बच्चों को नचाने का कोई तुक ही नहीं बनता है।

शुरुआत में पूजा करने वाले भक्त अपने बच्चों को इस अनुष्ठान के लिए भेजा करते थे. अपने बच्चों को कौन से माँ बाप इस दर्दनाक कुएं में धकेलना चाहेंगे? भक्त अपने बच्चों को इस प्रथा में भेजने की जगह किसी बाहर से बच्चे खरीद कर भेजने लगें।  इस तरीके से जब यह कार्यक्रम विफल होने लगा तब मंदिर के अधिकारियों ने भक्तों को बच्चे खरीदने की प्रथा करने की अनुमति दे दी.

सात दिन पहले से ही पूजा की विधि या कह ले कि बच्चों को प्रताड़ित करने का प्रोग्राम शुरू हो जाता है. उन्हे ठंडे पानी से नहाना पड़ता है. इन सात दिनों के दौरान नॉन-वेज खाना मना है. उन्हे खाना भी बहुत कम दिया जाता है. ज़मीन पर बिना कुछ बिछाये उन्हे सुलाया जाता है. पेट के पास की चमड़ी को हर दिन मरोड़ा जाता है ताकि सुई आराम से घुस सके. पूजा के आख़िरी दिन इन्हें मंदिर तक पैदल जाना होता है. चलते वक़्त सुई इनके बदन के आर-पार रहती है और इसी अवस्था में इन्हें दोनों हाथों को ऊपर करके डांस करना पड़ता है, जब तक वो मंदिर नहीं पहुँच जाये.

अगर यह सब ढोंग करने से ही शांति और समृद्धि मिलती तो मतलब केरल के बाहर के सभी लोग दुःखी ही होते. जिस भी देवी का पूजन हमारे हिन्दू समाज में होता है उन्हे हम माँ कह कर पुकारते हैं. माँ कभी नहीं चाहती की उसके बेटे को कोई खरोच भी आए. तो इसका मतलब यह है कि हम अपनी माँ के क्रोध का कारण बन रहे हैं. बच्चों को भी भगवान का स्वरूप बोला जाता है तो इसका मतलब हम भगवान को भी इसी तरह से सुई चुभो कर सजा दे रहे हैं.

वाह रे! समाज

आख़िर में आपसे हमारे कुछ सवाल हैं जिनका जवाब दिया जाना ज़रूरी है।

क्या इस प्रतारणा के लिए उस बच्चे की अनुमति ली जाती है ?

क्या किसी ग्रंथ में ऐसे किसी रिवाज़ का ज़िक्र है ?

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