अरुण शीतांश जी हिन्दी भाषा के कवि और आलोचक हैं। इनका जन्म बिहार राज्य के भोजपुर जिले में हुआ। इनकी प्रारम्भिक पढ़ाई-लिखाई अपने गृह जिले से ही सम्पन्न हुई। ये देशज (समकालीन हिन्दी पत्रिका) के मुख्य संपादक हैं। अपनी छंदमुक्त कविताओं से सभी का मन मोह लेने वाले अरुण शीतांश जी के नाम कई कविता संग्रह और आलोचना की किताबें हैं जिनमें, एक ऐसी दुनिया की तलाश में, हर मिनट एक घटना है, पत्थरबाज़, शब्द साक्षी हैं (आलोचना की पुस्तक) प्रमुख हैं।

अरुण शीतांश जी, फोटो सोर्स- गूगल

अरुण शीतांश जी, फोटो सोर्स- गूगल

चलिए ‘आज की कविता’ में आज आपको पढ़ाते हैं अरुण शीतांश जी की कविता,

‘बाबू जी’

किसी विज्ञापन के लिए नहीं आया था यहां
धकेल दिया गया था गले में हड्डी लटका कर
विष्णुपुरा से आरा
महज संयोग नहीं था
भगा दिया गया था मैं

बाबूजी
आपकी याद बहुत आती है
जब एक कंधे पर मैं बैठता था
और दूसरे कंधे पर कुदाल
रखे हुए केश को सहलाते हुए चला जाता था
खेतों की मेड़ पर गेहूं की बालियां लेती थीं हिलोरें
थके हारे चेहरे पर तनिक भी नहीं था तनाव

नरकी चाची चट पट खाना निकाल जमीन को पोतते हुए
आंचल से सहला देती थी गाल
आज आप पांच लड़कों पांच पोतों और दो पोतियों के बीच
अकेले हैं
पता नहीं अब आप क्यों नहीं जाते खेत
क्यों नहीं जाते बाबा की फुलवारी
फिर ढहे हुए मकान में रहना चाहते हैं
और गांव जाने पर काजू-किशमिश खिलाना चाहते हैं
आप अब नहीं खिलाते बिस्कुट
जुल्म बाबा की दुकान वाली
जो दस बार गोदाम में या बीस बार बोयाम में हाथ डाल कर
एक दाना दालमोठ निकालते जैसे जादू
सुना है उस जादूगर की जमीन बिक गई
अनेक लड़के धनबाद में बस गए
वहां आटा चक्की चलाते हैं
बाबू जी आपकी याद बहुत आती है
मधुश्रवा मलमास मेला की मिठाई
और परासी बाजार का शोभा साव का कपड़ा
आपके झूलन भारती दोस्त
सब याद आते हैं

सिर्फ याद नहीं आती है
अपने बचपन की मुस्कान…..

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