कैफ़ी आज़मी का असली नाम अख्तर हुसैन रिजवी था। उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के छोटे से गाँव मिजवां में 14 जनवरी 1919 में जन्मे। गाँव के भोले-भाले माहौल में कविताएँ पढ़ने का शौक लगा। भाइयों ने प्रोत्साहित किया तो खुद भी लिखने लगे। 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल लिखी।

कैफ़ी आज़मी उर्दू के एक अज़ीम शायर थे। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिए भी कई प्रसिद्ध गीत व ग़ज़लें भी लिखीं, जिनमें देशभक्ति का अमर गीत – “कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों” भी शामिल है।

कैफ़ी आज़मी, फोटो सोर्स- गूगल
कैफ़ी आज़मी, फोटो सोर्स- गूगल

किशोर होते-होते मुशायरे में शामिल होने लगे। वर्ष 1936 में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और सदस्यता ग्रहण कर ली। धार्मिक रूढ़िवादिता से परेशान कैफ़ी को इस विचारधारा में जैसे सारी समस्याओं का हल मिल गया। उन्होंने निश्चय किया कि सामाजिक संदेश के लिए ही लेखनी का उपयोग करेंगे।

चलिए आज की कविता में आज आपको पढ़ाते हैं कैफ़ी आज़मी साहब की नज़्म,

‘लश्कर के ज़ुल्म’

 दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए
जो सर उठा के निकले थे बे-सर के हो गए

ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी
देखा जो मुड़ के हमनें तो पत्थर के हो गए

जब सर ढका तो पाँव खुले फिर ये सर खुला
टुकड़े इसी में पुरखों की चादर के हो गए

दिल में कोई सनम ही बचा, न ख़ुदा रहा
इस शहर पे ज़ुल्म भी लश्कर के हो गए

हम पे बहुत हँसे थे फ़रिश्ते सो देख लें
हम भी क़रीब गुम्बदे-बेदर के हो गए

ये भी पढ़ें- आज की कविता में पढ़िए ‘जावेद अख़्तर’ की ग़ज़ल ‘जो बात कहते डरते हैं सब’