वसीम बरेलवी का नाम अपने ख़ूब सुना होगा, उनकी ग़ज़लें, नज़्में व कई अन्य रचनाएं अपने पढ़ी/सुनी भी होंगी। वसीम बरेलवी का असली नाम ज़ाहिद हसन है, जो एक प्रसिद्ध उर्दू शायर हैं। वसीम बरेलवी, बरेली (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले हैं। आज कल बरेली कालेज, बरेली (रुहेलखंड विश्वविद्यालय) में उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। वसीम ने आगरा यूनीवर्सिटी से एम-ए उर्दू किया। उर्दू भाषा के लेखक वसीम, अपनी ग़ज़लों, नज़मों के लिए बहुत मशहूर हैं। उनके द्वारा लिखी गईं कई किताबें भी उपलब्ध हैं।

वसीम बरेलवी, फोटो सोर्स- गूगल
वसीम बरेलवी, फोटो सोर्स- गूगल

चलिए आज की कविता में आज आपको पढ़ाते हैं, वसीम बरेलवी की प्रसिद्ध रचना,

‘तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते’

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

वसीम जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

ये भी पढ़ें- आज की कविता में पढ़िये सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागो फिर एक बार’