विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार हैं। शुक्ल जी ने प्राध्यापन को रोज़गार के रूप में चुनकर पूरा ध्यान साहित्य सृजन में लगाया। उनकी एकदम भिन्न साहित्यिक शैली ने परिपाटी को तोड़ते हुए ताज़ा झोकें की तरह पाठकों को प्रभावित किया, जिसको ‘जादुई-यथार्थ’ के आस-पास की शैली के रूप में महसूस किया जा सकता है।

विनोद कुमार शुक्ल, फोटो सोर्स- गूगल
विनोद कुमार शुक्ल, फोटो सोर्स- गूगल

उनका पहला कविता संग्रह 1971 में ‘लगभग जय हिन्द’ नाम से प्रकाशित हुआ। 1979 में ‘नौकर की कमीज़’ नाम से उनका उपन्यास आया, जिस पर फ़िल्मकार मणिकौल ने इसी से नाम से फिल्म भी बनाई। कई सम्मानों से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल को उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए वर्ष 1999 का ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। विनोद कुमार हिंदी कविता के वृहत्तर परिदृश्य में अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट और संवेदनात्मक गहराई के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने समकालीन हिंदी कविता को अपने मौलिक कृतित्व से सम्पन्नतर बनाया है और इसके लिए वे पूरे भारतीय काव्य परिदृश्य में अलग से पहचाने जाते हैं।

चलिए ‘आज की कविता’ में आज आपको पढ़ाते हैं, विनोद कुमार शुक्ल की कविता,

‘हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था’

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था 

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था 

हताशा को जानता था 

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया 

मैंने हाथ बढ़ाया 

मेरा हाथ पकड़ कर वह खड़ा हुआ 

मुझे वह नहीं जानता था 

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था 

हम दोनों साथ चले

दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे 

साथ चलने को जानते थेl

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