(यह कश्मीर 370 Edition है, स्पेशल ऑर्डर पर आप असम NRC edition भी मंगवा सकते हैं)


यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?

~सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

यह पुरानी कविता है. अब नई सुनिए

यदि तुम्हारे देश के एक राज्य में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे राज्य में
सब भूल कर
वीकेंड एन्जॉय कर सकते हो?

~मैं

हफ्ते में 7 दिन. 7 दिनों में से 6 दिन काम और एक दिन – बमुश्किल आराम. उस एक दिन में भी यदि कोई पत्रकार अपनी रिपोर्ट दिखा-दिखा कर आप की नींद उड़ाए और आपको बताए कि किस तरह 70 लाख लोगों को देशहित में उनके घरों में बंद कर दिया गया है, तो यकीनन आप उस पत्रकार को Ramon Magsaysay की जगह पंडित दीन दयाल उपाध्याय चाटा पुरस्कार जड़ देना चाहेंगे. लेकिन, गाँधी जी के देश में आपको अहिंसा करने की जरूरत बिल्कुल नहीं है. वो काम तो सरकार कश्मीर में कर ही रही है. आपको जरूरत है हमारी गाइड फॉलो करने की.

उत्पीड़न का शिकार एक कश्मीरी. फोटो क्रेडिट- बीबीसी
इस तरह की ग्राउंड रिपोर्ट देखने से आपको बचना है. उत्पीड़न का शिकार एक कश्मीरी. फोटो क्रेडिट- बीबीसी

यह गाइड खास तौर पर उन लोगों के लिए बनाई गई है जो राजनीति में अभी कच्चे हैं और आज भी समझते हैं कि नोटबंदी से कालाधन खत्म हुआ है. पत्रकारिता न्यूट्रल बनी रहे, इसलिए हमनें इस गाइड को 100% एजेंडा फ्री रखा है.

यदि आप कश्मीर में लगी आग भूलना चाहते हैं, तो बिना सोचे-समझें इन तरीकों को अपना लें. सत्तर सालों से नेताओं ने आपकी आँखों में धूल झोंकी है, एक मौका हमें भी दें:

इंटरनेट चलाएं क्योंकि आप चला सकते हैं:

पड़ोसी राज्य की आग भूलने के लिए आप इंटरनेट चला सकते हैं. लोगों की जान के अलावा देश में कोई दूसरी चीज़ सस्ती है, तो वो इंटरनेट डेटा ही है. इस्तेमाल कीजिए. क्योंकि आप कर सकते हैं. यह सोच कर कीजिए कि आप कर सकते हैं, बगल राज्य वाला नहीं. यह विचार अपने आप में ही सुकून है.

बल्कि, आप अपने किसी कश्मीरी दोस्त के साथ प्रैंक भी खेल सकते हैं. यदि आपकी कोई कश्मीरी दोस्त है तो उसे व्हाट्सप्प पर Hey लिख कर मैसेज भेजिए. जाहिर है उसका जवाब नहीं आएगा, वहाँ संचार सेवाएं बंद हैं। आप फिर मैसेज कीजिए, “Hi” जाहिर है, उसका जवाब फिर नहीं आएगा.

अब आप एक महीना और इतंज़ार कीजिए और फिर मैसेज कीजिए, Hi, there? अगर इस बार भी जवाब न आए तो आप उसे ये सोचकर ब्लॉक कर सकते हैं कि वो वहां है ही नहीं. शायद वो शादी कर के बिहार या हरियाणा शिफ्ट हो गयी हों.

बिना इंटरनेट के समय बिताने के लिए खिड़की से बाहर झांकते कश्मीरी
बिना इंटरनेट के समय बिताने के लिए खिड़की से बाहर झांकते कश्मीरी

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
मैसेज कर कि व्हाट्सप्प चल रहा है तेरा

~मुआफी समेत, फैज़ अहमद फैज़

डिस्कवरी पर कोई डॉक्यूमेंट्री देखें:

कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है और ज़्यादा समझदार दिमाग एंटी-नेशनल्स का (हिंट: JNU). इसलिए कोशिश करें कि आपका दिमाग खाली ही न रहे. टीवी ऑन करें और डिस्कवरी चैनल पर कोई डॉक्यूमेंट्री देख लें. कोशिश करें कि डॉक्यूमेंट्री किसी विदेशी जगह, विदेशी नेता की हो.

खुद के देश की असल समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए दूसरें देशों पर ध्यान आप सरकारों के कहने पर तो सदा से लगाते आए ही हैं. आज यह काम खुद से भी करके देख सकते हैं.

मसलन आप हिटलर की डॉक्यूमेंट्री देख सकते हैं. आपका टाइम पास करने के अलावा यह डॉक्यूमेंट्री आपको मोदी सरकार की नीतियां भी समझा देगी.

कहते हैं कि हिटलर एक अच्छा वक्ता था
कहते हैं कि हिटलर एक अच्छा वक्ता था

मीडिया ब्रह्मास्ति (मीडिया ही ब्रह्मा है):

यदि डॉक्यूमेंट्री आपको थोड़ी बोरिंग लगे और आपका ध्यान बार-बार कश्मीरियों की ओर जा रहा हो तो आप कुछ मसालेदार देख सकते हैं. ऐसा कुछ जिसमें फैक्ट्स कम हों और फिक्शन ज्यादा. मसलन आप डीएनए feat. सुधीर चौधरी देख सकते हैं.

न्यूज़ चैनल आप बेशक कोई भी देखें, बस कोशिश ये रहे कि वो चैनल ग्राउंड रिपोर्ट्स की जगह opinion दिखा रहा हो. दरअसल, ग्राउन्ड रिपोर्ट दिखाने वाले चैनल्स सत्य की खोज कर रहे होते हैं. जबकि opinion दिखाने वाले चैनल्स सत्य बना रहे होते हैं. हिन्दू mythology के अनुसार ब्रह्म सत्य बनाते हैं, सृष्टि बनाते हैं. ये चैनल भी छोटे-मोटे ब्रह्म से कम नहीं हैं. पूरी सृष्टि नहीं तो एक राज्य में शांति तो खुद से बना ही देते हैं.

मीडिया के ब्रह्मा होने का सुबूत
मीडिया के ब्रह्मा होने का सुबूत

भक्ति ही शक्ति है:

यदि इनमें से कोई भी तरीका काम न आए तो आप मैडिटेशन का सहारा ले सकते हैं. लेकिन, अमेज़न के ज़माने में बीसीयों ऑप्शन में से चुनना भी मुश्किल हो जाता है. किसी अन्य तरीके की परेशानी में आप मैडिटेशन का कोई भी तरीका चुन सकते हैं. लेकिन, राजनीतिक समस्या के लिए चुनिए केवल भक्ति, नेता जी की भक्ति.

एक ज़माना था जब लोगों के इष्ट देवता हुआ करते थे. इष्ट यानि पसंदीदा. लेकिन, अब इष्ट देवता नहीं, इष्ट नेता ट्रेंड में हैं.

इष्ट नेता इज़ द न्यू कूल.

इष्ट नेता डोनाल्ड ट्रम्प
इष्ट नेता डोनाल्ड ट्रम्प, फोटो क्रेडिट- रजत गुप्ता, European Pressphoto Agency

दरअसल, इष्ट देवताओं की पूजा करने के लिए खुद को पवित्र बनाना पड़ता था. पवित्र देवता, पवित्र उनके भक्त. लेकिन, इष्ट नेताओं के साथ ऐसा कोई झंझट नहीं है. आप चोर, डकैत, भ्रष्टाचारी क्या हैं, इष्ट नेता को घंटा फर्क नहीं पड़ता. बस भक्ति आती रहनी चाहिए.

एक छुट्टी सबका अधिकार है. किसी दूसरे के चक्कर में आप इसे बर्बाद न करें. खास कर किसी ऐसे के चक्कर में तो बिल्कुल नहीं जो खुद पिछले एक महीने से स्कूल, कॉलेज और दुकान बंद करके घर में बैठा छुट्टी मना रहा हो.

और अब आखिर में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी कविता “देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता” की चंद लाइनें और:

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है

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