सड़कें जो यातायात का सबसे बड़ा साधन हैं. जो हमें गांव, कस्बों, शहरों और देश के अन्य हिस्सों से जोड़ती हैं. जो हमारी एक मूलभूत जरूरत हैं. उन्हीं सड़कों पर जगह-जगह गड्ढे हैं. समझ नहीं आता कि ‘सड़कों में गड्ढे हैं या गड्ढे में सड़कें’. जो लोगों के लिए परेशानी और दुर्घटना का सबब बनती हैं. बारिश के बाद स्थिति बद से बदतर हो जाती है. जगह-जगह नाले बह रहे होते हैं. सीवर के ढक्कन खुले होते हैं. जिसके कारण कई लोग हर साल दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं, अपनी जाने गंवाते हैं.

वहीं इस ओर सरकार की उदासीनता कई सवाल खड़े करती है. सरकार कब तक अपनी जिम्मेदारियों से भागेगी? दरअसल बात ऐसी है कि लोकसभा में सोमवार को द मोटर व्हीकल्स (अमेंडमेंट) बिल 2019 पास हुआ. इस बिल में मोटर दुर्घटना से मौत पर 5 लाख और गंभीर रूप से घायल होने पर 2.50 लाख रुपये देने का प्रावधान किया गया. बिल को सड़क परिवहन राज्य मंत्री वीके सिंह ने पेश किया. बिल में यातायात नियमों को तोड़ने पर ज्यादा जुर्माना, ऑनलाइन लाइसेंस देने, इंश्योरेंस की प्रक्रिया को आसान करने और दुर्घटना के शिकार लोगों को बचाने वालों की हिफाज़त से जुड़े तमाम तरह की बातें की गई. पर इन गड्ढों पर कोई बात नहीं की गई.

वहीं बिल पेश होने के दौरान केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि,

“हम मानते हैं कि पिछले पांच सालों में सड़क दुर्घटना में इज़ाफा हुआ है. हमारा विभाग इसे रोकने में नाकाम रहा है.”

पर सवाल ये उठता है कि क्या केवल अपनी गलती मान लेने से काम चल जाएगा? सरकार की लापरवाही के कारण जो लोग अभी भी अपनी जाने गंवा रहे हैं उनका क्या? सरकार सिर्फ बिल बनाने, बिल पेश करने, लोगों पर जुर्माना लगाने या मुआवज़ा देने के लिए नहीं होती है. सरकार का काम सबसे पहले अपनी खामियों को दूर करना भी होता है.

 

प्रतीकात्मक तस्वीर गड्ढों भरी सड़क, फोटो सोर्स: गूगल

आपको बता दें देश में प्रतिदिन 10 लोग सिर्फ सड़कों पर गड्ढे होने की वज़ह से अपनी जान गंवा देते हैं. ये कितना खतरनाक है इसका अंदाज़ा आप सिर्फ़ इस बात से लगा सकते हैं कि 2017 में सड़क पर गड्ढों के चलते 3597 लोग मारे गए. वहीं 2016 में गड्ढों के कारण मरने वालों की संख्या 2324 थी. इसके अलावा सभी प्रदेशों की सरकारों ने गड्ढों की चपेट में आकर अपनी जान गंवाने वालों का जो आंकड़ा दिया है. उसके मुताबिक देश में प्रतिवर्ष हजारों लोग सिर्फ गड्ढों की वज़ह से सड़क दुर्घटना का शिकार होते हैं.

अगर इन आंकड़ों को विस्तृत ढंग से देखें, तो हम पाएंगे कि गड्ढों की वज़ह से उत्तर प्रदेश में 2016 में 714 लोगों ने अपनी जान गंवाई, वहीं 2017 में ये आंकड़ा बढ़ कर 987 हो गया. इसके अलावा महाराष्ट्र में 2016 में 329 लोगों ने गड्ढों की वज़ह से अपनी जान गंवाई, ये आंकड़ा भी 2017 में दो गुना हो गया तकरीबन 730 लोगों की मौत हुई थी. यही नहीं बीते साल जुलाई में 6 लोग गड्ढों की वज़ह से मारे गए थे.

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद सड़कों के गड्ढों की वज़ह से जान गंवाने के मामले में हरियाणा और गुजरात क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं. जहां 522 और 228 लोगों ने अपनी जान गंवाई. वहीं दिल्ली सबसे निचले पायदान पर है. जहां 2017 में 8 लोगों ने गड्ढों की वजह से अपनी जान गंवाई. जबकि 2016 में ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया था.

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सड़क के ख़तरनाक गड्ढे (प्रतीकात्मक तस्वीर), फोटो सोर्स- गूगल

इन सब आंकड़ों के सामने आने के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं. सरकार का रवैय्या पूरी तरह निराशाजनक है. उदाहरण के लिए आप एनएच-43 को देख सकते हैं जिस की हालत बद से बदतर है. कटनी गुमला राष्ट्रीय राजमार्ग सरगुजा ज़िले के अम्बिकापुर बतौली और सीतापुर (उत्तर प्रदेश) से गुजरती है. 2016 में आंध्र प्रदेश की एक कंपनी को टेंडर मिला था. मगर यहां अभी तक काम पूरा नहीं हुआ. आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और पूर्वी प्रदेशों के साथ दिल्ली तक को जोड़ने वाली इस सड़क की हालत बहुत खराब है.

एनएच-80, फोटो सोर्स: गूगल

ऐसी ही स्थिति भागलपुर के एनएच-80 की भी थी. जहां 28 जुलाई 2018 को भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने इसे लेकर प्रदर्शन भी किया था. जिसके बाद सड़क की मरम्मत को लेकर प्रशासन हरकत में आया था. इसके अलावा भागलपुर के ही नेशनल हाईवे 107 की मरम्मत को लेकर रिक्शेवाले से लेकर छात्रों तक ने प्रदर्शन किया था. जब गड्ढे में गिरने के कारण गर्भवती महिला की मौत हो गई थी. अगर सड़कों को समय रहते ठीक नहीं किया गया तो न जाने कितने लोग इसी तरह अपनी जानें गंवाते रहेंगे.

 

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