घुमावदार रास्ते, कभी चलते-चलते नीचे पहुंच जाते और कभी एक दम ऊंचाई पर। इन घुमावदार रास्तों से गुजरने के बाद जिंदगी सीधी लगने लगती है। चंबा शहर के बाद अब मैं टिहरी पहुंचने वाला था। 9 मार्च 2018 की सुबह-सुबह हम चंबा से टिहरी के लिये निकल पड़े। घुमावदार रास्ते जो पहाड़ों में अक्सर होते ही हैं। पीछे सब छूट रहा था चंबा, अड़बंगी पगडंडियां। कुछ देर बाद हम एक चौराहे पर खड़े थे, नई टिहरी।

टिहरी एक सच में पहाड़ वाला शहर लगता है। कम आबादी का शहर सुंदरता से भरा हुआ है। इसको मैंने और मेरे दोस्त ने पैदल ही नापा था। छोटा सा शहर है लेकिन लोग बड़े अच्छे हैं। हमने एक होटल लिया, बहुत ही सस्ता था और बेहद ही बढ़िया। कमरे में टी.वी. भी लगा हुआ था, टीवी चलाया तो कोई गढ़वाली गाना बजने लगा। फिर तो लगा कि हम भी गढ़वाली ही हो जाएं, हमारे जैसे पहाड़ के लोग नहीं हो पाते हैं। सामान रखा और हम टिहरी में अजनबी मुसाफिर की तरह निकल पड़े।

टिहरी या नई टिहरी

हम शहर वाले इस शहर को टिहरी के नाम से ही जानते हैं। यहां के स्थानीय लोगों ने बताया कि अब टिहरी नाम की कोई जगह नहीं है। जहां हम इस समय खड़े हैं वो नई टिहरी है। टिहरी डैम के कारण टिहरी शहर कब का डूब चुका है और सरकार ने वहां के लोगों को एक नये शहर में बसाया जिसका नाम रखा गया नई टिहरी।

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नई टिहरी सुंदर और सांस्कृतिक रूप से बसाया गया था। यहां दीवारों पर गढ़वाली संस्कृति दिखती है तो दूसरी ओर आधुनिकतापन लोगों में भी दिखता है। जिस जगह पर जाओ उसे एक बार नजर फेर कर देख लेना चाहिये, हम भी वही कर रहे थे। यहां हरिद्वार और ऋषिकेश से ज्यादा ठंड थी जो बदन को कपकपी दे रही थी। दिन में ये हाल था तो रात के पहर में अंदाजा लगाया जा सकता था कि क्या हाल होने वाला था?

हम पैदल चलते-चलते थक रहे थे और थकते-थकते कुछ खा लेते थे। जिससे शरीर में एनर्जी बनी रहे। हम पैदल ही पूरा शहर घूम चुके थे। यहां बैंक से लेकर सारी दुकानें थीं। चौराहे पर एक पुस्तक संग्रह भी बना हुआ था, जहां लिखा हुआ था कि आप अपनी पुरानी किताबें यहां रख सकते हैं। जिससे वो किसी और के काम आ सके। टिहरी ऊंचाई पर था जिसे चारों ओर पहाड़ों ने घेरा हुआ था। हिमालय श्रृंखला सामने ही दिख रही थी। मैं और मेरा दोस्त इस सुंदर दृश्य को तस्वीरो में सहेज रहे थे। एक अलग-सी खुशी हो रही थी यहां आकर। मानों हमारे पैरों को जमीं मिल गई हो।

Related imageयहां आने से पहले हमने इस जगह के बारे में ज्यादा खोजबीन नहीं की। हमें इस शहर के बारे में ज्यादा पता नहीं था लेकिन कभी-कभी बिना जानकारी के घूमना अच्छा होता है, बिल्कुल घुमंतूओं की तरह। हम चक्कर लगा रहे थे और यहां के लोगों से बातचीत कर रहे थे। हर शहर की एक कहानी होती और इसकी भी एक कहानी थी, टिहरी से नई टिहरी बनने तक की।

खामोश रात

हम शहर वालों को आदत होती है रात के पहर में शहर में घूमना-फिरना । हम वैसा ही इधर करने की सोच रहे थे। होटल मे रात का डिनर किया। जो होटल कम ढाबा ज्यादा था। उसके बाद जब हम चौराहे पर पहुंचे तो देखा चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है। पूरा बाजार बंद था, बस कुछ ढाबे खुले हुये थे। हमें बड़ा अजीब लग रहा था लेकिन हम दोनों ही रात के पहर में चलने लगे।

रात के पहर में आसमान बड़ा अच्छा लग रहा था। पूरा आसमान चांद और तारों से भरा हुआ था। बड़े अरसे के बाद मैं ऐसा देख पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि जाने कब से मोबाइल से सिर नहीं उठाया था। आज उठा रहा था तो अच्छा लग रहा था। हम शहर से आगे खुले रास्ते पर आये तो मंत्रमुग्ध हो गये। जो तारे आसमान में थे वे टिहरी के पहाड़ों में भी दिखाई दे रहे थे। मानोें किसी ने पहाड़ों पर आईना रख दिया हो और आसमां और पहाड़ एक हो गये हों।

टिहरी में हम एक शक्तिपीठ के बाबूजी से मिले। वे रात के पहर में हमें शक्तिपीठ ले गये और छत से पूरा पहाड़ के बारे में समझा रहे थे। उन्होंने कहा कि यहां की सुबह बड़ी प्यारी होती है आपको देखना चाहिये। हमें अगली सुबह टिहरी डैम जाना था लेकिन हम ऐसा दृश्य भी नहीं छोड़ना चाहते थे सो हम अगली सुबह आने के लिये मान गये।

खुशनुमा सुबह

अगले दिन कभी जल्दी न उठने वाला मैं बहुत जल्दी उठ गया। मैं ऐसा मौका छोडना नहीं चाहता था। हम जल्दी-जल्दी उठे और तैयार होकर अपने कैमरों और जज्बे के साथ उस छत की ओर बढ़ने लगे, जहां हम कल रात थे। शक्तिपीठ चौराहे से थोड़ा दूर था और सुबह होने वाली थी। हमने जल्दी पहुंचने के लिये दौड़ लगा दी। सुबह की जो ठंडक थी वो अब गर्म हो रही थी। हम जल्दी ही छत पर पहुंच गये।

रात के अंधेरे में जो पहाड़ ढके हुये थे वो अब साफ दिख रहे थे। दूर तलक बस पहाड़ और चोटियां। लग रहा था कि हिमालय की गोद में आकर खड़े हो गये हैं। सुबह चहचहा रही थी और उस सुबह में ऐसी जगह आकर हम दोनों ही खुश थे। हम इस दृश्य को तस्वीरों में कैद करने लगे। दूर तलक एक चोटी थी जो बर्फ से ढकी हुई थी। मैंने कभी बर्फ से ढंके पहाड़ नहीं देखे थे, आज देखकर खुशी हो रही थी और दुख भी कि वो इतने दूर क्यों हैं?

अचानक आसमां में लालिमा छाने लगी। पूरा आसमां लाल होने लगता है। अब सूर्य भगवान का आगमन होने वाला था। कुछ ही पलों के बाद दूर एक चोटी के पीछे से एक गोल चक्र निकलता है। देखकर मानों सुकून मिल रहा था, जिस लालिमा वाले सूरज को फिल्मों में देखा करता था उसे मैं अपनी आंखों से देख रहा था। कुछ ही देर बाद वो लाल सूरज नहीं दिखता है और उसके प्रकाश से सभी पहाड़ चमकने लगते हैं।

ऐसी जगह पर कौन नहीं आना चाहेगा जहां रात का पहर, दिन, सुबह सब देखने लायक है। यहां न भीड़भाड़ है और न ही शोर शराबा। ऐसी जगह तो मन मोहने वाली होती है।

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