भारतीय टेलीकॉम बाज़ार की हालत इस वक्त बेहद खराब है. मोबाइल बिल सीधे 100 रुपये तक बढ़ गए हैं. बाज़ार में केवल जिओ का एकाधिकार (Monopoly) हो गया है. एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसी कंपनियों को करोड़ों का नुकसान हो रहा है. कल को हो सकता है कि भारतीय कंपनी के नाम पर आपको सिर्फ जिओ ही देखने को मिले. सवाल उठ रहे हैं कि टेलीकॉम इंडस्ट्री में अचानक से ये क्या हो गया? वोडाफोन, एयरटेल और आइडिया जैसी ए ग्रेड टेलीकॉम कंपनियों की हालत इतनी कैसे खराब हो गई? दरअसल. जिओ के सस्ते प्लान, ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने की स्ट्रेटजी और AGR के बोझ ने इन कंपनियों की हालत खराब कर दी है. इन कंपनियों का सबसे बुरा हाल AGR (Adjusted Gross Revenue) ने किया है.

एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया और जीओ जैसी कंपनियों के टावर, प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

AGR (Adjusted Gross Revenue) क्या है?

AGR सरकार द्वारा टेलीकॉम कंपनियों से बतौर स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज और लाइसेंसिंग के लिए ली जाने वाली फीस है. पहले से नुकसान में चल रही भारतीय एयरटेल,आइडिया और वोडाफोन के लिए ये गले की फांस बन गया है. दरअसल, आइडिया-वोडाफोन को दूसरी तिमाही में 50,921 करोड़ का नुकसान हुआ है. वहीं एयरटेल को 23,045 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.

वहीं AGR की बात करें तो सिर्फ एयरटेल को सरकार के 43,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं. वहीं आइडिया और वोडाफोन को 40,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं.

यही वजह है कि अब एयरटेल ने अपनी कंपनी के शेयर बेचने का फैसला किया है. एयरटेल ने सरकार से 4,900 करोड़ रुपये की FDI (Foreign Direct Investment) को मंजूरी देने की मांग की है. भारतीय एयरटेल ये FDI सिंगापुर की सिंगटेल और अन्य कंपनियों से ले रहा है. अगर ऐसा होता है तो भारतीय एयरटेल विदेशी कंपनी बन जाएगी.

इस वक्त भारतीय एयरटेल के 52% शेयर भारती मित्तल और उनके परिवार वालों के पास हैं. जिस वजह से एयरटेल एक भारतीय कंपनी है. हालांकि, जैसे ही FDI को मंजूरी मिलती है. वैसे ही विदेशी कंपनियों का शेयर 50% से ज्यादा हो जाएगा, ऐसा होते ही एयरटेल भारतीय कंपनी नहीं विदेशी कंपनी बन जाएगी.

एयरटेल के पास पहले से ही 43% विदेशी शेयर होल्डर्स हैं. FDI को मंजूरी मिलने के बाद इनकी संख्या 84% हो सकती है. हालांकि, सरकार ने एयरटेल के FDI के आवेदन को नामंज़ूर कर दिया है.

वहीं आइडिया और वोडाफोन की खराब हालत को लेकर चैयरमेन कुमार मंगलम बिडला पहले ही संकेत दे चुके हैं कि अगर सरकार ने AGR में राहत नहीं दी तो आगे आने वाले समय में वो इन कंपनियों को बंद भी कर सकते हैं. इतना ही नहीं उन्होंने आगे इन कंपनियों में निवेश को लेकर भी अपने हाथ खड़े कर लिए हैं. उनका कहना है कि इसका कोई मतलब नहीं रह जाता कि डूबते पैसे में और पैसा लगाया जाए.

COAI (The Cellular Operators Association of India), फोटो सोर्स: गूगल

COAI (The Cellular Operators Association of India), फोटो सोर्स: गूगल

AGR को लेकर विवाद भी हो चुके हैं

भारत के दूरसंचार विभाग का कहना है कि AGR की रकम का निर्धारण कंपनी के सम्पूर्ण इनकम या रेवेन्यू के आधार पर होनी चाहिए. जिसमें कंपनी की आय के साथ-साथ डिपोजिट इंटरेस्ट और एसेट बिक्री जैसे गैर टेलीकॉम स्रोत की रकम को भी शामिल किया जाए. जबकि कंपनियों का कहना था कि AGR सिर्फ टेलीकॉम इनकम पर लिया जाए.

2005 में COAI (The Cellular Operators Association of India) ने सरकार की इस नीति को चुनौती दी थी. हालांकि, TDSAT (The Telecom Disputes Settlement and Appellate Tribunal) ने सरकार का साथ देते हुए COAI की याचिका को खारिज कर दिया.

इसके बाद टेलीकॉम कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. यहां पर भी टेलीकॉम कंपनियों को कुछ हासिल नहीं हुआ. उल्टा सुप्रीम कोर्ट ने दूरसंचार विभाग और सरकार को यह आदेश दिया कि वो इन कंपनियों के बकाया 94,000 करोड़ रुपये वसूले. जो ब्याज और जुर्माने के साथ बढ़ कर 1.3 लाख करोड़ रुपये हो गया.

इसी का सबसे ज्यादा असर पहले से नुकसान झेल रही आइडिया-वोडाफोन और एयरटेल पर पड़ा है. एक्सपर्ट्स ने पहले ही चेतावनी दी थी कि सरकार ने अगर इन कंपनियों को राहत नहीं दी तो स्थिति बद से बदतर हो जाएगी. एयरटेल का अपने शेयर बेचना इसी बदहाली की ओर इशारा कर रहा है.