साल 2014, जब केंद्र में मोदी सरकार आई थी तब उनके पास एक पार्ट टाइम रक्षा मंत्री था. तब वित्त मंत्री बने अरुण जेटली को ही रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त पदभार सौंपा गया था. उस समय सरकार के इस फैसले के समर्थन में ये तर्क दिये जा रहे थे कि इससे देश की सेनाओं को फ़ायदा पहुंचेगा क्योंकि वित्त मंत्री के हाथ में ही रक्षा मंत्रालय की भी चाबी थी जिससे सरकार सीधे तौर पर तीनों सेनाओं( थलसेना, वायुसेना, भारतीय नौसेना) की रक्षा जरूरतों को समझते हुए पैसे खर्च कर सकेगी.

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

लेकिन, अफसोस के साथ आपको बताना पड़ रहा है कि हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं हुआ. इससे पहले कि आप सिर्फ ये लाइन पढ़ कर गुस्से में हमें गरियाना शुरू कर दें. उससे पहले ये खबर पूरी जरूर पढ़ लें. वो क्या है कि यहाँ मामला देश की रक्षा से जुड़ी सैन्य जरूरतों का है भाई साहब न कि अलग-अलग विचारधाराओं की राजनीति का, जहां आप सब अपनी-अपनी पसंदीदा राजनीतिक पार्टियों का झण्डा पकड़े हुए बस नारे लगाए जा रहे हैं.

तो 2020 में आने से पहले आपको 2014 से अब तक के रक्षा बजट से जुड़े आंकड़ों से रूबरू कराते हैं क्योंकि राजनीतिक पार्टियों के तर्कों को आंकड़ों के तराजू में तोलने के बाद ही पता लगता है कि तर्कों की जमीनी हकीकत क्या है. चूंकि, हवा में तो सबको रोजगार मिल ही गया है, विदेशों से जमा काला धन वापस आ ही गया है, सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार न के बराबर रह गया है, राजधानी दिल्ली समेत देश में क्राइम रेट कम हो गया है, देश की GDP 5 फीसदी की रफ्तार से दौड़ ही रही है, पेट्रोल, डीजल, गैस, समेत घरेलू सामान सस्ता हो ही गया है, रेलवे, BSNL, एयर इंडिया जैसे सरकारी संस्थान फायदे में चल ही रहे हैं, सारे कश्मीरी पंडितों को घाटी में बसाया जा चुका है, 5 महीनों से इन्टरनेट बंद कर और आबादी के बराबर सुरक्षाबलों की तैनाती कर कश्मीर में चारों तरफ शांति ही शांति है, LoC पर सीज फायर उल्लंघन अब होते ही नहीं हैं, बॉर्डर पूरी तरह सील हो ही चुके हैं, आतंकी मसूद अज़हर और मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफ़िज़ सईद की गिरफतारी हो गयी है, सेनाओं पर हो रहे आतंकी हमले रुक गए हैं और अब सरकार की सबसे बड़ी हवाई हकीकत ये है कि अब हर दूसरे दिन मीडिया में जवानों के शहीद होने की खबरें आती नहीं हैं. समझदार बहुत हैं आप.

बस अब इससे आगे हमसे झूठ बोला नहीं जाएगा. लेकिन जो लोग बोल रहे हैं उनको तो आप बार-बार दिल देकर और दिमाग बंद करके सुन ही रहे हैं. तो सुनते रहिए.

फिलहाल अब हम आपके सामने रक्षा से जुड़े आंकड़े रखते हुए खबर तक पहुँचते हैं

10 जुलाई 2014 को केंद्र में बनी नई बीजेपी सरकार ने पहला बजट पेश करते हुए 2,33,872 करोड़ रुपये सेना के लिए आवंटित किए थे. यह आंकड़ा यूपीए सरकार के ज़रिए फ़रवरी 2014 में पेश किए गए अंतिम बजट से क़रीब 5 हज़ार करोड़ रुपये अधिक था. इस तरह मोटे तौर पर देखा जाए तो NDA सरकार ने सेना के लिए होने वाले ख़र्च में 9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की थी.

तत्कालीन रक्षा मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली, फोटो सोर्स - गूगल

तत्कालीन रक्षा मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली, फोटो सोर्स – गूगल

28 फ़रवरी 2015 में एनडीए सरकार ने अपना पहला पूर्ण बजट पेश करते हुए रक्षा के लिए 2,55,443 करोड़ रुपये आवंटित किए थे. इसके अगले ही साल 29 फ़रवरी 2016 को स्वर्गीय अरुण जेटली ने बजट तो पेश किया लेकिन इसमें उन्होंने अलग से सेना पर ख़र्च का ज़िक्र नहीं किया. जिसके बाद सरकार पर सवालिया निशान खड़े किए गए थे क्योंकि अनुमान यह लगाया जा रहा था कि रक्षा बजट में 2 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी. इसके बाद 1 फ़रवरी 2017 को जब वित्त मंत्री बजट के साथ हाज़िर हुए तो उन्होंने रक्षा बजट के तौर पर 2,74,114 करोड़ रुपये आवंटित किए. पिछले बजट की तुलना में इस बजट में क़रीब 6 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए सरकार ने सबको चौंका दिया था.

इसके बावजूद भी रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले  इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस (IDSA) के लिए लिखते हुए लेखक और रिसर्च फ़ैलो डॉ. लक्ष्मण के. बेहरा ने इस बजट को अपर्याप्त बताया था क्योंकि भारत अब भी अपनी ज़रूरत के 60 प्रतिशत हथियार विदेशों से आयात करता है.

इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस (IDSA) के लिए लिखने वाले लेखक और रिसर्च फ़ैलो डॉ. लक्ष्मण के. बेहरा, फोटो सोर्स - गूगल

इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस (IDSA) के लिए लिखने वाले लेखक और रिसर्च फ़ैलो डॉ. लक्ष्मण के. बेहरा, फोटो सोर्स – गूगल

इसके बाद 2018 के फ़रवरी महीने में बजट पेश किया गया, जिसमें 8 प्रतिशत की वृद्धि की गयी थी. पिछले साल रक्षा बजट के लिए 2,95,511 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. वहीं 2019 में मोदी सरकार के कार्यकाल का आख़िरी रक्षा बजट पेश करते हुए रक्षा मंत्री पीयूष गोयल द्वारा 3,18,847 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. जो पिछले साल के बजट की तुलना में 8 प्रतिशत ज्यादा था.

बीजेपी सरकार के पिछले 5 सालों के कार्यकाल के दौरान पेश किए रक्षा बजट के आंकड़े पढ़ कर आपको लग रहा होगा कि सब ठीक तो है. हर साल रक्षा बजट बढ़ाया तो गया है. बजट बढ़ रहा है मतलब तीनों सेनाओं की सारी जरूरतें पूरी हो रही होंगी.

मगर ऐसा है नहीं क्योंकि आप हम आम नागरिक हैं, कोई रक्षा विशेषज्ञ तो हैं नहीं. क्योंकि एक आम नागरिक के तौर पर जब हम सरकार द्वारा पेश किये गए बजट देखते हैं तो हमारी आखें  फट जाती हैं क्योंकि बजट तो अरबों-खरबों-फरबों रुपयों में होता है. बजट की इन संख्याओं में कितने ज़ीरो होते हैं इसका अंदाजा तक हमें नहीं होता है. तो फिर हम ये कैसे समझ सकते हैं कि आखिर देश की सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से सरकार द्वारा आवंटित किए गए पैसे पर्याप्त हैं या नहीं.

तो चलिये अब हम बताते हैं कि सरकार द्वारा पेश किए रक्षा बजटों पर रक्षा मामलों से जुड़ें जानकार और विशेषज्ञ क्या राय रखते हैं.

सबसे पहले आपको ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के बारे में बताते हैं जिसमें कहा गया है कि भारत अपने रक्षा बजट के लिए जितनी धनराशि आवंटित करता है, उसका 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा सैन्य अधिकारियों और सैनिकों के वेतन और उनके भत्तों पर खर्च हो जाता है. ऐसे में सेनाओं का आधुनिकीकरण करने और हथियार खरीदने के लिए फंड बहुत कम बचता है.

साल 2018 में बीजेपी के सांसद और वरिष्ठ नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने रक्षा बजट पर बोलते हुए कहा था कि

रक्षा विभाग पर GDP का सिर्फ 1.56 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च किया जा रहा है. जो साल 1962 में चीन से हुए युद्ध के बाद से सबसे कम है. 2 ऐसे पड़ोसी देशों जिनसे युद्ध होने संभानए अक्सर बनी रहती हैं ऐसे में भारत के लिए रक्षा बजट बहुत अहम हो जाता है.

बीजेपी के सांसद और वरिष्ठ नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी, फोटो सोर्स - गूगल

बीजेपी के सांसद और वरिष्ठ नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी, फोटो सोर्स – गूगल

इस साल NDA सरकार अपने दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश करने जा रही है, जिसको लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं कि देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होने के चलते सरकार रक्षा बजट पर ज़्यादा खर्च करने की स्थिति में नहीं है.

2018 के मार्च महीने में संसदीय समिति ने रक्षा बजट पर एक रिपोर्ट पेश करते हुए बताया था कि

पिछले कुछ सालों में वायुसेना के लिए खर्च होने वाली धनराशि के हिस्से में गिरावट आई है. जरूरत के अनुसार वायुसेना का आधुनिकीकरण करने के लिए जितनी धनराशि की आवश्यकता है उसमें भी गिरावट दर्ज की जा रही है.

भारतीय वायुसेना , फोटो सोर्स - गूगल

भारतीय वायुसेना, फोटो सोर्स – गूगल

साल 2018 में तब के भारतीय नौसेना एडमिरल सुनील लांबा ने कहा था, देश की GDP में भले ही गिरावट आई हो लेकिन, हमसे सरकार द्वारा जो वादा किया गया था उसके अनुसार रक्षा बजट लगातार ऊपर ही बढ़ा है. हम चाहते हैं इसमें और वृद्धि होती रहे हालांकि, कुछ अरचनें ज़रूर हैं और हम सभी उनसे अवगत भी हैं.

भारतीय नौसेना एडमिरल सुनील लांबा, फोटो सोर्स - गूगल

रिटायर्ड भारतीय नौसेना एडमिरल सुनील लांबा, फोटो सोर्स – गूगल

अब आते हैं मुख्य खबर पर

इस समय भारतीय नौसेना वित्तीय तंगहाली और बजट में भारी कटौती की समस्या से जूझ रही है, जिसके चलते जरूरी हथियार खरीदने से जुड़े सौदे प्रभावित हो रहे हैं. तंगहाली के आलम का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कुछ हो चुके सौदों के तहत खरीदे जाने वाले हथियारों की संख्या को भारतीय नौसेना को घटाना पड़ रहा है तो वहीं कुछ प्रोजेक्ट्स को बंद करना पड़ रहा है. मतलब रक्षा जरूरतों के साथ समझौता करना पड़ रहा है।

वित्तीय तंगहाली के चलते भारतीय नौसेना को अब तक किन-किन योजनाओं से हाथ खींचना पड़ा

मौजूदा बजट में नौसेना ने अनुमान लगाया था कि उसे 64,307 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएंगे लेकिन, उसे सिर्फ 41,259 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. जिस पर चिंता जताते हुए सैन्य अधिकारियों ने बताया कि यह रकम उन खरीद सौदों को पूरा करने के लिए भी काफी नहीं है जिन्हें पहले से ही साइन किया जा चुका है.

सूत्रों के हवाले से इकोनॉमिक टाइम्स ने रिपोर्ट छापी है जिसके अनुसार, अब भारतीय नौसेना माइन काउंटर मेजर वेसल्स (MCMVs) की संख्या में कटौती करने को मजबूर है.

माइन काउंटर मेजर वेसल्स (MCMVs), फोटो सोर्स - गूगल

माइन काउंटर मेजर वेसल्स (MCMVs), फोटो सोर्स – गूगल

इसके अलावा नेवी अब सिर्फ 8 युद्धपोत खरीदना चाहती है जबकि, सौदा 12 युद्धपोतों का हुआ था. यह सौदा 32,000 करोड़ रुपये में गोवा शिपयार्ड लिमिटेड को दिया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

इसी तरह भारतीय नौसेना अपनी जरूरत के अनुसार 10 हेलीकॉप्टर्स खरीदना चाहती थी लेकिन, अब 10 की जगह सिर्फ 6 कामोव KA 31 अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टर्स सिस्टम खरीदने की योजना है. इस प्रोजेक्ट में लगने वाली लागत 3,600 करोड़ रुपये आंकी गई थी.

भारतीय नौसेना का कामोव KA 31 हेलीकॉप्टर, फोटो सोर्स - गूगल

भारतीय नौसेना का कामोव KA 31 हेलीकॉप्टर, फोटो सोर्स – गूगल

वहीं नौसेना पिछले साल नवंबर में अमेरिका से फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) पैक्ट के तहत 10 P8I नेवी एयर क्राफ्ट खरीदने वाली थी लेकिन, अब इसकी संख्या घटाकर 8 कर दी गई. ये कॉन्ट्रैक्ट 21,000 करोड़ रुपये में किया गया था, जिसे बाद में घटाया गया.

भारतीय नौसेना का P8I एयरक्राफ्ट, फोटो सोर्स - गूगल

भारतीय नौसेना का P8I एयरक्राफ्ट, फोटो सोर्स – गूगल

इकोनॉमिक टाइम्स के सूत्रों के अनुसार, इंडियन नेवी ‘मेक इन इंडिया’ प्रोजेक्ट के तहत नौसेना कैडेट ट्रेनिंग शिप प्रोग्राम को भी बंद कर रही है. 2013 में 20,000 करोड़ रुपये की योजना से एक प्रोग्राम शुरू किया गया था जिसके तहत भारत में चार लैंडिंग प्लेटफार्म डॉक्स बनाने की प्लानिंग थी लेकिन, अब नौसेना इस योजना से भी हाथ पीछे खींचने की तैयारी कर रही है.

बता दें कि इस प्रोजेक्ट को 2018 में झटका लगा था, जब रक्षा मंत्रालय ने शॉर्टलिस्टेड कंपनियों लार्सन एंड टुब्रो और रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड (RNEL) के बीच कॉमर्शियल बिड्स खोलने की प्रक्रिया को रोक दिया था. इस योजना के जरिए एक प्राइवेट डॉकयार्ड में नेवी के लिए सबसे बड़ा युद्धपोत बनाया जाना था.

फोटो सोर्स - गूगल

फोटो सोर्स – गूगल

बता दें कि भारतीय नौसेना साल 2027 तक अपने जंगी बेड़े में 200 वॉरशिप शामिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही थी लेकिन, बजट में कटौती के कारण अब इसे घटाकर 175 कर दिया है. देखा जाए तो बजट की कटौती और तंगहाली के चलते न केवल भारतीय नौसेना के मौजूदा रक्षा सौदे प्रभावित हो रहे हैं बल्कि, भविष्य की तैयारियां भी प्रभावित हो रही हैं.

ये भी पढ़े – केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में आखिर कितनी ताकतवर हुई भारतीय सेना?

[/fusion_text][/fusion_builder_column][/fusion_builder_row][/fusion_builder_container]