भारत-पाक सीमा पर हैमगर और खेमकरण नाम के दो गांव बसे हैं. ये गांव अपने आप में बहुत ख़ास हैं क्योंकि इन गांवों का जर्रा-जर्रा भारतीय फौज के वीर जवानों के लहू से सिंचित है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद लिखे गए इतिहास का यह, वह स्वर्णिम पन्ना है, जिस पर हर भारतीय गौरवान्वित होता है. भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ी गई जंगों का जब-जब जिक्र होगा, तब-तब खेमकरण का नाम बड़े ही गौरव के साथ लिया जाएगा.

1965 जंग की एक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल
1965 जंग की एक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

खेमकरण गांव से करीब 7 किमी दूरी पर एक जगह है ‘आसल उताड़’ जिसका नाम खुद भारतीय सेना ने दिया था. इसकी एक वजह है. 1965 में पाकिस्तान से हुई जंग में इसी जगह पर भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फौज को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था.

1965 की जंग के दौरान खेमकरण , फोटो सोर्स - गूगल
1965 की जंग के दौरान खेमकरण , फोटो सोर्स – गूगल

पंजाब के अमृतसर से करीब 70 किमी दूर तरनतारन जिले में स्थित गांव में 1965 की जंग के सबसे बड़े जाँबाज़ योद्धा की मजार बनी हुई है. यह मजार बिल्कुल ठीक उसी जगह बनाई गई है जहां वो युद्द के दौरान वीर गति को प्राप्त हुआ था. इस समाधि पर हर मजहब के लोग आकर सजदा कर उस शहीद का शुक्रिया अदा करते हैं.

अब्दुल हमीद की मजार , फोटो सोर्स - गूगल
अब्दुल हमीद की मजार , फोटो सोर्स – गूगल

आज भी इस वीर को यहाँ के लोग देवता की तरह पूजते हैं. 1965 की जंग के उस वीर पराक्रमी योद्धा का आज शहादत दिवस है। जिसका नाम था ‘वीर अब्दुल हमीद’. 10 सितंबर, 1965 यानि आज के दिन ही अब्दुल हमीद वीरगति प्राप्त हुए थे.

परमवीर चक्र धारी वीर अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स - गूगल
परमवीर चक्र धारी वीर अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स – गूगल

अब्दुल हमीद के बारे में कहा जाता है, कि उन्होंने अकेले ही ‘आसल उताड़’ की धरती को पाकिस्तानी फौज के पैटन टैंकों की कब्रगाह बना दिया.

पाकिस्तानी टैंक, फोटो सोर्स - गूगल
पाकिस्तानी टैंक, फोटो सोर्स – गूगल

आज हम आपको 1965 की जंग के नायक रहे वीर अब्दुल हमीद के सौर्य और पराक्रम की वो कहानी बताएंगे. जिसकी वीरगाथा इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई है. जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा.

1 जुलाई, 1933 को अब्दुल हमीद का जन्म गाजीपुर जिले के धरमपुर गांव में रहने वाले एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद उस्मान पेशे से सिलाई का काम करते थे. बचपन से ही अब्दुल हमीद की मन लाठी चलाने, कुश्ती करने में, गुलेल से निशाना लगाने जैसे कामों में लगता था.

वीर अब्दुल हमीद की याद में बना मेमोरियल, फोटो सोर्स - गूगल
वीर अब्दुल हमीद की याद में बना मेमोरियल, फोटो सोर्स – गूगल

अब्दुल हमीद बचपन से ही जरूरतमंद लोगों की सहायता करने के लिए सबसे आगे रहते थे. उनके बचपन में 2  घटनाएं ऐसी घटी जो उन्हें बाकी के हमउम्र साथियों से अलग बनाती थी.

दरअसल एक बार उनके गाँव में एक गरीब किसान की फसल को ज़बरदस्ती काट कर ले जाने के लिए 50 गुंडे आये. जब इसकी खबर अब्दुल हमीद को लगी तो उनको ये ज़्याती बर्दाश्त नहीं हुयी और वो किसान की मदद करने पहुँच गए. जहां वो 50 गुंडों से अकेले ही भिड़ गए. अब्दुल हमीद ने सभी गुंडों को वहाँ से भगा दिया जिस वजह से गरीब किसान की फसल बच गयी.

उनकी बहदुरी की एक और कहानी सुनने को मिलती है जिसमें उन्होंने गाँव में आई भीषण बाढ़ में डूब रही दो युवतियों की जान बचायी थी.

वीर अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स - गूगल
वीर अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स – गूगल

बचपन से ही अब्दुल हमीद के मन में सेना में जाने का सपना पलने लगा था. अक्सर वह अपनी दादी से कहा करते थे कि- “मैं सेना में भर्ती होऊंगा”

1954 में महज 20 साल की उम्र में अब्दुल हमीद ने भारतीय सेना में एक सैनिक के रूप में अपना कार्य प्रारम्भ किया. 27 दिसंबर, 1954 को अब्दुल हमीद सेना की ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल हुए. उनकी रेजिमेंट की जम्मू कश्मीर में तैनाती के समय अब्दुल हमीद ने घुसपैठ कर रहे एक आतंकवादी इनायत अली को पकड़ा जिसके बाद उन्हें पदोन्नति (प्रमोशन) देकर सेना में लांस नायक बना दिया गया. 

शहीद वीर अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स - गूगल
शहीद वीर अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स – गूगल

1962 में भारत चीन के बीच युद्द छिड़ गया उस वक्त अब्दुल हमीद नेफा में तैनात थे. ऐसे वक्त में उनसे रहा नही जा रहा था और वो युद्द भूमि पर जाकर दुश्मनों से मुक़ाबला करना चाहते थे. लेकिन उनको मौका नहीं मिला.

वीर अब्दुल हमीद की दुश्मनों के सामने अपने पराक्रम और वीरता दिखाने की चाहत 1965 में हुए भारत पाकिस्तान युद्ध में पूरी हो गई. जहां उन्होंने साहस और सौर्य की वो दास्तान लिखी जो कई पीढ़ियों तक देशवासियों में जोश भरती रहेगी.

साल 1965 में जब पाकिस्तान से जंग होने की संभावनाएं बन रही थी, इसी दौरान अब्दुल हमीद छुट्टी लेकर अपने गांव गए थे.लेकिन, जैसे ही हेडक्वाटर से उन्हें वापस ड्यूटी पर आने का आदेश मिला तो वह जाने के लिए तुरंत उठ खड़े हुए. इस दौरान उनकी पत्नी रसूलन बीबी ने हमीद को रोकने की कोशिश की तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा – “देश के लिए मुझे जाना होगा, देश को मेरी जरूरत है.”

 वीर अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी, फोटो सोर्स - गूगल
वीर अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी, फोटो सोर्स – गूगल

इस दौरान उनका एक किस्सा है कि, जिस वक्त हमीद जाने के लिए अपना बिस्तरबंद बांध रहे थे तब उसकी रस्सी टूट गई. इसे अपशगुन मानकर उनकी पत्नी रसूलन बीबी उन्हें उस दिन जाने नहीं देना चाहती थीं लेकिन, भारत माँ का वो सपूत फर्ज के आगे एक पल भी न रुका.

छुट्टी से लौटने के बाद अब्दुल हमीद की पोस्टिंग पंजाब के तरनतारण जिले के खेमकरण सेक्टर में की गयी थी. जहां पाकिस्तानी फौज के हमले की आशंका थी. पाकिस्तानी फौज ने खेमकरण सेक्टर के असल उताड़ गांव पर हमला कर दिया. पाकिस्तानी सेना ने ये हमला अमेरिकन पैटन टैंक द्वारा किया था जो उस समय अपराजेय टैंक माने जाते थे. जिनका सामना करने के लिए भारतीय सैनिकों के पास साधारण सी “थ्री नॉट थ्री रायफल” और एल.एम्.जी. मशीन गन थी. वहीं हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास उनकी “गन माउनटेड जीप” थी जो पैटन टैंकों के सामने खिलौने के सामान थी.

अब्दुल  हमीद की माउनटेड जीप,फोटो सोर्स - गूगल'
अब्दुल हमीद की माउनटेड जीप,फोटो सोर्स – गूगल

बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 8 सितंबर 1965 की सुबह 9 बजे अब्दुल हमीद अपनी गन माउनटेड जीप के साथ चीमा गांव के बाहरी इलाके में गन्ने के खेतों में बैठे हुए थे. तभी उन्हें दूर से आते टैंकों की आवाज सुनाई दी. जो थोड़ी देर बाद उन्हें दिखाई भी देने लगे. चौकन्ना बैठे अब्दुल हमीद गन्नों की आड़ में छुप कर पाकिस्तानी टैंकों के अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतजार करने लगे. जैसे ही दुश्मन टैंक रेंज में आए उन्होंने फायर करना शुरू कर दिया.

1965 युद्द की एक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल
1965 युद्द की एक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

युद्ध के समय अब्दुल हमीद के साथ रहे साथी बताते हैं कि, युद्ध के दौरान अब्दुल हमीद ने सटीक निशाना लगाते हुए टैंकों के कमजोर हिस्सों को निशाना बनाते हुए एक के बाद एक दुश्मनों के 4 टैंकों को ध्वस्त कर दिया. उनको ऐसा करते देख बाकी सैनिकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तानी फ़ौज में भगदड़ मच गई. दुश्मनों के 4 टैंक उड़ाने की खबर 9 सितंबर को सेना के हेडक्वार्टर्स पहुँच गई. जहां से अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र देने की सिफारिश आगे भेज दी गई.

सेना का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान परम वीर चक्र, फोटो सोर्स - गूगल
सेना का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान परम वीर चक्र, फोटो सोर्स – गूगल

इसके बाद कुछ ऑफिसर्स ने बताया कि 10 सितंबर को उन्होंने दुश्मनों के 3 और टैंक नष्ट कर दिए थे. देखते ही देखते भारत का “असल उताड़” गाँव “पाकिस्तानी पैटन टैंकों” की कब्रगाह बन गया था. लेकिन, भागते हुए दुश्मनों का पीछा करते “वीर अब्दुल हमीद” की जीप पर पाकिस्तानी टैंक का एक गोला आकर गिरा और उनकी जीप के परखच्चे उड़ गए. इस हमले में अब्दुल हमीद बुरी तरह से घायल हो गए थे. जिस कारण 9 सितंबर को उनका स्वर्गवास हो गया. अब्दुल हमीद की शहादत की आधिकारिक घोषणा 10 सितंबर को की गई थी. उनके मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

मरणोपरांत वीर अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र से सम्मानित हुए अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स - गूगल
मरणोपरांत वीर अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र से सम्मानित हुए अब्दुल हमीद , फोटो सोर्स – गूगल

भारतीय डाक विभाग द्वारा 28 जनवरी, 2000 को वीरता पुरस्कार से सम्मानित वीरों के सम्मान में पांच डाक टिकटों के सेट में 3 रुपये का एक डाक टिकट जारी किया गया. इस डाक टिकट पर रिकॉयलेस राइफल से गोली चलाते हुए जीप पर सवार वीर अब्दुल हमीद की तस्वीर बनी हुई है.

डॉक टिकट पर छपी वीर अब्दुल हमीद की तस्वीर
डॉक टिकट पर छपी वीर अब्दुल हमीद की तस्वीर

वीर अब्दुल हमीद ने महज 11 वर्ष के अपने छोटे से कार्यकाल में अपनी बहादुरी का वो इतिहास रच दिया, जो आज भी भारतीय सेना में सूरज की तरह चमक रहा है. भारत माँ के ऐसे वीर सपूत के शहादत दिवस पर उन्हें शत-शत नमन!

 

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