इंदिरा गांधी ने 24 जनवरी 1966  को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज से एक बड़ी गलती हो गई थी, इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाकर। आगे चलकर यही इंदिरा सिंडीकेट और कामराज को उखाड़ फेंकने वाली थी। उससे पहले कांग्रेस इंदिरा का विरोध करने वाली थी, इंदिरा गूंगी गुड़िया से एक चतुर नेता बनने वाली थीं। इन सबकी वजह बनने वाला था एक फैसला जिसे इंदिरा ने देश के भले के लिए लिया था।

Image result for indira gandhi 1966इंदिरा गांधी ने अपने पिता को प्रधानमंत्री बनते और देश चलाते हुये देखा। इंदिरा गांधी शुरू में अपने ‘बापू’ की तरह ही रहना चाहती थीं। जब वे प्रधानमंत्री बन कर पहली बार संसद पहुंची तो, अपने शाल में गुलाब का फूल टांक कर पहुंची थीं, बिल्कुल वैसे ही जैसे नेहरू अपनी शेरवानी पर गुलाब टांकते थे। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते समय इंदिरा गांधी ने ‘मैं ईश्वर के नाम पर शपथ लेती हूं’ कहने के बजाय ‘मैं विधिपूर्वक प्रतिज्ञा करती हूं’ शब्दों का प्रयोग किया। वे सत्ता में इसलिए आ पाईं थीं क्योंकि वे जवाहर लाल नेहरू की बेटी थीं और वे उनके जैसे ही बने रहना चाहती थीं। लेकिन ऐसा होने वाला नहीं था क्योंकि कामराज ने तो उनको इसलिए चुना था कि वे बस नाम की प्रधानमंत्री रहें और फैसले हमारे हों।

शुरूआत में इंदिरा गांधी डरी रहतीं थीं। कोई उनका विरोध करता तो वे सहम जातीं और शांत हो जातीं। पत्रकार मार्क टली उस समय के बारे में बताते हैं-

‘साल 1966 में असम में हुुई प्रेस काॅन्फ्रेंस में जब पत्रकार सवालों की बौछार कर रहे थे तो इन्दिरा की घिग्घी बंध गई थी।’

लोग उनके बारे में कहते थे कि उनकी कोई अपनी शैली ही नहीं है। जो शैली है वो दिखावटी है या फिर अपने पिता के जैसा बनने की नकल करती हैं। जब वे प्रधानमंत्री बनीं उस समय देश कई समस्याओं से जूझ रहा था। खाद्यान्न की कमी देश के लिये बड़ी समस्या बनी हुई थी। नागालैंड में मिजो आदिवासी अलग राज्य की मांग कर रहे थे। ताशकंद समझौते के कारण भारत ने पाकिस्तान को हाजी पीर दर्रा पाकिस्तान को लौटा दिया। जिसका नतीजा लोगों के गुस्से में मिल रहा था।

Related image

ये तो देश के लोगों का विरोध था पर उससे कहीं ज्यादा विरोध तो संसद में हो रहा था। बड़े-बड़े नेता इंदिरा गांधी का मखौल उड़ा रहे थे। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने तब इंदिरा गांधी को ताना मारा था-

‘ये तो और कुछ नहीं, बस गूंगी गुड़िया है।’

तब के नेता मीनू मसानी, हीरेन मुखर्जी, लोहिया ने संसद में उनको परेशान कर दिया था। तब इंदिरा गांधी ने कहा था-

‘इस काम के बारे में मैं खुद को औरत समझ कर कभी नहीं सोचती। यदि कोई स्त्री किसी भी पेशे से योग्य है तो, उसे उस पेशे में काम करने का अवसर मिलना चाहिए। मैं भी अपना काम करते समय खुद को औरत के रूप में नहीं आंकती। मैं तो इस देश की प्रथम सेविका-देश सेविका हूं।’

इंदिरा गांधी ने इन आलोचनाओं को छोड़कर देश की समस्या पर ध्यान दिया। उनको किसी भी तरह से अनाज की समस्या को खत्म करना था। तभी अमेरिका के राष्टपति लिंडन जाॅनसन ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनने पर अमेरिका आने का न्यौता दिया। इंदिरा गांधी भी देश की समस्या से निपटने के लिए अमेरिका चलीं गईं। तब वहां के अखबार ने इंदिरा के बारे में लिखा था, भारत की नई नेता भीख मांगने चली आई। अमेरिका भारत की मदद करने के लिए तैयार हो गया। जाॅनसन ने 30 लाख टन खाद्यान्न और 90 लाख डाॅलर की सहायता देने का वायदा किया लेकिन अमेरिका ने इस सहायता के लिए कुछ शर्तें रखीं।

Image result for indira gandhi in america with lyndon johnsonअमेरिका की शर्त थी कि भारत को अपने रूपये का अवमूल्यन करना होगा। इंदिरा गांधी को एक बड़ा फैसला लेना था। इतिहास गवाह है उन्होंने 6 जून 1966 को वो फैसला लिया जिसने पूरे देश में खलबली मचा दी। आजाद भारत में पहली बार रूपये की वैल्यू को गिराया गया था। पहले 1 डाॅलर के लिये 4 रूपये देने पड़ते थे इस फैसले के बाद 1 डाॅलर के लिये 8 रूपये देने पड़ रहे थे। इस फैसले से देश भुखमरी और दिवालियेपन से तो बच गया लेकिन सियासी गलियारे में एक भूचाल आ गया।

इंदिरा गांधी के इस फैसले का विरोध सिर्फ विपक्ष ही नहीं कर रहा था। उनकी ही पार्टी इंदिरा गांधी पर हमला बोल रही थी। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में इंदिरा की आलोचना की गई। इंदिरा ये समझाने में नाकाम रही कि उन्होंने देश के भले के लिये ही ये फैसला लिया है। इंदिरा की तरफ से द्वारका प्रसाद मिश्र और इंदर कुमार गुजराल ही थे जो लोगों को समझा रहे थे कि उनका प्रधानमंत्री अमेरिका का पिट्ठू नहीं है। अपने ही दल के इस विरोध के कारण इंदिरा ने ऐलान किया- ‘यहां सवाल यह है कि पार्टी किसको चाहती है और जनता किसको चाहती है। जनता के बीच मेरी लोकप्रियता एकछत्र है।’

Image result for indira gandhi and kamarajइस फैसले से सबसे ज्यादा परेशान सिंडीकेट था। सिंडीकेट को लगता था कि ऐसे फैसलों को लेने का हक सिर्फ कांग्रेस वर्किंग कमेटी के पास है। कामराज को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इंदिरा ने उनसे बिना सलाह के इतना बड़ा फैसला ले लिया। इसी फैसले के बाद से इंदिरा और कामराज के रास्ते अलग होने लगे। तब कामराज ने गुस्से में कहा था- ‘बड़े आदमी की बेटी होकर छोटे लोगों जैसी गलती।’

इंदिरा गांधी ने तब लोगों को भरोसे में लेने के लिये 12 जून 1966 को आकाशवाणी पर लोगों को संबोधित किया। वे बोलीं- ‘मैं आपसे साफ-साफ कह रही हूं। रूपये के अवमूल्यन का फैसला कतई आसान नहीं था। हरेक देश की तारीख में ऐसे मौके आते हैं जब उसकी इच्छाशक्ति कसौटी पर कसी जाती है। इसका भविष्य संकल्पबद्ध कार्रवाई तथा साहसिक फैसले करने की क्षमता पर निर्भर करता है।’

कांग्रेस इंदिरा का विरोध कर रही थी। वो इंदिरा को प्रधानमंत्री पद से हटाना भी चाहती थी लेकिन अभी नहीं क्योंकि फरवरी 1967 में लोकसभा चुनाव थे। पहली बार कांग्रेस जवाहर लाल नेहरू के बिना चुनाव लड़ने जा रही थी। कांग्रेस को चुनाव जीतने के लिये जवाहर लाल नेहरू की बेटी की जरूरत थी। कांग्रेस वो चुनाव जीतती भी है लेकिन इस चुनाव के बाद सत्ता की चाबी और गाड़ी इंदिरा के हाथों में आ जाती है।