आज मैं एक ऐसे शख़्स की कहानी सुनाने जा रहा हूं जो इंदिरा गांधी के रसूख में बढ़ा और उनके गुण गाता रहा। वो शख़्स जिसकी दोस्ती तो नेहरू से थी लेकिन साथ नेहरू की बेटी इंदिरा का दिया। जब इंदिरा पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो इस शख़्स को दिल्ली बुला लिया गया। जब कांग्रेस टूटी तो इस शख़्स ने इंदिरा का साथ दिया। जिसका उसे फायदा मिला और इंदिरा गांधी ने उसे देश का महामहिम यानी राष्ट्रपति बना दिया।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी वो शख़्स इंदिरा का ही वफादार रहा और इंदिरा ने उस शख़्स से आधी रात को एक ऐसे कागज पर दस्तख़त ले लिये जिसने भारत के लोकतंत्र और सियासत की तस्वीर बदल दी। सफेद कागज़ पर वो काली स्याही आपातकाल के आदेश की थी। तब की बात में आज कहानी देश के पांचवें राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद की।

फख़रुद्दीन अली अहमद, फोटो सोर्स- गूगल

फख़रुद्दीन अली अहमद का जन्म 13 मई 1905 को दिल्ली में हुआ था। फख़रुद्दीन के पिता कर्नल अहमद मूलतः असम के रहने वाले थे। बाद में पूरा परिवार दिल्ली में आकर बस गया और यहीं फख़रुद्दीन का जन्म हुआ। फख़रुद्दीन के पिता असम के पहले व्यक्ति थे जो मेडिकल साइंस की पढ़ाई कर के एमडी बने थे। फख़रुद्दीन ने अपनी शुरूआती पढ़ाई उत्तर प्रदेश के गोंडा में की। बाद में दिल्ली स्टीफन काॅलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर 1923 में लाॅ की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गये। इंग्लैंड में उनकी मुलाकात जवाहर लाल नेहरू से हुई, मुलाकात दोस्ती में तब्दील हो गई। ये दोस्ती फख़रुद्दीन अली अहमद की जीवन की दिशा बदलने वाली थी।

इंग्लैंड से वकालत पूरी करने बाद वो भारत लौटे और अपने गृहराज्य असम में जाकर वकालत करने लगे। तभी असम में देश की आज़ादी का आंदोलन चल रहा था, फख़रुद्दीन अली अहमद भी उसी में कूद गये। उसी आंदोलन ने उनको राजनीति में ला खड़ा किया। 1937 में पूरे देश में प्रांतीय चुनाव हुए और कांग्रेस की जीत हुई, असम में भी कांग्रेस जीती। इस सरकार में फख़रुद्दीन अली अहमद को भी मंत्री बना दिया गया।

इंदिरा गांधी के साथ फख़रुद्दीन अली अहमद, फोटो सोर्स- गूगल

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। जिसका दमन करने के लिए गांधी, नेहरू समेत लाखों लोगों को जेल में ठूंस दिया गया। ये ऐसा आंदोलन था जो बिना किसी नेतृत्व के भी बढ़ा जा रहा था, फख़रुद्दीन अली अहमद भी जेल गये। अंग्रेजों को समझ में आ गया था कि अब उनके जाने का वक्त आ गया है। जब ढाई साल बाद सभी को जेल से रिहा किया गया तो फख़रुद्दीन को भी रिहा किया गया। इसके बाद वे असम में ही कांग्रेस की तरफ से नेतृत्व करते रहे। 1962 में फख़रुद्दीन दिल्ली की राजनीति में आना चाहते थे और नेहरू भी उन्हें अपनी कैबिनेट में शामिल करना चाहते थे लेकिन तब असम के मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद मुखर्जी ने इजाजत नहीं दी थी। अब सीधे इंदिरा काल में प्रवेश करते हैं।

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो वो के. कामराज की दयादृष्टि से बनी थीं। लाल बहादुर शास्त्री के बाद कामराज को मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी में से किसी एक को चुनना था। कामराज ने नेहरू की बेटी इंदिरा को चुना क्योंकि चुनाव आने वाले थे और इंदिरा उस परिवार से आती थीं जो अकेले दम पर चुनाव जीत सकता था। इंदिरा गांधी समझ गईं थी कि ओल्ड गाॅर्ड के चलते आगे उनकी बात मानी नहीं जाएगी, ऐसे में उन्होंने कांग्रेस में अपने विश्वासपात्रों को मंत्री बनाया। फख़रुद्दीन अली अहमद भी उन्हीं में से एक थे। फख़रुद्दीन को 1967 में इंदिरा ने अपनी कैबिनेट में जगह दी। उसके बाद राष्ट्रपति चुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के खिलाफ जाकर वी.वी.गिरी को समर्थन दिया।

इंदिरा गांधी, कामराज और अन्ना के साथ, फोटो सोर्स- गूगल

वीवी गिरी राष्ट्रपति बने और दूसरी तरफ कांग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई। इंदिरा गांधी ने कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से अपनी सरकार बचा ली। इंदिरा गांधी की पार्टी का नाम था कांग्रेस(I)। फख़रुद्दीन अहमद अभी भी नेहरू की बेटी के साथ खड़े थे। 1972 के चुनाव में इंदिरा भी जीतीं और फख़रुद्दीन भी। फख़रुद्दीन को इंदिरा ने मंत्री बनाया लेकिन जल्दी हटाया भी क्योंकि अब इंदिरा ने उनके लिए कोई और जगह सोच रखी थी। सियासत का वो पद जिसके लिए फख़रुद्दीन अली अहमद को हमेशा याद किया जाने वाला था। राष्ट्रपति का पद। 20 अगस्त 1974 को फख़रुद्दीन अली अहमद ने देश के पांचवें राष्ट्रपति के रूप में पद ग्रहण किया।

साल 1974 में वीवी गिरी का कार्यकाल पूरा हो रहा था। अब इंदिरा ऐसा राष्ट्रपति चाहती थीं जिनके साथ वो सहज रहें और जो पूरी तरह से उनका वफादार हो। तब उनकी नजर में फख़रुद्दीन अली अहमद से बेहतर और कोई आदमी नहीं था। नेहरू के जमाने से वो उनके पारिवारिक मित्र थे। इंदिरा अपने इस कदम से मुस्लिम मतदाताओं में पकड़ को और मजबूत बनाना चाहती थीं। 3 जुलाई 1974 को फख़रुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार घोषित हुए। उनके खिलाफ विपक्ष ने त्रिदिब चौधरी को मैदान में उतारा। त्रिदिब चौधरी लेफ्ट पार्टियों की तरफ से खड़े किए प्रत्याशी थे। चौधरी, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। वो 1952 से लगातार लोकसभा सदस्य रहे थे। कांग्रेस के लिए ये जीत आसान रही। फख़रुद्दीन अली अहमद 7,54,113 मत लेकर इस चुनाव में विजेता घोषित हुए। उनके निकटतम प्रतिद्वंदी त्रिदिब चौधरी 1,89,196 वोट ही हासिल कर सके।

राष्ट्रपति पद की शपथ लेते हुए फख़रुद्दीन अली अहमद, फोटो सोर्स- गूगल

 

 

साल 1975, पूरे देश में इंदिरा विरोधी लहर चल रही थी। जयप्रकाश नारायण इंदिरा के खिलाफ बढ़-चढ़ कर बोल रहे थे। ऐसे में इलाहाबाद हाइकोर्ट का वो फैसला आया। जिसे जस्टिस सिन्हा ने सुनाया था जिसमें इंदिरा गांधी को 1972 के लोकसभा चुनाव में मशीनी दुरूपयोग का दोषी पाया गया था। इस याचिका को डाला था समाजवादी नेता, राजनारायण ने। इंदिरा को सांसद पद से हटाया जा रहा था और 6 साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बताया गया। कोई और सरकार होती या फिर ये 67 वाली इंदिरा होती तो हट जातीं लेकिन ये इंदिरा का सबसे मजबूत दौर था।

तब इंदिरा को बचाने आये उनके छोटे बेटे संजय गांधी। जिन्होंने हाल ही में मारूति बनाने का सपना छोड़ दिया था। तब इंदिरा को बचाने के लिए फैसला लिया गया कि देश में 25 जून 1975 से इमरजेंसी लगा दी जाएगी और ये सब होना था एक हस्ताक्षर से। ये साइन थे देश के प्रेसीडेंट के, जो चाहते तो ये काला अध्याय कभी आता ही नहीं। पर, कागज पर हस्ताक्षर हुए और देश में आपातकाल भी लगा। आपातकाल लगाने की तारीख थी 25 जून, 1975 और ये साइन जिस कागज पर लिये गये थे, उसको इंदिरा गांधी खुद रायसीना हिल्स लेकर गईं। जिसमें 49 कानूनों को अर्टिकल 352 में डालने का प्रावधान था यानी इन कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती थी।

1975 में इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने फख़रुद्दीन अहमद पर ये कार्टून छापा था, फोटो सोर्स- गूगल

इस आपातकाल के बारे में सबसे अच्छी तस्वीर 10 दिसंबर 1975 को इंडियन एक्सप्रेस में कार्टून के रूप में छपी थी। जिसमें राष्ट्रपति फखरूद्दीन अहमद ने बाथटब में लेटे-लेटे ही साइन कर दिये थे। ये कार्टून जल्दबाजी बता रहा था और कमज़ोरी भी। जल्दबाजी इंदिरा गांधी की जिन्होंने अपनी कैबिनेट को भी बताना जरूरी नहीं समझा और कमजोरी फखरूद्दीन की, जिन्होंने उसको एक बार आंख से देख लेना भी सही नहीं समझा। देश में आपातकाल लागू हो गया, सेंसरशिप लागू हो गई और देश भर के नेता जेलों में भरे जाने लगे।

ये संजय गांधी का राज था जिनके सामने राष्ट्रपति भी कमजोर हो गये थे। पुरानी दिल्ली में एक जगह हुआ करती थी तुर्कमानगेट। यहीं एक मजार थी जिसे संजय के कहने पर 1976 में तोड़ दिया गया। कुछ लोग संजय के इस अत्याचार की शिकायत राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद के पास लेकर पहुंचे तो वे देश के सबसे मजबूत पद पर बैठने के बावजूद सबसे कमजोर इंसान नजर आ रहे थे। फख़रुद्दीन ने उन लोगों से कहा ‘ये लड़का कांग्रेस का बंटाधार करेगा।’ इस मामले में कार्यवाही करने पर उन्होंने सलाह देते हुए कहा,

“आप लोग बड़ी हवेली क्यों नहीं जाते? आपको पता है न कि मेरे हाथ बंधे हुए हैं।”

राष्ट्रपति भवन में बुल्गारिया की राष्ट्रपति की साथ तस्वीर खिंचाते हुए फख़रुद्दीन आली अहमद, फोटो सोर्स- गूगल

11 फरवरी 1977 के दिन राष्ट्रपति भवन के दफ्तर में फख़रुद्दीन अली अहमद सुबह के वक्त गिर गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जहां पता चला कि उन्हें दिल के दो दौरे पड़े, जिसके चलते उनका देहांत हो गया। फख़रुद्दीन अली अहमद को किसी और वज़ह से भी याद किया जा सकता था लेकिन उनको एक ही वज़ह से याद किया जाता है, आपातकाल।

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