तबादले पर सत्ताधारी नेता और पत्रकार का संवाद

पत्रकार-

कार्यपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ होता है। अक्सर कार्यपालिका के ईमानदार अफसरों को राजनैतिक स्वार्थों के चलते बार-बार तबादले करके प्रताड़ित एवं दंडित किए जाने की ख़बर आती रहती है। खबर है कि एक और अफसर का तबादला हो गया है। 

नेता –

इस तरह के बेतुका सवाल करने से पहले आपको चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए, माफ़ कीजिए आप पत्रकार की तरह नहीं विपक्ष के प्रवक्ता की तरह बात कर रहें हैं। महोदय,लोकतंत्र के मजबूत स्तंभ व जनता द्वारा चुने गए राजनेताओं पर बिना सबूत ऐसा इल्जाम लगाया जाना ठीक नहीं है। आप अपना ज्ञानवर्धन कर लीजिए, देश में ईमानदार अधिकारियों की बहुत कमी है और उनकी मांग भी बहुत ज्यादा है। एक जगह ईमानदार अफसर को पदस्थ किया जाता है, तो किसी दूसरी जगह से जनता आवाज़ लगाती है कि फलां-फलां अफसर का सेवा हमारे यहां भी उपलब्ध कराया जाये। 

अब ऐसे में सत्ताधारी को जनता जनार्दन की मांग का सम्मान करते हुए इमानदार अफसर का तबादला करना ही पड़ता है। तो समझे जनाब ! जो अधिकारी जितना ज्यादा ईमानदार होगा उसकी उतनी ही ज्यादा मांग होगी अर्थात उतना ही तबादला होगा। इसके लिए आप सरकार द्वारा जनता के सम्मान को ध्यान में रखते हुए किए गए तबादलों पर सवाल नहीं कर सकते !

इज्जत कमाई जाती है, ईमानदारी सराही जाती है, प्यार पाया जाता है और निष्ठा लौटाई जाती है। लोकतंत्र के चार स्तंभ होते हैं, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया। अफसरों के तबादले पर अक्सर कई तरह के सवाल उठते रहते हैं। ऐसे में यह समझना बेहद जरुरी है कि क्या वाकई सरकार द्वारा किया जाने वाला तबादला दलों के दलगत नीति के प्रति निष्ठावान और दायित्व के प्रति निष्ठा के आधार पर कार्यपालिका के ईमानदार अधिकारीयों की सरहाना के बीच भेदभाव करती है?

अक्सर, बहुत से अधिकारी ये भी कहते पाए जाते हैं कि खुद मत कमाओ मगर कमाने से किसी को रोको भी मत। सिस्टम को तो अकेला बदल नहीं सकते। दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि आज भी लोग भारतीय प्रशासनिक सेवा में हुए चयन को सेलिब्रेट करते हैं। क्या यह उत्साह सिर्फ दहेज़ लेने के लिए या टीवी पर आने के लिए होता है? यदि ,भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने की ताक़त नहीं तो इसके लिए चुने जाने वालों का स्वागत किसी क्रांतिकारी की तरह क्यों होता है? उसके चयन पर हम अफसोस क्यों नहीं करते हैं अगर यही सच होता कि एक और नौजवान सिस्टम के पिंजड़ें का तोता बनने जा रहा है।

बहुत से अफसर हुए हैं जिन्होंने लोगों के उम्मीद को पूरा कर उनके जीवन को बदल दिया है, ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सिस्टम मकड़जाल को सुलझा कर हाशिए पर खड़े आम जनता के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले सिस्टम को ही क्यों नहीं बदल पाता है।

तबादलों के विषय में आप खोज करें तो आपको पता चलेगा कि 1973 बैच के मंजोय नाथ का 39 साल की नौकरी में 40 बार तबादला हुआ था। तमिलनाडु में एक आईएस अफसर का तबादला 48 घंटे में दो बार कर दिया गया। यू साग्याम का 27 साल की नौकरी में 25 बार तबादला हुआ है। कर्नाटक काडर के एमएन विजयकुमार का 32 साल में 27 बार तबादला हुआ है। एम एन विजयकुमार ने ऊर्जा, गृह और उद्योग मंत्रालय में घोटालों को उजागर किया था। आंध्रप्रदेश में पूनम मलाकोंडिया का 24 साल की नौकरी में 26 बार तबादला हुआ है। पूनम में स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है। राजस्थान काडर की मुग्धा सिन्हा का 15 साल की नौकरी में 13 बार तबादला हुआ है। उत्तराखंड के कुमाऊ मंडल के कमिश्नर सैंथियल पांडियन, तबादले की वजह बना है 300 करोड़ का हाइवे घोटाला। 1991 बैच के अधिकारी खेमका के 27 साल के करियर में यह उनका 52वां तबादला है। इस बाबत खेमका कह भी चुके हैं कि सरकार किसी भी पार्टी की रही हो उन्हें हर बार अपनी ईमानदारी की सजा भुगतनी पड़ती है।

इन उदाहरणों पर गौर करें तो पता चलता है कि जब कोई अफसर अपना सब कुछ दांव पर लगाकर सिस्टम के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ लड़ता है तो वह कितना अकेला पड़ जाता है। छुटभैये नेता ही नहीं बल्कि परिपक्व नेता भी दलों के दलदली विचार से उपर उठकर निष्ठापूर्वक दायित्व निर्वाह को सम्मान लौटने में उदारता नहीं दिखा पाते हैं।

इमानदारी और निष्ठापूर्वक दायित्व के निर्वाह की बात करना तो बेहद आसान है लेकिन सिस्टम से लड़ाई में उनका साथ देना उतना ही मुश्किल है, ऐसे अधिकारी जब आपके क्षेत्र में रहते हैं और आपके लिए काम करते हैं तो आप का नजरिया कुछ और रहता है और जब उनके साथ खड़े होने की बात होती है तब कुछ और। यही दोहरा मापदंड भ्रष्टाचार की जंग में सबसे बड़ा रोड़ा है। यह भी अहम सवाल है के जो भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आगे बढ़कर अपनी आवाज बुलंद करेगा वह राजनीती के अभिशाप से बच पाएगा? हो सके तो इस सवाल का जवाब तलाशिए। देखिए इमानदार को ईमानदारी से काम करते और समझिए किस परिस्थितियों से वह गुजरता है। शायद कोई चमत्कार हो जाए।

यह आर्टिकल हमें अब्दुल रशीद ने भेजा है।

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