भारत में बैसाखी का त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है. लोग घरों में पकवान पकाते हैं. पूजा-पाठ की जाती है. किसान बैसाखी के दिन से ही नई फसल काटना शुरू करते हैं. देश के कई गाँवों में बैसाखी के दिन मेलों का आयोजन किया जाता है. कृषि प्रधान राज्य पंजाब और हरियाणा में बैसाखी बड़े पैमाने पर मनाई जाती है. मगर 13 अप्रैल 1919 की बैसाखी के दिन कुछ अलग हुआ और इतना अलग हुआ कि तारीख इतिहास में दर्ज़ हो गई.

फोटो सोर्स- गूगल

अमृतसर हिन्दुस्तान के सबसे खूबसूरत राज्यों में से एक है. अमृतसर को लोग गोल्डन टेंपल की वज़ह से भी पहचानते हैं. गोल्डन टेंपल से चंद मिनटों की दूरी पर है जलियांवाला बाग. वो बाग जहां लोग बैठा करते थे, घंटों बतियाते थे. जहां पूरे दिन हँसी-ठिठोली चलती रहती थी. आज़ादी के दौरान वहां कई मीटिंगें भी हुई.

13 अप्रैल 1919 के दिन भी जलियांवाला बाग में एक सभा बुलाई गई. विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों ने हिंदुस्तान पर बहुत सारे टैक्स लगा दिए थे. जिससे मंहगाई बहुत बढ़ गई थी. गांधी जी सत्याग्रह करने वाले थे.

रॉलट एक्ट के विरोध में बहुत लोग बैसाखी के दिन जमा हुए थे. रॉलट एक्ट को आम भाषा में न वकील, न दलील, न अपील’ के नाम से जाना जाता था. इस एक्ट के तहत पुलिस जिसकी चाहे तलाशी ले सकती थी. बिना किसी कारण के दो साल की जेल में डाल सकती थी.

अंग्रेज सरकार का कहना था कि देश में आतंक रोकने के लिए रॉलट एक्ट बनाया गया है. अंग्रेजों को डर था कि कहीं मार्क्सवादी और लेनिनवादी देश में क्रांति न कर दें, खासकर बंगाल और पंजाब में.

किसको पता था कि आज यहाँ नरसंहार होने वाला है, यहां से कोई भी वापस नहीं जा पाएगा. लोग हँसी ख़ुशी से एक-दूसरे से मिल रहे थे, बच्चे खिलौनों की जिद कर रहे थे- बापू, मेनू गड्डी लेके दयीं. इस तरह की कई आवाजें थी उस दिन बाग़ में.

सांझ ढलने में अब कुछ ही वक्त बचा था. बाग में अब भी लगभग 25 हजार लोग रहे होंगे. अचानक लोगों को ऊपर एक अजीब सी आवाज़ सुनाई दी. एक हवाई जहाज़ बाग़ की तरफ आ रहा था. लोगों ने इससे पहले कभी भी जहाज नहीं देखा था. उस जहाज के एक पंख पर एक झंडा टंगा हुआ था.

लोगों ने ये सब मंज़र देखते ही वहाँ से हटने में अपनी भलाई समझी मगर इससे पहले कोई हिल भी पता चारों तरफ से सेना के भारी बूटों की आवाज़ आने लगी और चंद पलों में जलियांवाला बाग को चारों तरफ से घेर लिया गया.

भीड़ में से लोग चिल्ला रहे थे- ‘आ गए, आ गए.’ लोग वहाँ से बाहर जाने के लिए उठे. तभी एक आवाज़ आई, ‘बैठ जाओ, बैठ जाओ. गोली नहीं चलेगी.’

फोटो सोर्स – ब्रिटिश लाइब्रेरी

फिर अचानक से एक तीखी आवाज़ लोगों के कानों में पड़ी वो आवाज़ ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर की थी. वो चिल्लाया- “गुरखाज़ राइट, 59 लेफ़्ट.”

जनरल डायर, फोटो सोर्स – गूगल

25 गोरखा और 25 बलूच सैनिकों में से आधों ने बैठ कर और आधों ने खड़े हो कर ‘पोज़ीशन’ ले ली. डायर ने बिना पलक झपकाए आदेश दिया – ‘फ़ायर’

सैनिकों ने बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं. चारों तरफ़ लोग मर रहे थे. घायल हो कर गिरने लगे. किसी की आँख में गोली लग रही थी तो किसी की अंतड़ियाँ बाहर आ गई थीं.

घुटने के बल बैठे हुए सैनिक चुन-चुन कर निशाना लगा रहे थे. उनकी कोई गोली बर्बाद नहीं जा रही थी. जनरल डायर की काली ज़ुबान फिर खुली उसने हुकुम दिया – ‘सैनिको अपनी बंदूकें ‘रि-लोड’ करो और उस तरफ़ फ़ायरिंग करो जिधर सबसे ज़्यादा भीड़ है.’

लोग डर कर चारों तरफ भागने लगे, लेकिन बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं मिला. दस मिनट तक लगातार गोलियाँ चलती रहीं. कुल 1650 राउंड गोलियाँ चलाईं गई.

फोटो सोर्स – गूगल

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ उस दिन 379 लोग मरे थे. और 1500 घायल हुए थे. मगर सरकारी आंकड़े कभी सही होते हैं भला? असल में उस दिन मरने वालों की तादाद 1000 के आस-पास रही होगी. इसके बाद सरकार ने हंटर आयोग नाम की कमेटी बनाई. इस कमेटी ने पूरे मामले की जांच की और ब्रिगेडियर जनरल डायर को दोषी पाया. हंटर आयोग ने डायर को बर्ख़ास्त करने की सिफ़ारिश की. उसके बाद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इस नरसंहार के विरोध में अपना नोबेल पुरस्कार वापस कर दिया और सरदार उधम सिंह ने पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ ड्वायर की लंदन में गोली मारकर हत्या कर दी. ड्वॉयर ने बाग में जनरल डायर की कार्रवाई का समर्थन किया था. गांधी जी ने भी अपना असहयोग आंदोलन तेज़ कर दिया था.

100 साल पहले हुए इस नरसंहार को कोई भी हिंदुस्तानी नहीं भुला सकता. जलियांवाला बाग में शहीद हुए सभी शहीदों को ये देश हमेशा याद करता रहेगा.

भारत में ब्रिटिश राजदूत सर डोमिनिक एसक्विथ ने शनिवार को जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी और इसे ब्रिटिश-भारतीय इतिहास की बेहद शर्मनाक घटना बताया.

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा में दो दिन पहले जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए ख़ेद जताया था और इसे ब्रिटिश भारतीय इतिहास का ‘शर्मनाक दाग’ बताया था.

राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भी ट्वीट कर कहा-

जलियाँवाला बाग का भीषण नरसंहार सभ्यता पर कलंक है. बलिदान का वह दिन भारत कभी नहीं भूल सकता. जलियाँवाला बाग के अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी, उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत तमाम राजनेताओं ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी है.

अंग्रेजी में पढ़ें- 

100 Years of Jallianwala Bagh Massacre: Facts You Must Know

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