पिछले कुछ दिनों से भारत और नेपाल के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अभी हाल ही में नेपाल ने अपना नया नक्शा जारी किया था जिसमें भारत के कुछ हिस्सें को भी अपना नाम दे दिया। इसी को लेकर बवाल जारी है। वैसे देखा जाए तो भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस विवाद का इतनी जल्दी-जल्दी उभरना, ये बिल्कुल नई बात है। पिछले साल नवंबर में भारत ने जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए तो अपना नया नक्शा जारी किया। इस नक्शे में कालापानी भी शामिल था। नेपाल को यह बात पसंद नहीं आई और उसने भारत को कहा कि वह अपना नक्शा बदल ले। क्योंकि नेपाल का ऐसा मानना था कि कालापानी उसका अपना एरिया है। लेकिन, बात बनी नहीं।

फिर उसके बाद जब नेपाल ने अपना नक्शा जारी किया तो उसमें लिपुलेख इलाके को लेकर बवाल शुरु हो गया। लिपुलेख नेपाल के उत्तर-पश्चिम में है। यह भारत, नेपाल और चीन की सीमा से लगता है। भारत इस इलाक़े को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है और नेपाल अपना हिस्सा। नेपाल ने काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास से राजदूत को समन किया और आपत्ति दर्ज कराई। लेकिन, बवाल बढ़ा है भारत के सेना प्रमुख  एम.एम नरवणे के एक बयान से।

नरवणे ने 15 मई को एक बयान जारी कर कहा था कि कालापानी को लेकर नेपाल किसी और के इशारे पर विरोध कर रहा है। सेना प्रमुख का इशारा चीन की तरफ था। इस बयान को लेकर अब नेपाल के उप प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने प्रतिक्रिया दी है। नेपाली रक्षा मंत्री ने कहा है कि भारतीय सेना प्रमुख के बयान से नेपाली गोरखाओं की भावनाएं आहत हुई हैं जो लंबे समय से भारत के लिए बलिदान करते आए हैं। एक इंटरव्यू में रक्षा मंत्री ने कहा कि जनरल मनोज नरवणे का कूटनीतिक विवाद में चीन की तरफ इशारा करना निंदनीय है। उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ती है तो नेपाली सेना लड़ाई भी करेगी।

पोखरेल का मानना है कि, सेना प्रमुख के इस बयान से नेपाली गोरखाओं की भावनाएं भी आहत हुई हैं जो भारत की सुरक्षा के लिए अपनी जान देते आए हैं। उनके लिए (भारतीय सेना प्रमुख) गोरखा बल के सामने सिर ऊंचा कर खड़ा करना भी अब मुश्किल होगा। उन्होंने भारतीय सेना प्रमुख के बयान को राजनीतिक स्टंट करार दिया और कहा कि सेना प्रमुख से इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं की जाती है।

आजादी से पहले भारतीय सेना में गोरखा बटालियन भी थे और भारतीय सेना में गोरखा की करीब 40 बटालियन हैं जिसमें नेपाल के सैनिक बड़ी संख्या में हैं। हालांकि, यह पहली बार है जब नेपाल के रक्षा मंत्री ने भारत-नेपाल के विवाद में गोरखा समुदाय को भी घसीट लिया है। अब ऐसे में चीन के इशारे पर नेपाल को साधने का काम कितना असरदायक साबित होगा यह आने वाला समय बताएगा।