“हमेशा देर कर देता हूं मैं…”

मुनीर नियाज़ी की ये नज़्म हमारे देश की सरकारों के लिए एक दम सटीक है. क्योंकि क्या है न, सरकार भी ज़रूरी कामों में देर कर देती है. वो काम तो कर देती है, लेकिन ज़रा देरी से.

पुलवामा में हुए आत्मघाती से हमले से पूरा देश आहत है. लेकिन इसके जवाब में हमारी सरकारे एक्शन में आ गई हैं. जहां एक तरफ सरकार ने सैन्यबलों को कार्रवाई के लिए खुली छूट दे दी है, वहीं दूसरी तरफ कश्मीर की सरकार ने भी एक बेहतर काम किया है.

वो बेहतर काम है कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा और गाड़ी की सुविधा वापस लेने का. जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कल ये कड़ा निर्णय लिया है.

अलगाववादी नेता

वो लोग जो एक समाज, धर्म और संस्कृति को तोड़ने का समर्थन करते हैं और समर्थन करने वाली गतिविधियों को जन्म देते हैं. ऐसे ही कुछ अलगाववादी नेता कश्मीर में हैं. जो अलग कश्मीर यानि आज़ाद कश्मीर की मांग करते हैं और भारत की नीतियों का विरोध करते हैं.

आपको ये जानकर थोड़ी हैरानी हो सकती है कि इन अलगाववादी नेताओं को भारत के खर्च पर सुरक्षा दी जाती थी, गाड़ी मिलती थी. ये सारी मौज ये अलगाववादी नेता भारत के पैसे पर करते थे. लेकिन ताजुब्ब की बात ये है कि पुलवामा हमले के पहले कश्मीर के प्रशासन को इनकी सुरक्षा हटाने का ये उच्च विचार नहीं आया.

ये सुविधाएं छीन ली गई हैं

अलगाववादियों की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा बल और दी गई गाड़ियां उनसे वापस ले ली गई हैं. इन अलगाववादियों को सरकार की तरफ से दी जाने वाली बाकी सभी सुविधाओं को भी तत्काल रूप से हटाने के आदेश दिए जा चुके हैं. जम्मू-कश्मीर पुलिस अपने सूत्रों द्वारा ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन अलगाववादी नेताओं के अलावा किन्हीं और अलगाववादियों को तो कोई सुविधा नहीं दी जा रही है. अगर दी जा रही हैं तो उन्हें भी वापस छीन लिया जाएगा.

क्या कह रहे हैं अलगाववादी नेता ?

जम्मू-कश्मीर के एक अधिकारी ने बताया, ‘ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC)’ के चेयरमैन मीरवाइज उमर फारूक, शब्बीर शाह, हाशिम कुरैशी, बिलाल लोन, फजल हक कुरैशी और अब्दुल गनी बट को दी गई सारी सरकारी सुविधाएं उनसे वापस ले ली गई हैं.

इस पर अलगाववादी नेता मीरवाइज़ ने कहा कि –

“सरकार ने खुद ही हमें ये सुविधाएं देने का फैसला लिया था, हमने कभी इसकी मांग नहीं की थी, अब इन सुविधाओं के वापस लिए जाने के बाद भी हमारे रूख में कोई बदलाव नहीं आएगा.”

प्रशासन ने एक ऑर्डर जारी किया है जिसमें इनको दी जाने वाली सुविधों को ग़ैर-ज़रूरी बताया गया है.

इतनी देर क्यों ?

यहां सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि ये फैसला लेने के लिए हमारे जवानों के शहीद होने का इंतज़ार क्यों किया जा रहा था? ये लोग जो भारत का बुरा चाहते हैं. हमें तोड़ने के लिए तमाम कोशिशे करते हैं, इन्हे सुरक्षा दी ही क्यों जा रही थी?
सुरक्षा वापस लेने का फैसला बिल्कुल काबिल-ए-तारीफ है लेकिन इस फैसले को लेने में देरी कर दी गई. घाटी के नेताओं की सुरक्षा में सालाना 112 करोड़ रूपए खर्च हुए जिसमें ज़्यादातर अलगाववादी नेता शामिल थे.

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