कश्मीरी मूल की लेखिका सुनंदा वशिष्ठ ने अमेरिका में 1990 के दौर में कश्मीरी हिंदुओं पर हुई बर्बरता को दुनिया के सामने उजागर करते हुए पाकिस्तान के मुंह पर तमाचा मारा है. उनके द्वारा दिये गए इस शानदार भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी उनके इस भाषण का वायरल वीडियो ट्वीट किया है.

भारतीय कश्मीर में मानवाधिकार की स्थिति की पड़ताल के लिए US कांग्रेस की ओर से एक मानवाधिकार सम्मेलन आयोजित किया गया था. जिसमें भारतीय-अमेरिकी स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ ने भारत प्रशासित कश्मीर की वर्तमान स्थिति को लेकर मानवाधिकार की वकालत करने वालों पर सवाल उठाते हुए सभा में मौजूद सांसदों से कहा कि,

जिस समय दुनिया ने इस्लामिक आतंकवाद का नाम भी नहीं सुना था, उस समय कश्मीरी पंडितों ने उस स्तर की इस्लामिक बर्बरता और हिंसा का सामना किया था.

अमेरिका में रहने वाली सुनंदा वशिष्ठ एक नियमित स्तंभकार हैं. उनके द्वारा लिखे गए लेख कई प्रसिद्ध पत्रिकाओं और अखबारों में नियमित तौर पर छपते रहते हैं.

 लेखिका, राजनीतिक टिप्पणीकार सुनंदा वशिष्ठ, फोटो सोर्स - गूगल
लेखिका, राजनीतिक टिप्पणीकार सुनंदा वशिष्ठ, फोटो सोर्स – गूगल

जम्मू कश्मीर से आर्टिकल-370 को खत्म करने के फैसले का समर्थन करते हुए सुनंदा ने कहा,  

मेरे माता-पिता कश्मीरी पंडित हैं, मैं हिंदू कश्मीरी पंडित हूँ. हम कश्मीर के उस पीड़ित समुदाय से आते हैं जिन्हें इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण अपना घर, जमीन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. हिंदू महिलाओं का गैंगरेप किया गया और उनके शवों के टुकड़े करके फेंके गए. खून से लथपथ, हिंसा और आतंक से डरे और मजबूर लोग थे जिनको खुद का घर छोड़ना पड़ा था.

सुनंदा ने कहा कि मुझे खुशी है कि, अब कश्मीर में बिना धार्मिक भेदभाव के सभी लोग अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकेंगे. इसके साथ ही सुनंदा ने घाटी में जारी पाबंदियों को भी जल्द से जल्द खत्म होने की उम्मीद जताई है.

 यूएस कांग्रेस की ओर से एक आयोजित कार्यक्रम मानवाधिकार सम्मेलन में बोलती  सुनंदा वशिष्ठ, फोटो सोर्स - गूगल
यूएस कांग्रेस की ओर से एक आयोजित कार्यक्रम मानवाधिकार सम्मेलन में बोलती सुनंदा वशिष्ठ, फोटो सोर्स – गूगल

अनुच्छेद-370 पर आंसू बहाने वालों से सुनंदा वशिष्ठ ने पूछा कि,

मानवाधिकार के ठेकेदार उस वक्त कहां थे? जब 30 साल पहले आतंकितों ने कश्मीरी पंडितों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा था. आप लोग उस वक्त कहां थे जब कश्मीर में खुलेआम हिंदुओं का कत्लेआम किया जा रहा था, उनके घर जलाए जा रहे थे, हिन्दू बहू-बेटियों की इज्जत लूटी जा रही थी.

सुनंदा ने आगे बताया,

कश्मीर में हिंदुओ के खिलाफ चल रही बर्बरता के बीच, वो किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब हुई थी. हर हिन्दू कश्मीरी को चेतावनी दी गयी थी ‘या तो कश्मीर छोड़ के चले जाएं या धर्मांतरण कर लें’ इसके बावजूद भी अगर कोई हिन्दू कश्मीर में रहेगा तो वो हमारी मजहबी हिंसा का शिकार बनेगा.

प्रदर्शन करते कश्मीरी पंडित, फोटो सोर्स - गूगल
प्रदर्शन करते कश्मीरी पंडित, फोटो सोर्स – गूगल

जिसके बाद डरे सहमे लाखों कश्मीरी पंडितों ने रातों-रात अपने पुरखों की जमीनों और घरों को अलविदा कह दिया था. जिनसे अपने घर नहीं छोड़े गए, वहीं रहे, उनके साथ जो हुआ उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है.

लेखिका, राजनीतिक टिप्पणीकार और नस्लीय नरसंहार की पीड़ित कश्मीरी हिंदू के तौर पर अपना पक्ष रखने वाली सुनंदा ने कहा कि,

भारत को राजनयिक मामलों में किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं. लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार ही भारत ने पंजाब और उत्तर पूर्व में अराजकता को पराजित किया है. कश्मीर में फैली अराजकता के ख़िलाफ़ लड़ने में भारत की सहायता करने के लिए यह उपयुक्त समय है ताकि मानवाधिकार से जुड़ी समस्याओं को हमेशा के लिए ख़त्म किया जा सके.

 सुनंदा वशिष्ठ , फोटो सोर्स - गूगल
सुनंदा वशिष्ठ , फोटो सोर्स – गूगल

सुनंदा वशिष्ठ की दिल दहला देने वाली आपबीती सुनकर वहां मौजूद हर शख्स के रोंगटे खड़े हो गए. जिसके बाद उनके इस भाषण को लोग सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए खूब तारीफ़ें कर रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी सुनंदा के भाषण के एक भाग को ट्वीट किया गया है.

बता दें कि इसी कार्यक्रम के पैनल में शामिल कुछ लोगों ने भारत सरकार द्वारा 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहाँ पैदा हुए हालातों पर चिंता जताई थी.

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