छत्तीसगढ़ पूरे देश में एक ऐसा राज्य बनने जा रहा है जहां खेलों के नाम संस्कृत में बुलाये जाएंगे। हाल ही में छत्तीसगढ़ राज्य ने सभी ऑफिशियल खेलों  के नाम संस्कृत में चेंज करने का डिसीजन लिया है। खेलों के नाम चेंज करना किसी भी राष्ट्र की ‘संस्कृति को बचाने’ से जोड़ना अपने आप में एक बेवकूफी वाली बात है। अगर इस तरह से खेलों के नाम बदल दिये जाएंगे तो इस फैसले का भविष्य में कितना योगदान रहेगा ये कह पाना मुश्किल होगा।

उन ऑफिशियल खेलों के नाम कुछ इस तरह रखें गए है-

“क्रिकेट को कंदुकक्रीडा, जोरदार चौके को सिद्ध चतुष्कम् और फुटबॉल को पाद कंदुकम् कहा जाएगा।”

इसके पीछे की वजह?

इस साल बनारस की ‘संपूर्णानंद यूनिवर्सिटी’ में संस्कृत क्रिकेट कम्पटीशन का आयोजन किया गया था, जिसमें खिलाड़ियों ने धोती कुर्ता पहनकर क्रिकेट खेला। इस पूरे प्रोग्राम में कॉमेंट्री और रूल्स भी संस्कृत में ही थे। इसी बात को ध्यान में रखकर अब छत्तीसगढ़ में खेलों के नाम संस्कृत में करने की पहल की जा रही है। राज्य सरकार को ये लगता है कि इससे हमारी संस्कृति को बचाने में कोशिश होगी साथ ही स्टूडेंट्स अपनी भाषा को भी सीखेंगे।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

‘छत्तीसगढ़’ पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जहां क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल जैसे सभी फेमस खेलों के नाम और नियम संस्कृत के टेक्निकल डिक्शनरी में होंगे। छत्तीसगढ़ राज्य “संस्कृत विद्या मंडलम् व्यापक” रिसर्च को एकरूप तरीके से तैयार भी करेंगे।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

जब बात आती है देश की संस्कृति को बचाने की तब हम नए आइडियाज़ की बात करने की जगह पुराने रिवाज़ो को लेकर उसे रिपीट करने लग जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि आज हम जिस समाज में रह रहें हैं वो उस समय के समाज से बहुत अलग है। हर नया दौर नए बदलावों को अपने साथ लाता है। जब हम बात करते हैं अपने देश की संस्कृति की तब हम ये भूल जाते हैं कि भले ही संस्कृति देश की धरोहर होती है लेकिन उससे किसी चीज़ की पहचान नहीं बदली जा सकती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

एक शब्द चला ‘इंडो-वेस्टर्न’ यानि इंडियन फ्लेवर के साथ वेस्टर्न का तड़का लगाना। अब आप देखें तो न ही यहाँ हमने अपनी संस्कृति के साथ कोई छेड़-खानी की है और खुशी-खुशी बाहर की संस्कृति को भी जगह दे दी। इससे हमारी संस्कृति की शान ही बढ़ी। इससे दो काम हुये, एक तो लोग अपनी चीज़ों की तरफ आकर्षित हुये और दूसरा संस्कृति को भी बनाए रखा।

ऊपर दिये एग्ज़ाम्पल से अब आप बहुत आसानी से समझेंगे कि, ‘क्यों खेलों के नाम नहीं बदलने चाहिए?’ इस बात से कोई गुरेज नहीं है कि संस्कृति के बारे में सोचा जा रहा है, ये कोई गलत कदम है। ‘संस्कृत’ की धरोहर को बचाने के लिए और भी तरीके हैं और दिक्कत इस बात से भी नहीं की खेलों के नाम संस्कृत में बुलाएंगे लेकिन ऑफिशियल उसको बदल देना ये कह कर कि हम तो भाई संस्कृति की रक्षा करने के लिए कर रहे हैं तो ये थोड़ा अजीब हो जाएगा या ये कहें कि ऐसी बातें अपील करके ये हँसी का पात्र बन रहें हैं।Related image

इस फैसले की साइड लेकर छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री “डॉक्टर प्रेमसाय सिंह टेकाम” बोलते हैं कि- ” स्टेट के सभी स्कूलों में छात्रों के लिए “ऑल राउंड डेवलपमेंट” पर फोकस करना चाहती है। इसमें खेल कूद और व्यायाम भी शामिल है। संस्कृत स्कूलों में अभी योगा प्रैक्टिस के टाइम पर छात्रों को सूचना भी संस्कृत में ही दी जाती है। खेलों में संस्कृत के यूज़ से भाषा का प्रसार बढ़ेगा।” Image result for डॉक्टर प्रेमसाय सिंह टेकाम

संस्कृत में खेलों के नाम कुछ इस तरह रखे गए हैं

क्रिकेट कंदुक क्रीड़ा
फुटबॉल पादकंदुकम्
बॉस्केटबॉल  हस्तपाद कंदुकम्
वॉलीवाल अपाद कंदुकम्
टेबल टेनिस उत्पीठिका कंदुकम्
बैंडमिंटन खगक्षेपण क्रीड़ा
दौड़ धावनम्
कबड्‌डी कबड्‌डी ध्वनि क्रीड़ा
खोखो खो ध्वनि क्रीड़ा
कुश्ती मल्लयुद्धम्
लइका मड़ई बाल मेलापक

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