अगर कोई आपसे पूछे कि इस वक्त देश में क्या चल रहा है, तो शायद लगभग लोगो का जवाब कोरोना होगा और उसके बाद भारत-चीन सीमा विवाद। लेकिन, इसके अलावा सरकार ने एक और नया टॉपिक छेड़ दिया है- प्रियंका गांधी को घर खाली करने का आदेश देकर। 1 जुलाई को हाउसिंग और शहरी मामलों के मंत्रालय ने इस बाबत प्रियंका गांधी को नोटिस भेजा है जिसमें आवास को खाली करने की बात कही गई है। इसका मतलब ये है कि प्रियंका गांधी को हर हाल में 1 अगस्त 2020 तक अपने 35 लोधी एस्टेट स्थित सरकारी बंगला खाली कर देना होगा। अब इसी बात को लेकर कांग्रेस पूरी तरह से केंद्र सरकार पर नाराज है। कांग्रेस ने सीधा आरोप लगाया है कि महज साजिश और घटिया राजनीति का एक नमूना है। जबकि बीजेपी का इस पूरे मसले पर कहना है कि प्रियंका गांधी के साथ जो भी हुआ है वो सारी बातें नियम और कानून के अनुसार हुआ है। आइए अब इसी बात को समझते हैं कि क्या सही है और क्या गलत?

इस सवाल का जवाब जाने उससे पहले ये जान लेते हैं कि आखिर दिल्ली के जिस इलाके में प्रियंका गांधी का आवास है जिसे लुटियंस दिल्ली के नाम से जाना जाता है, उसकी खासियत क्या है जो कि कोई भी नेता अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी नहीं छोड़ना चाहता? किंग जॉर्ज V और ब्रिटेन की महारानी मेरी अपने उपनिवेश यानी उस वक़्त के भारत के दौरे पर थे। वर्ष 1911 की 15 दिसंबर को किंग्सवे कैम्प के पास शाही दंपत्ति ने ‘दिल्ली दरबार’ की नीव रखी। इसका निर्माण कार्य वर्ष 1912 में शुरू हुआ और ये 10 फ़रवरी वर्ष 1931 में पूरा हो गया। उसके बाद इसका औपचारिक उद्घाटन किया गया।

आज़ादी के बाद अंग्रेज़ शासक तो चले गए, मगर लुटियंस की दिल्ली में भारत के उस समय के बड़े लोग – चाहे नेता हों, नौकरशाह या फिर उद्योगपति – यानी प्रभावशाली लोग इन बंगलों में रहने लगे। 2015 में भारत की संसद ने एक अध्यादेश के ज़रिये ‘दिल्ली शहरी कला आयोग’ का गठन किया जिसका अध्यक्ष प्रोफ़ेसर पीएसएन राव को बनाया गया। इस गठन ने लुटियंस दिल्ली में कई नए इलाके को शामिल करने और इसमें से पुराने कुछ इलाके को दूर करने का प्रस्ताव मोदी सरकार के सामने रखा। साथ ही इसमें कई पुराने बिल्डिंग का विस्तार और कई मकाने को दो मंजिला करने का प्रस्ताव भी शामिल था।

सांसदों, मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं या अधिकारियों और जजों के लिए अलग-अलग श्रेणी के बंगले या आवास चिन्हित हैं। इन आवासों को टाइप IV से लेकर टाइप VIII तक की श्रेणियों में बांटा गया है। मौजूदा व्यवस्था की अगर बात की जाए तो पहली बार चुने गए संसद के सदस्यों को टाइप – IV का घर मिलता है। जिसमें चार बेडरूम और एक पढ़ने का कमरा और ड्राइंग रूम होता है। एक से ज़्यादा बार चुने गए सांसद या मंत्रियों को टाइप-VIII के बंगले आवंटित होते हैं जिसमें बगीचे भी होते हैं और काम करने वाले और सुरक्षाकर्मियों के लिए रहने का इंतज़ाम भी रहता है। मौजूदा वक़्त में ऐसे कुल 1000 बंगले हैं जिनमें से 65 निजी हैं जबकि बाक़ियों में बड़े नेता, अफ़सरशाह, जज और सेना के अधिकारी रहते हैं। दिल्ली का सबसे महंगा एरिया में से एक है और साथ ही यहां सभी तरह की सुविधाएं और आराम है। पूरी लुटियंस की दिल्ली की संपत्ति का भाव मौजूदा वक़्त में पाँच लाख करोड़ रूपए आंका गया है।

साल 2000 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो, उन्होने इस सरकारी आवास आवंटन नियम में कुछ बदलाव किए और उन्होंने तय किया कि जिसके पास SPG सुरक्षा है, उसी के लिए आवास आवंटित किया जाएगा। साथ ही नियम ये भी है कि जिन सांसदो या मंत्रियों का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और वो दोबारा किसी मंत्री पद या सांसद पद पर नहीं रहते हैं, उन्हें आवास खाली करना होगा। हालांकि नियम में संसोधन कर एक बात ऐड कर दिया गया कि आवास के लिए बनी केंद्रीय कैबिनेट की समिति कुछ अपवाद भी कर सकती है और कुछ गणमान्य लोगों को आवास आवंटित करने का प्रस्ताव भी दे सकती है।

आज कांग्रेस के नेता और महासचिव प्रियंका गांधी को आवास खाली करने का नोटिस दिया गया है, उसके पीछे सरकार का तर्क है कि वर्तमान में प्रियंका गांधी वाड्रा के पास न तो कोई मंत्री पद है और न ही कही से वो सांसद हैं। इसके अलावा नवंबर 2019 में ही उनका SPG सुरक्षा हटा लिया गया था। फिलहाल उनके पास Z+ सुरक्षा है। इसलिए अगर प्रियंका गांधी आवास आवंटन के लिए जो शर्तें हैं उनमें से किसी को पूरा नहीं करती है तो उन्हें मकान खाली करना ही पड़ेगा। क्योंकि यही नियम है।

अब यहां सवाल ये भी उठता है कि अगर प्रियंका गांधी को नियम के तहत आवास खाली करवाए जाने को कहा गया है तो लालकृष्ण अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के बारे में जवाब देने की जरुरत है सरकार को कि आखिर उन्हें किस नियम के तहत आवास आवंटित किया गया है। क्योंकि फिलहाल की स्थिति ये है कि न ही अडवाणी को और न ही मुरली मनोहर जोशी को SPG सुरक्षा है और इस वक्त दोनों किसी मंत्री पद पर भी नहीं है। लेकिन, जैसा कि नियम कहता है कि केंद्रीय कैबिनेट की समिति कुछ अपवाद भी कर सकती है और कुछ गणमान्य लोगों को आवास आवंटित करने का प्रस्ताव भी दे सकती है। ऐसे में अगर मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण अडवाणी को जान का खतरा है और उन्हें आवास दिया गया है तो ऐसे में प्रियंका गांधी को जान का खतरा नहीं है, इस बात को सरकार इतनी दृढ़ता के साथ कैसे कह सकती है?

हालांकि प्रियंका गांधी के बारे में टीवी डिबेट पर बैठे बीजेपी के प्रवक्ता और नेता तो यहां तक कहते हुए नज़र आए कि,

‘अब घर को और कितने सम्मान करें, तुम्हें करे और तुम्हारें बच्चों को भी सलाम करें।’

साल 1991 में कुछ इसी तरह के फैसले के बाद भारत के सबसे युवा पीएम को हमने खो दिया था। वीपी सिंह सरकार ने पहले राजीव गांधी की SPG सुरक्षा हटाया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि 1985 में बने इस सुरक्षा को 1988 में इससे संबंधित कानून तो संसद में पास तो कर दिया गया लेकिन, इसमें यह तर्क दिया गया कि यह सुरक्षा पूर्व पीएम पर लागू नहीं होता है।

यही तर्क देते हुए वीपी सिंह ने पीएम बनने के बाद तीन महीने तक राजीव गांधी की SPG सुरक्षा  बनाए रखा लेकिन फिर हटा दिया और जब चन्द्रशेखर की सरकार आई और 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या की खबर पूरे देश में फैली तो पूरा देश SPG सुरक्षा  को लेकर सवाल उठाने लगा था। उसके बाद ही 1992 में इसमें संशोधन हुआ और नियम बनाया गया कि कोई भी पीएम, पद से हटने के 10 साल बाद तक SPG सुरक्षा के अंतर्गत रहेगा। लेकिन, फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इसमें संशोधन कर इसे भी हटा दिया।

खैर, फिलहाल खबर ये है कि आवास में रहते हुए प्रियंका गांधी के ऊपर 3,46,677 रुपये का बकाया राशि था जिसे उन्होंने नोटिस मिलने के साथ ही पे कर दिया है। अब वो दिल्ली में ना रहकर लखनऊ के हजरतगंज स्थित ‘कौल निवास’ में रहेंगी। ऐसी खबर भी आ रही है। कौल निवास के बारे में महज इतना जान लीजिए कि वह मकान पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की मामी का मकान है, जहां अक्सर सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी लखनऊ आते वक्त रुकते हैं। वैेसे भी अगर प्रियंका गांधी की पॉलटिक्ल करियर को देखा जाए तो उन्हें दिल्ली से ज्यादा लखनऊ की जरुरत है। क्योकि अभी तक का उनका करियर उत्तर प्रदेश के ईर्द-गिर्द घूमता रहा है।

फिलहाल इस खबर में इतना ही लेकिन, अंत में अभी भी बहुत कुछ संदेह है, सवाल है जिसका जवाब मिलना बाकी है और इसके लिए आने वाले समय का इंतजार करना होगा। सवाल ये है कि अगर प्रियंका गांधी के पास कोई पद नहीं है, इसलिए उन्हें आवास खाली करने का ऑर्डर दिया जा रहा है तो फिर साल 2014 में जब अमित शाह बीजेपी के नए-नए अध्यक्ष बने थे तो, उस वक्त वे कोई नेता नहीं थे और न ही कोई मंत्री या सांसद, फिर उन्हें लगभग 3875 रुपये प्रतिमाह का सरकारी आवास आवंटित कराने के पीछे किसी नियम और कानून का प्रयोग किया गया था? इस सवाल का जवाब ढूंढिएगा आप भी क्योकि हमें भी आपके जवाब का इंतजार रहेगा।