सुबह अखबार पढ़ने के क्रम में टाइम्स ऑफ इंडिया के पन्ने पलटे तो एक विज्ञापन देखकर रुक गया। ऑल इंडिया पोल्ट्री और नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी साझी तौर पर अखबार में विज्ञापन देकर कह रहा है कि चिकन का सेवन करने से सिर्फ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, अंग्रेजी में लिखा है,

“the only thing that develops after having us is immunity”

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा एड, फोटो सोर्स: टाइम्स ऑफ इंडिया

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा एड, फोटो सोर्स: टाइम्स ऑफ इंडिया

ये मामूली बात नहीं है, आपने आखिरी बार चिकन और अंडा का विज्ञापन अखबार में कब देख लिया? खबरों को खंगालिये वायरस फैलने की अफवाहों की वजह से पोल्ट्री उद्योग इस वक़्त भयंकर संकट के दौर से गुजर रहा है, मगर इसकी बात कहीं नहीं हो रही है। याद कीजिये इससे पहले अगस्त के महीने में टेक्सटाइल एसोसिएशन ने बाकायदा अखबार में विज्ञापन देकर कहा था कि मंदी है, हमें बचा लीजिये। इसलिए कहता हूँ अखबार पढ़ते वक़्त अंधाधुन्ध पन्ने मत पलटिये विज्ञापनों को भी चुपके से देख लिया कीजिये। विज्ञापनों से बाजार की नब्ज टटोल सकते हैं।

मंदी की वजह से पहले पोल्ट्री उद्योग रसातल पर पहुँच गया अब अफवाहों की वजह से ये गर्त में चला गया है। खाली हेडलाइन पढ़ कर तड़क-भड़क करने से कुछ नहीं होगा आपको इस उद्योग की बारीकियों को समझना पड़ेगा। पोल्ट्री किसानों के लिए तीन सीजन सबसे अहम होते हैं। पहला सीजन क्रिसमस, नया साल का होता है, दूसरा सीजन दशहरे के समय त्यौहारी मांग और तीसरा सीजन होली का होता है जब लोग भोरे-भोरे उठ कर मीट की दुकानों पर खड़े हो जाते हैं। लेकिन होली के पहले ही भारत में कोरोना के इक्का-दुक्का मामले आ चुके थे, व्हाट्सएप पर मैसेज दौड़ाया जाने लगा कि मीट मछली से किनारा कर लीजिये, नतीजा ये हुआ की छोटे पोल्ट्री उत्पादक किसान बर्बाद हो गए। घाटे के कारण ही आगरा में पोल्ट्री उत्पादक किसान ने आत्महत्या कर ली। यूपी में तो 40 फीसदी से ज़्यादा फार्म पहले से ही बंद हो चुके हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: रोयटर्स

देश में पोल्ट्री उद्योग का 90 हजार करोड़ से ज़्यादा का कारोबार है, जिसमें 65 फीसदी हिस्सा चिकन मीट का और 35 फीसदी हिस्सा अंडे का है। तेलंगाना, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश से लेकर से पंजाब-हरियाणा और उत्तर प्रदेश में करोड़ों लोग इस कारोबार से जुड़े हुए हैं। नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी के सीईओ डॉ इज़ील कुमार कहते हैं कि अफवाहों के बाजार में पोल्ट्री क्षेत्र को अभी तक लगभग 400 करोड़ का नुकसान हो चुका है अकेले हैदराबाद में तीन हफ्तों में 100 करोड़ का नुकसान हुआ है। अगर ये नहीं रुका तो इस नुकसान का आंकड़ा हजार करोड़ के पार चला जाएगा जिसमें कितनों का घर उजड़ जाएगा कितनों की रोजी-रोटी छिन जायेगी इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है।

किसानों को मुर्गी पालन में 80 रुपये प्रति किलो की लागत आती है मगर जब वो बाजार में मुर्गी बेचने आते हैं तो 13 रुपये, 14 रुपये प्रति किलो उन्हें मिल रहा है कहीं-कहीं ये 10 रुपये प्रति किलो से भी कम कीमत पर बिक रहा है, जो सीधे सीधे 60-65 रुपये का उन्हें नुकसान दे रहा है। तीन दिनों पहले ही बिज़नेस स्टैण्डर्ड में एक खबर छपी कि कर्नाटक में एक किसान ने अपनी 6,000 मुर्गियों को ज़िंदा मिट्टी में दफ़न कर दिया. स्थिति भयावह हो चली है, सोचिये जो किसान लोन और उधारी पर 6 लाख रुपये से भी ज़्यादा इस धंधे में लगा रहा हो बदले में उसे क्या मिल रहा है?

आप मास्क लगाए इतराये फिर रहे हैं और उधर पोल्ट्री किसान बिना मास्क के तबाह हुआ जा रहा है। किस-किस उद्योग के बर्बाद हो जाने की कहानियां लिखें? हर उद्योग की अपनी अलग कहानी है, किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता है। आप सवाल पूछने पर अड़ जाएं तो ज़्यादा संभव है सरकार इस क्राइसिस को मानने से भी इनकार कर दे, कहने लग जाए कि शाकाहारी बेचने और खाने वाले ही राष्ट्रभक्त हैं।

चिकन, अंडे की बिक्री में भारी गिरावट के बाद मक्का और बाजरा और सोया डीओसी में मांग नहीं आ रही है, वो अलग संकट है। बस अफवाहों से बचिए और दूसरों को भी बताइये कि अभी तक ऐसे किसी भी शोध में नहीं पाया गया है कि चिकन, मटन और सीफूड खाने से वायरस फैलता है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।