मंगलवार को दशहरा के मौके पर नागपुर में मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम को संबोधित किया जिसमें उन्होंने कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं. ऐसी कई जानकारियाँ जो आप नहीं जानते होंगे और न ही आपको स्कूल में पढ़ाई गई होंगी. अगर आप कोई किताब उठा कर भी इन जानकारियों को खोजना चाहेंगे तब भी आप खोज नहीं पायेंगे. क्योंकि मोहन जी ने यह अनमोल ज्ञान संघ में की गई कठोर तपस्या के बाद हासिल किया है.

अपने भाषण की शुरुआत में मोहन भागवत ने मोदी सरकार की पीठ थप-थपाते हुए कहा कि सरकार में वह शक्ति है जिससे देश आगे बढ़ सकता है. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि लिंचिंग जैसी घटनाओं को संघ और हिन्दुओं के साथ जोड़ना एक साज़िश है. इस तरह की घटना से संघ को बस बदनाम किया जा रहा है. मोहनजी संघ की बात करते हुए अच्छे लगते हैं पर जब हिन्दुओं की बात करते हैं तो तकलीफ पहुँचती है क्योंकि इन्हें नेता संघ का बनाया गया है. हिन्दुओं ने इन्हें अपना नेता नहीं चुना है और न ही लिंचिंग के लिए किसी एक समुदाय को किसी ने ज़िम्मेदार ठहराया है.

मोहन भागवत की एक बात सच है जिसका समर्थन हम भी करते हैं कि लिंचिंग का इल्ज़ाम किसी संघ पर लगाने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि, आतंक का कोई धर्म नहीं होता.   

मोहन भागवत/फोटो सोर्स गूगल
मोहन भागवत/फोटो सोर्स गूगल

अगर आतंक का कोई धर्म नहीं होता और यदि आतंक फैलाने वाला आतंकी किसी संगठन से जुड़ा है तो फिर हम सवाल किससे पूछे?

बुलंदशहर केस में क़ानून के रखवाले की हत्या करने वाली भीड़ भी आतंक का एक हिस्सा थी. उस भीड़ का एक आरोपी योगेश राज बजरंग दल का सदस्य है. ऐसे स्थिति में सवाल किससे पूछा जाए?

अखलाक़ की लिंचिंग का आरोपी विशाल सिंह अगर खुले आम योगी जी की रैली में सामने वाली कतार में बैठ कर योगी जी को चीयर करता है तो ऊँगली किस पर उठाई जाए और सवाल किससे पूछा जाए?

मोहन जी का कहना है कि –

स्वयंसेवक इस तरह की हिंसा को रोकने के लिए प्रशिक्षित रहते हैं. वह इस तरह के घटना में कभी हिस्सा नहीं लेते हैं. कहीं हो रहा हो तो वह इन घटनाओं को रोकने का प्रयास ज़रूर करेंगे.

इसके साथ ही मोहन जी ने यह भी कहा कि लिंचिंग जैसा शब्द हमारे यहाँ का नहीं है. यह शब्द बाहर से आया है और इसकी पुरानी कहानी बाहर के धर्म ग्रंथ में लिखी हुई है. जो ज्ञान मोहन जी ने साझा किया है उससे यह पता लगता है कि यह शब्द बाइबल से आया है.

ठीक ही कहते हैं मोहन भागवत, लिंचिंग शब्द बाहर से आया है. हो सकता है लिंचिंग शब्द जैसे बाहर से आया है. लिंच करने वाले लोग भी बाहर से ही आये हों. यह भी हो सकता है कि जिसकी लिंचिंग की गई हो उसे भी बाहर से लाया गया हो क्योंकि भागवत जी के हिसाब से भारत में लिंचिंग तो होती ही नहीं है.

मोहन भगवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक, सोर्स गूगल

अब हमारे यहाँ लिंचिंग नहीं होती तो क्या होता है? इसका भी जवाब आपको मोहन जी देंगे. मोहन जी के अनुसार, यह हमारी प्राचीन घटना है कि पानी के लिए किसी के बीच में लड़ाई होती भी है तो बुद्ध जाकर उस झगड़े को सुलझा देते हैं. इसका मतलब आप समझ रहे हैं मोहन जी कहना चाहते हैं कि पानी की समस्या कोई नई नहीं है. बल्कि यह समस्या बुद्ध के समय से चली आ रही है. अब तो बुद्ध जीवित नहीं है तो समस्या को सुलझाने कोई जाता नहीं होगा. लोग आपस में मार-पिटाई करके समझ लेते होंगे.

इनका कहना है कि यह परंपरा दूसरे देश की है जिसे भारत में थोपा जा रहा है. अगर इतने ही पारंपरिक ये सज्जन होते तो कॉटन का शर्ट पहन कर परंपरा की बातें न कर रहे होतें. भाई साहब कहते हैं कि विवेक के साथ काम करना चाहिए. मोदी जी ने तो वह भी कर दिया और इसके साथ यह कहते हैं कि जहाँ अमंगल हो रहा हो वहां भी मंगल की बात करना चाहिए. अमंगल पर सिर्फ ऊँगली नहीं उठानी चाहिए. मतलब क्या है, अगर कहीं किसी को कोई भीड़ मार दे तो आप चुप रहे और कुछ न बोले क्योंकि अमंगल है मंगल के इंतज़ार में बैठे रहे.

मंदी के ऊपर मोहन जी का कहना है कि जब तक 0 के नीचे ग्रोथ रेट नहीं पहुँचता तब तक मंदी नहीं आती इसलिए हमें चिंता करनी चाहिए पर जब तक ग्रोथ 0 न पहुँच जाए तब तक चर्चा नहीं करनी चाहिए. मतलब देश डूबते हुए दिख रहा है उसकी चिंता करिए पर उस बारे में चर्चा मत करिये.

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