सआदत हसन मंटो. एक लेखक और कहानीकार. जिसे सच बोलने की बीमारी थी. ‘बीमारी’ इसलिए क्योंकि उसका लिखना ही उसकी सबसे बड़ी मुसीबत थी. मंटो की लिखी कहानियाँ ‘समाज’ को बर्दाश्त नहीं होती थी. उन पर अश्लील होने का ठप्पा लग जाता था. अपनी लिखी कहानियों के लिए मुकदमे झेलने वाले मंटो को पसंद और ना-पसंद करने की वज़ह एक ही थी. उसकी कहानियाँ और कहानियों में उकेरा गया समाज का असली सच. जो जैसा दिखता है, अपने लिखे में उसको वैसा ही पेश करने वाले मंटो का आज 107वां जन्मदिन है.

मंटो के बारे में कुछ बातें

मंटो की ज़िन्दगी का टर्निंग प्वाइंट 

मंटो 11 मई 1912 को पंजाब में लुधियाना जिले के पपरौडी गाँव में पैदा हुये थे. मंटो के पिता पेशे से जज थे. परिवार ठीक-ठाक था. स्कूल की पढ़ाई-लिखाई वहीं हुई. इसके बाद 1933 में, 21 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात अमृतसर में अब्दुल बारी अलीग से हुई. अब्दुल बारी काफी पढ़े-लिखे और कानून के जानकार थे. वो खुद लिखते भी थे. उन्हीं ने सबसे पहले मंटो को लिटरेचर की दुनिया से पहचान करवाई थी. उन्हें रूस और फ्रांस के लेखकों को पढ़ने की सलाह दी गई. मंटो का बेबाकपन देखकर अब्दुल बारी ने ही मंटो को लिखकर अपना हुनर आज़माने के लिए कहा था. अब्दुल बारी से मुलाक़ात मंटो के लिए ज़िन्दगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई.

सआदत हसन मंटो, फोटो साभार- गूगल

मंटो और बंबई 

मंटो ने रूस और फ्रांस के लेखकों को पढ़ना शुरू किया था. इसी दौरान उन्हें फ्रांस के लेखक विक्टर ह्यूगो का लघु उपन्यास ‘The Last Day of a Condemned Man’ मिला. मंटो को ये उपन्यास इतना पसंद आया कि उन्होंने इसका उर्दू अनुवाद कर डाला. उर्दू में यही उपन्यास ‘सरगुजश्त-ए-आमेर’ के नाम से प्रकाशित किया गया था. मंटो के इस अनुवाद वाले काम की काफी तारीफ हुई, जिसके चलते उन्हें लुधियाना के एक अख़बार ‘मासावत’ की संपादकीय टीम में शामिल कर लिया गया. इसी दौरान मंटो ने अपनी आगे की पढ़ाई करने का फैसला किया और 1934 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एडमीशन ले लिया. वहीं पर उनको इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (IPWA) से जुड़ने के लिए कहा गया जिसके लिए वो तैयार हो गए. इसी एसोशिएसन में मंटो की मुलाक़ात उस दौर के कवि, लेखक और फिल्म गीतकार अली सरदार जाफरी से हुई. उन्होंने मंटो को बंबई (मुम्बई) जाने की सलाह दी. 1934 में मंटो मुम्बई पहुँच गए. जहां से उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखने की शुरुआत की. मंटो ने 1945 में रिलीज हुई मिर्ज़ा ग़ालिब, दीन और शिकारी जैसी बेहतरीन फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी है. फिल्मी दुनिया में भी उनकी अच्छी-ख़ासी पूछ-परख थी. उस दौर के मशहूर कलाकार, लेखकों में से नूरजहाँ, नौशाद, इस्मत चुगतई और अशोक कुमार जैसे बड़े नामों से मंटो की खूब दोस्ती थी. कहा जाता है कि बॉलीवुड के मशहूर विलेन अभिनेता प्राण को हिन्दी फिल्मों में लेकर आने का काम मंटो का ही था.

फोटो साभार – गूगल

मुंबई का रेडलाइट एरिया और मंटो

मुंबई में स्क्रिप्ट राइटिंग करने के दौरान मंटो मुंबई के एक रेडलाइट एरिया कमाठीपुरा में रहते थे. जहां रहने के दौरान उन्होंने वहाँ रहने वाले सेक्सवर्कर्स और लोगों को काफी करीब से देखा. उनके जीवन का मंटो पर गहरा असर पड़ा. कमाठीपुरा में रहने के दौरान उन्हें वहां रहने वाली वेश्याओं की छुपी हुई ज़िंदगी के बारे में पता चला. जिसके बाद उन्होंने अपनी कई सारी कहानियों में वेश्याओं का ज़िक्र किया है. मंटो अपनी कहानियों में उन लड़कियों और औरतों का वो हिस्सा लेकर आते थे जो समाज के सामने नहीं आ पाता है. उनकी तमाम कहानियों में वहां रहने वाली औरतों की ज़िन्दगी के ऐसे कई पहलू देखने को मिल जाएंगे जो आमतौर पर रात की चीख़ों और दिन के उजाले में कहीं खो जाते है.

औरतों को लेकर मंटो का रुख हमेशा बराबरी का रहा है. उन्होंने अपनी कहानियों में मर्दवादी सोच की खुल कर खिलाफत की है. मंटो औरतों के हिमायती या मसीहा बनने के बजाय उनकी आवाज़ बनकर अपनी कहानियों के जरिये बराबरी की बात कहते थे. मंटो ने अपनी कहानियों में औरत के हर उस पहलू को सामने रखा है जिसको कहने, लिखने और सुनने तक से लोग परहेज करते थे. बिना किसी भाषायी लाग लपेट के मंटो ने हर बात को वैसा ही कहा जैसी वो दिखती थी. शायद इसीलिए मंटो पर अक्सर अश्लील होने का ठप्पा लग जाता था.

मंटो और सफिया

मंटो स्वभाव से खूब मज़ाकिया थे. तल्खी उनके लिखे में ज्यादा थी न कि उनके स्वभाव में. मंटो को बातचीत के दौरान लोगों की बात काटकर चुहल और तंज करने की आदत थी. पर यही मंटो, सफिया के आगे चुप हो जाते थे. सफिया दीन, मंटो की पत्नी. जिनके बारे में बाहरी दुनिया नाम मात्र ही जानती थी. मंटो और सफिया की शादी 1936 में हुई थी. सफिया और मंटो की बहुत सारी बातें एक-दूसरे से बिलकुल उलट थी. मंटो खुले मिजाज का बेबाक आदमी, वहीं सफिया शांत और शर्मीले स्वभाव की औरत रही हैं. पर इन सब के बाद भी सफिया बेहद मजबूत महिला थी. मंटो और परिवार को सबसे बुरे दौर में भी संभाले रखना सफिया का असल किरदार दिखाता है. मुंबई से लेकर पाकिस्तान तक सफिया का साथ सआदत हसन को ‘मंटो’ बनाए रखने में बेहद ज़रूरी हिस्सा था. इस बात का ज़िक्र मंटो ने अपने लिखे हुए में भी किया है.

पत्नी सफिया के साथ मंटो, फोटो साभार- गूगल

मंटो, मुंबई से पाकिस्तान

1947 में बंटवारे के एक साल बाद मंटो पाकिस्तान चले गए. हालांकि मंटो ने पाकिस्तान जाने का फैसला खुशी से नहीं किया था. 1948 तक मंटो मुंबई में ही रहे है. पर, बाद में दंगों के बिगड़ते हालात देखकर उन्होंने पाकिस्तान जाने का फैसला किया. पाकिस्तान में मंटो; नासिर कासमी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और अहमद राही जैसे मशहूर शायरों के साथ रहे. इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के बुरे हालातों को भी काफी करीब से देखा. मंटो ने विभाजन के दर्द को अपनी कहानियों में बयान करते हुये ‘टोबा टेक सिंह’ जैसी कहानियाँ लिखी. सपाट शब्दों में समाज का असल दिखाने वाले मंटो लंबे वक़्त तक शराब के साथ रहे. जिसके चलते उन्हें लीवर की खतरनाक बीमारी हो गई. आखिर में महज 43 साल की उम्र में 18 जनवरी 1955 को मंटो ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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