हम भारतीय बड़बोले होते हैं। हमें दो तरह की बात करना बेहद पसंद होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें बात करना बेहद पसंद है। बात चाहे जैसी हो, माने कि उसका मतलब हो या न भी हो। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। बात होती रहनी चाहिए। बात करने की इतनी आदत है हमें कि हमें यह भी खयाल नहीं रहता कि हम कहाँ क्या बात कर रहे हैं?

सबसे पहले एक बात

हमारे देश में मुद्दों की कमी तो है नहीं और न ही जियो के आने के बाद से डेटा पैक की। इस डेटा पैक की मेहरबानी से हम हर मुद्दे पर अपनी राय रख ही लेते हैं। हमारा देश महान है पर, इस महानता का पहाड़ जैसा शब्द एक ओट में पड़े बलात्कार और शोषण जैसे गंभीर मुद्दों को छिपा लेता है। बड़े-बड़े ‘देशभक्त’ भी इस बात से कोई दोराय नहीं रखते हैं कि देश में बलात्कार की घटनाएँ काफी आम हैं। पर, फिर भी देश महान है। देश महान है, इससे हमें कोई ऐतराज नहीं है। पर क्या आपको नहीं लगता कि देश को महान उस देश के लोग बनाते हैं? तो क्या देश के लोग महान हैं? जवाब है कि हाँ, पर बहुत कम।

हम ऐसा क्यों कह रहे हैं?

दरअसल, यह माना और जाना हुआ है कि हमारे देश में बलात्कार बहुत होते हैं। “बलात्कार नहीं होने चाहिए”, ये बात हम मानते भी हैं और हर बलात्कार की घटना के बाद लगभग लगभग देश का हर इंसान सोशल मीडिया पर ऐसा लिखता भी है। देश का पढ़ा लिखा वर्ग यही मानता है कि बलात्कार की घटना के पीछे एक विकृत मानसिकता जिम्मेदार होती है। जो लोग ऐसा नहीं मानते हैं उन्हें पढ़े-लिखे लोगों में गिनना मूर्खता के दायरे में ही आएगा। हर बार बलात्कार की घटना पर हमारा खून उबालें मारने लगता है। बलात्कारियों को फांसी या फिर बीच चौराहे पर गोली मार देने की बात हर भारतीय उस दिन (ज्यादा से ज्यादा सप्ताह भर) ‘मौन चीख’ के जरिये फेसबुक पर चिल्लाता रहता है। सही है। हम भी मानते हैं। रेपिस्ट को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। यह सही है। लोग जब एक साथ चिल्लाते हैं तो उनकी बात शोर में बदलती है। शोर आंदोलन का गहना होता है। आंदोलन सरकार को जगाती है। सरकार जब जागती है तो कानून बनता है। कानून बनता है तो समाज में सुधार आता है। सुधार जरूरी है जीने के लिए, इंसानियत के लिए।

अब एक घटना पर नज़र डालिए।

जो फेसबुक आज हमारे किसी भी तरह के आंदोलन का कहीं न कहीं एक जरिया बन चुका है। आज उसी फेसबुक के मालिक मार्क जकरबर्ग ने एक पोस्ट डाला। इस पोस्ट में उन्होंने अपनी बहन को टोनी अवार्ड जीतने की बधाई दी। टोनी अवार्ड रीज़नल थियेटर के लिए दिया जाने वाला अवार्ड है और इस क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे बड़ा अवार्ड। खुद अगर मार्क जकरबर्ग जैसी हस्ती इस अवार्ड के लिए किसी की प्रशंसा करे तो यह अपने आप में उस अवार्ड की वैल्यू बताने के लिए काफी है। मार्क जकरबर्ग के करोड़ों फॉलोवर्स हैं। इन करोड़ों लोगों में भारत देश के भी कई लोग हैं। अब आगे की बात से पहले आप मार्क का यह पोस्ट देखिये –

 

मार्क जकरबर्ग की बहन का नाम रेंडी जकरबर्ग है। ‘रेंडी’ शब्द को जब अंग्रेजी (Randi) में लिखा जाता है तब वह पढ़ने में उस शब्द की तरह लगता है जो शब्द हम भारत में वेश्याओं के लिए उपयोग करते हैं। इसे वेश्याओं के लिए गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। बस यही हुआ। मार्क के इस पोस्ट के बाद भारत के वीर सोशल लड़ाके और खलिहर लोग आकर इस पोस्ट पर भर-भर के कमेन्ट करने लगे। बाकायदा कुछ लोगों ने उनकी बहन की तस्वीर लगा कर उसे भला-बुरा कहा। कुछ ने किसी दूसरे शख्स के साथ उनकी तस्वीर कमेन्ट में पोस्ट कर के उसे रैंडी जकरबर्ग का कस्टमर तक बता दिया। कई ने गालियों का इस्तेमाल भी बेशर्मी के साथ किया। वैसे इस तरह के कमेन्ट करने वाले सिर्फ भारत के लोग नहीं थे। इन लोगों में से कई पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से भी वास्ता रखते थे। सबसे अफसोस की बात है कि इन बेहद ओछे कमेंट्स पर रिएक्शन भी खूब आए हैं।

यानि के समस्या ग्लोबली है। दिमागी रूप से विकलांगता की समस्या दुनिया भर में फैली है और इनकी तादात भी कम नहीं है। पर, दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने घर में झांकना बेहतर होता है।

घर का हाल

ट्रोल। हमारे देश में फलता-फूलता बेरोजगारी वाला रोजगार। ट्रोल की खास बात- इसमें ह्यूमर होता है। ह्यूमर सबको पसंद आता है। पर, ह्यूमर का एक स्तर होता है। उस स्तर से नीचे आने के बाद वो ह्यूमर सस्ते जोक्स में काउंट होते हैं। सस्ते जोक्स लीचड़पने की पहचान होते हैं, खास कर वो फूहड़ जोक्स जो महिलाओं के ऊपर बनाए जाते हैं। महिलाएं हमारे देश में काफी ईज़ी टार्गेट होती हैं। महिलाओं को पूजने वाली लाइन काफी पुरानी हो चुकी है। पर, देवियों को पूजने वाले ये लोग अब खुले आम महिलाओं पर अपनी पुरुषवादी उल्टी करने से भी बाज नहीं आते।

अब दोगलेपने की बात

जहां एक तरफ देश के तमाम सोशल मीडिया के वीर लोग फेसबुक पर महिलाओं के अधिकार के लिए मोमबत्ती की तस्वीर लगा कर और जहर बोने वाले कोट्स और शायरी पोस्ट कर रहे हैं। वहीं ऐसे ही कुछ लोग एक महिला की इज्जत सारेआम तार-तार करने से बाज नहीं आते। उदाहरण के तौर पर हमने एक ट्रोल का फेसबुक अकाउंट चेक किया। इस ट्रोल ने लिखा है कि

रेंडी का मतलब होता है पैसे दो और रात भर मजे लो।

फेसबुक एकाउंट से लिया गया स्क्रीनशॉट

जब हमने इन भाईसाहब का फेसबुक टाइमलाइन चेक की तो सबसे पहला पोस्ट हमें आसिफा के हक में लड़ने के लिए थी।

फेसबुक एकाउंट से लिया गया स्क्रीनशॉट

इसी को दोगलापन कहते हैं। एक तरफ आप किसी बच्ची के बालात्कार को लेकर गुस्सा दिखाते हैं और दूसरी तरफ किसी महिला के लिए खुलेआम बेहद फूहड़ कमेन्ट करते हो। ये क्या है? इसे क्या कहेंगे? बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। जन-जन से देश। अपनी सोच सुधारिए। देश सुधर जाएगा। सिर्फ फेसबुक पर महिला अधिकारों के लिए दो आँसू बहाने से कुछ नहीं होता है। देश में महिलाओं के लिए माहौल तब बदलेगा जब देश के लोगों की मानसिकता बदलेगी। मानसिकता महिलाओं को ‘ईज़ी टू टेक’ वाली। मानसिकता हर दूसरी लड़की या महिला को गोश्त समझने वाली जिसे नोच कर खाने का ही मजा है। मानसिकता महिलाओं को एक इंसान से पहले एक बदन समझने वाली। क्योंकि जिस दिन यह मानसिकता बदल गयी उस दिन कठुआ या फिर अलीगढ़ या फिर ऐसी कोई भी घटना के लिए किसी कड़े कानून की दरकार नहीं होगी। महिलाएं सुरक्षित हो जाएंगी। समाज में भी और फेसबुक पर भी।

इन सब के अलावा सबसे इंपोर्टेंट बात। अगर कोई महिला वेश्यावृत्ति में है तो यह उसकी खुद की मर्ज़ी है। वेश्यावृत्ति हमारे देश में गलत है क्योंकि यह यहाँ पर लीगल नहीं है माने कि इसे कानूनन गलत माना जाता है। कानूनन गलत करार देने के पीछे वजह है मानव तस्करी, लड़कियों को बेच देना।

पर वहीं दूसरी तरफ इसके पीछे एक और वज़ह है वो है भारतीय मानसिकता और वो संस्कार जिनके तहत हम बंधे हुए हैं। हमारे देश में महिलाओं के उठने, सोने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने से लेकर क्या करना है और क्या नहीं करना है, इन सब का फैसला उनसे ज्यादा उनके घर के पुरुष लेते हैं। हमारे देश में महिलाओं के ऊपर एकाधिकार वाली मानसिकता है। महिलाएं ‘पवित्र’ ज्यादा अच्छी लगती हैं। पवित्र, शरीर और चाल-चलन से। ऐसे में वेश्यावृत्ति को सही मानने वाले लोग कहाँ से ही आएंगे। खैर, कई देशों में यह लीगल है। लेकिन अगर आपके देश में यह गलत है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप किसी भी महिला को उसके देश, कपड़ों, रहन-सहन या ‘नाम’ को देखकर बिना कुछ जाने समझे कुछ भी कमेन्ट करेंगे। किसी भी महिला को ऐसी बात कहने से पहले आपको दस बार सोचना चाहिए। ऊपर से अगर आप ऐसी बातों को मजाक या ह्यूमर के नाम पर परोस रहें हैं तो ये हाशिये पर जा चुकी आपकी सोच को ही दर्शाता है।

यह स्टोरी पुष्कर कश्यप ने लिखी है.