राष्ट्रपति भवन के नॉर्थ ब्लॉक में स्थित वित्त मंत्रालय में मीडिया की एंट्री पर रोक लगा दी गई है. फिलहाल उन्हीं पत्रकारों को अंदर जाने दिया जा रहा है जिन्होंने अधिकारियों से मिलने का समय मांग रखा था. आमतौर पर नॉर्थ ब्लॉक के वित्त मंत्रालय में पत्रकारों की एंट्री बजट पेश होने के दो महीने पहले से रोक दी जाती है. हालांकि इस बार 5 जुलाई को बजट पेश हो जाने के बाद भी मीडिया को नॉर्थ ब्लाक में एंट्री नहीं दी गई.

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नॉर्थ ब्लॉक, फोटो सोर्स: गूगल

यहां तक की पीआईबी(प्रेस इंफॉरमेशन ब्यूरो) कार्ड धारक मान्यता प्राप्त पत्रकारों को भी रोका गया. जिसके बाद सोशल मीडिया और पत्रकारों के बीच इसको लेकर काफी हो-हल्ला हुआ. वैसे भी मोदी सरकार की छवी हमेशा से मीडिया विरोधी रही है.

 वित्त मंत्रालय का क्या कहना है?

इस बैन को विवाद का रूप लेता देख वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कार्यलय से जारी एक स्पष्टीकरण में कहा गया है कि वित्त मंत्रालय के अंदर मीडिकर्मियों के प्रवेश को लेकर एक नई प्रक्रिया तय की गई है. और रही बात पत्रकारों की एंट्री पर बैन की तो ऐसा कुछ नहीं है. वहीं पत्रकारों और आम जनता के बीच कोई गलत संदेश न जाए इस बात को ध्यान में रखते हुए वित्त मंत्रालय ने इस बैन पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए ट्वीट किया है.

ट्वीट की अहम बातें

  • वित्त मंत्रालय ने ये स्पष्ट किया है कि मीडिया की एंट्री पर कोई रोक नहीं है. बस मीडिया कर्मियों की सहुलियत का ध्यान रखते हुए एक नया नियम बनाया गया है.
  • मंत्रालय ने बताया है कि पत्रकारों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से हुई मुलाकात में यह कहा था कि उन्हें एक सेप्रेट रूम दिया जाए ताकि वो अपना काम बिना किसी रुकावट के कर सके. क्योंकि सेप्रेट रूम न होने की वजह से उन्हें अधिकारियों से मिलने के लिए कॉरिडोर में इंतजार करना पड़ता था.
  • इसी को ध्यान में रखते हुए वित्त मंत्री के आदेश अनुसार पत्रकारों के लिए नॉर्थ ब्लॉक के गेट नं. 2 पर तमाम तरह की व्यवस्था की जा रही है ताकी उन्हें रिपोर्टिंग के समय किसी तरह की परेशानी न हो.
  • वहीं वित्त मंत्रालय ने ये स्पष्ट कर दिया है कि अधिकारियों से मिलने से पहले पत्रकारों को अपॉइंटमेंट लेना होगा. साथ ही पीआईबी कार्ड धारक मान्यता प्राप्त पत्रकारों को अपॉइंटमेंट के अलावा किसी और तरह के पास की जरूरत नहीं होगी.
  • वित्त मंत्रालय का कहना है कि ये सारी कवायद पत्रकारों की सहुलियत को ध्यान में रखते हुए की गई है जिससे पत्रकारों के काम में कोई रुकावट या परेशानी न आए.

वैसे सवाल ये उठता है कि क्या वित्त मंत्रालय को इस तरह का फैसला लेने से पहले पत्रकारों से बात नहीं करनी चाहिए थी? अगर ऐसा किया जाता तो पत्रकारों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती. और न ही वित्त मंत्रालय को इसे संभालने के लिए स्पष्टीकरण नहीं देना पड़ता. वैसे भी लोकतंत्र का नियम है कि कोई भी फैसला बिना चर्चा के नहीं लिया जाना चाहिए.

 

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