अजीब दौर है साहब। अब हथियारों और गोला-बारूदों के साथ कपड़ों से भी डरने लगे है लोग. सही बात है, डरे भी क्यों ना! वो कहते है न:

‘न जाने किस भेस में, भला कौन हो?’

हम बात कर रहे हैं देश और दुनिया में तेज़ी से चल रही उस चर्चा की जिसके तहत चेहरे को छुपा लेने वाला कपड़ा यानि कि ‘बुर्का’ पर सुरक्षा के नज़रिए से बैन लगना चाहिए या नहीं.

कब और क्यों छिड़ी ‘बुर्का पर बैन’ की बहस?

असल में 21 अप्रैल की सुबह श्रीलंका में एक के बाद एक बॉम्ब ब्लास्ट हुए, जिसमें तीन चर्चों और तीन आलीशान होटलों को निशाना बनाया गया. इस दर्दनाक हमले में 250 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई. ज़ख़्मी और माली नुकसान का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हैं. इसी हमले की कार्यवाही में श्रीलंका की सरकार ने देश की सुरक्षा का हवाला देते हुए 29 अप्रैल से बुर्का और उन तमाम चीजों पर बैन लगा दिया, जिससे चेहरा ढका जा सकता हो. फिर हुआ ये कि यह खबर भारत पहुंची और इस कदम की सराहना करते हुए, देश के सुरक्षा की फिक्र करने वाली सबसे पहली पार्टी सामने आई ‘शिवसेना’. जिसने दो दिन पहले अपनी पार्टी के मुख-पत्र का संपादकीय जारी किया. श्रीलंका सरकार की तारीफ़ करते हुए, शिवसेना ने मुख-पत्र के शीर्षक में लिखा कि

प्रधानमंत्री मोदी से सवाल: रावण की लंका में हुआ, राम की अयोध्या में कब होगा.

शिवसेना ने अपना मक़सद साफ करते हुए पीएम मोदी से पूछा है कि जब रावण के देश में बुर्का बैन हो सकता है तो राम के देश में कब होगा?

अब देश में कब होगा, इसका तो मालूम नहीं. लेकिन हाँ, केरल में स्थित मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी (एमईएस) के अध्यक्ष पी. के. अब्दुल गफूर के कानों तक, शिवसेना की ये पुकार ज़रूर पहुंच गई है. एमईएस केरल के कोझिकोड में स्थित हैं. इस संस्थान ने अपने परिसर में बुर्का डालने पर बैन लगा दिया है. लेकिन इसने सुरक्षा का हवाला नहीं दिया है. इसका मानना है कि बुर्का पहनना नया चलन है. इससे पहले मुस्लिम समुदाय में यह पहनावा आम नहीं था. अध्यक्ष पी. के. गफूर का कहना है कि ‘धार्मिक कट्टरपंथ’ के नाम पर थोपे जा रहे ड्रेस कोड को लागू करने के लिये एमईएस तैयार नहीं है, समाज में जो भी परिधान स्वीकार्य न हो उसे पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती, फिर चाहें उसका मजहब से जुड़ाव ही क्यों न हो’.

साथ ही, मुस्लिम संगठनों द्वारा विरोध होने पर उन्होंने साफ कर दिया है कि उनका ये फ़ैसला अटल है और एमईएस अपने इसी फैसले के साथ ही आगे बढ़ेगा. एमईएस के सर्कुलर में कहा गया है कि चेहरा ढंकने वाला कोई भी कपड़ा पहनकर कक्षा में उपस्थित न हों और अगर कोई पहनकर आता है तो उसे कक्षा में घुसने नहीं दिया जाएगा. हालांकि, यह फ़ैसला नए सत्र 2019-20 से लागू होगा.

इस फैसले के विरोध में उतरे मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह सर्कुलर ‘गैर इस्लामिक’ है और इसे वापस लेना चाहिए. विरोध कर रहे एक संस्था के सदस्य उमर फैज ने कहा, ‘‘ इस्लामिक नियम के अनुसार महिलाओं के शरीर का कोई अंग नहीं दिखना चाहिए. एमईएस को कोई अधिकार नहीं है कि वह चेहरों को ढंकने वाले कपड़े पर प्रतिबंध लगाए। इस्लामिक नियमों का पालन होना चाहिए’’

यह आर्टिकल द कच्चा चिट्ठा के लिए हमारे यहाँ इन्टरन्शिप कर रहे अशरफ अली ने लिखा है।