आज यानि 1 मार्च 2019 को भारतीय एयरफोर्स के वीर जवान अभिनंदन पाकिस्तान से वापस अपने देश भारत आ रहे हैं। पिछले दिनों जब पाकिस्तानी वायु सेना के F-16 लड़ाकू विमान ने भारतीय सीमा में नापाक इरादे से घूसने की कोशिश की, तो भारतीय वायु सेना के बहादुर जवान अभिनंदन ने मिग 21 विमान से पाकिस्तान की फौज को मुँहतोड़ जवाब दिया। लेकिन दोनों ही तरफ से होने वाले मुटभेड़ में अभिनंदन पाकिस्तान में दुर्भाग्य वस फंस गए। जिसके बाद जेनेवा संधि के आधार पर पाकिस्तान को अंतराष्ट्रीय दवाब में भारतीय जवान को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

पाकिस्तानी सरकार के इस फैसले को दो महत्वपूर्ण संकेत के रुप में देखा जा रहा है। पहला संकेत यह है कि पाकिस्तान सरकार ने यह फैसला लेकर दक्षिण एशियाई देशों के बीच शांति का संकेत दिया है। इसके अलावा इस फैसले का दूसरा संकेत इस रूप में देखा जा रहा है कि अभिनंदन की वापसी एक तरह से भारतीय कुटनीति की जीत है।

आज अभिनंदन जिस जेनेवा संधि के आधार पर मुल्क में वापस आ रहै हैं, उसी जेनेवा संधि को मानने के इंकार करके 54 भारतीय वीरों को पाकिस्तान ने हमेशा के लिए हिरासत में बंद कर दिया था। आज अभिनंदन के घर वापसी से जो खुशी देश और उनके परिजनों को है, उसी खुशी के लिए पिछले चार दशक से 54 परिवारों के लोग रोज तड़प रहे हैं। दरअसल, यह बात 1971 के दौरान की है। जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी। इसी दौरान भारत ने पाकिस्तान में रहने वाले पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमानों को आजादी दिलाने का फैसला किया। इस दौरान देश के 54 भारतीय जवान युद्ध के दौरान पाकिस्तान बॉर्डर के उस पार फंस गए।

इन बंदियों को आज भी “THE MISSING 54” के नाम से जाना जाता है। 1971 में पाकिस्तान में फंसने वाले जवानों के लिए मिसिंग इन एक्शन नाम दिया गया। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में फंसने वाले इन जवानों में 30 आर्मी के जवान थे जबकि 24 एयरफोर्स के जवान थे। इनमें 5 स्कॉड्रन लीडर, 6 मेजर और 2 सेकेंड लेफ्टिनेंट थे। इसके अलावा सूबेदार और हवलदार भी इन 54 जवानों में शामिल थे।

1979 में भारत के विदेश राज्य मंत्री समरेंद्र कुंडु ने संसद में एक सवाल के जवाब में भी इस बात की जानकारी दी थी। इसके बाद अंतराष्ट्रीय कमेटियों के दरवाजे भी जवानों की वापसी के लिए सरकार ने खटखटाए थे, लेकिन इसमें देश को सफलता नहीं मिली थी। 1989 तक पाकिस्तान ने इस बात से इंकार किया कि भारत के जवान अभी भी उसके जेल में बंद हैं। दिसंबर 1989 में राजीव गांधी ईस्लामाबाद के दौरे पर थे। इस दौरान उन्होंने लापता सैनिकों की रिहाई के लिए अपने समकक्ष से बात की। लेकिन बावजूद इसके इन 54 जवानों को पाकिस्तान ने नहीं छोड़ा।

हलाँकि, द डिप्लोमेट ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 1972 में टाइम पत्रिका ने इन कैदियों की तस्वीर छापकर यह बताया कि 54 लोग पाकिस्तानी जेल में बंद है। चार दशक में सेना के इन जवानों के साथ क्या हुआ इसका कुछ भी अपडेट भारत सरकार को नहीं दिया गया है।

 

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