वाराणसी के चंदन और राजेश शहीद हो गए। आप सोच रहे होंगे कि बॉर्डर पर जारी तनाव के बीच हुई गोलीबारी में ये दोनों शहीद हो गए होंगे। यदि आप ऐसा सोच रहे हैं, तो आप बिल्कुल गलत सोच रहे हैं।

दरअसल, ये दोनों ही नाम किसी सेना के जवान का नहीं, बल्कि वाराणसी के सफाई कर्मियों की है। इन दोनों ही लोगों ने वाराणसी शहर के गटर को साफ करने के दौरान दम तोड़ दिया ….देश के प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों सफाई कर्मचारियों का पैर धोकर यह जाहिर कर दिया कि हमारे शहर की गंदगी को साफ करने वाले ये लोग समान्य नहीं महान हैं….सही मायने में तो ये लोग महान ही हैं।

ऐसे में जब ये लोग अपनी ड्यूटी के दौरान मरते हैं तो इन्हें शहीद ही कहा जाना चाहिए…..ये बात और है कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है…लेकिन संविधान में तो अर्धसैनिक बलों को भी शहीद कहने का प्रवधान नहीं है। इसलिए जिस तरह बॉर्डर पर सैनिक व अर्धसैनिक बलों के जवान राष्ट्र की सेवा करने के दौरान दम तोड़ते हैं तो शहीद कहलाते हैं…ठीक उसी तरह सफाई कर्मचारी भी देश के अंदर कहीं गंदगी साफ करने के दौरान दम तोड़ते हैं तो अपने राष्ट्र की सेवा करने वाले इन सफाई कर्मचारियों को भी शहीद ही कहा जाना चाहिए।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार: गूगल

भारत व पाकिस्तान दोनों ही मुल्कों के बॉर्डर पर जारी तनाव के बीच यह दु:खी करने वाली ख़बर प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र से आई है। दरअसल, वाराणसी में शुक्रवार को तीन मजदूर शहर के गटर की सफाई करने के लिए अंदर गए थे। लेकिन दुर्भाग्यवश अचानक चैंबर की दीवार खिसक गई और तीनों मजदूर उसमें फंस गए। इसके बाद सरकारी स्तर पर तीनों को बचाने का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन मौके पर दो मजदूरों की मौत हो गई। मीडिया से आ रही ख़बरों के मुताबिक वाराणसी के शिवपुर के मिनी स्टेडियम निवासी चंदन, बिहार के मोतिहारी निवासी राजेश और उमेश सीवर लाइन की सफाई के लिए अंदर गए थे।

हलांकि, हर बार की तरह इस बार भी घटना के बाद स्थानीय प्रशासन की मदद से मजदूरों का शव कड़ी मशक्कत के बाद निकाला गया। मौके पर मौजूद लोगों ने आक्रोशित हो कर शव को ले जा रही एंबुलेंस पर पथराव भी किया। बीच-बचाव करके पुलिस ने किसी तरह दोनों मजदूरों के शव को दीनदयाल अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए भेजवाया।

इस घटना के बाद एक समान्य सवाल उठता है कि वाराणसी में घटने वाली किसी भी घटना की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर देना कितना सही है? इसके अलावा एक दूसरा सवाल यह भी उठता है कि यदि प्रधानमंत्री मोदी नहीं तो इस घटना के लिए कौन जिम्मेदार है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो सोर्स: गूगल

वाराणसी में घटने वाली घटना हमारे सामाज के लिए कोई नई बात नहीं है। इस घटना में नई बात यह है कि कुंभ में सफाई कर्मचारियों के पैर धोने के कुछ ही दिनों बाद यह घटना घटी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कुंभ में सफाई कर्मचारियों के पैर धोकर समाज को बिल्कुल नया संदेश दिया है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सोचने वाली बात है कि सरकार ने इन सफाई कर्मचारियों को इज्जत देने के अलावा सरकारी स्तर पर कौन सी सुविधाएं दी?

हलांकि, तीन जनवरी 2019 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने राज्यसभा में बताया कि उच्चतम न्यायालय के 1993 के फैसले के मद्देनजर सफाईकर्मियों को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है।

अब तक 331 लोगों की मौत हुई है और उनमें से 210 लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जा चुका है। गहलोत ने कहा कि ”इस संबंध में 2013 में एक सर्वेक्षण किया गया था। 17 राज्यों के करीब 160 जिलों में इस संबंध में फिर से सर्वेक्षण किया जा रहा है।”

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स: गूगल

अब आप राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की वेबसाइट, अयोग के अध्‍यक्ष और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री के राज्‍यसभा में बताए गए आंकड़ों में आए अंतर से समझ सकते हैं कि सफाईकर्मियों की जान की कीमत क्‍या है। बता दें, 27 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 1993 से लेकर अब तक सीवर में दम घुटने की वजह से मरे लोगों और उनके परिवारों की पहचान की जाए। साथ ही हर पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में 10 लाख रुपये दिए जाएं। इसके बाद से ही सरकार की ओर से आंकड़े जुटाने की कवायद शुरू हुई है। हालांकि, करीब 4 साल बीतने के बाद भी सरकार के पास कोई स्‍पष्‍ट आंकड़ा नहीं है।

इससे पता चलता है कि सरकार की कथनी और करनी में बहुत अंतर है। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री ने भले ही इन सफाई कर्मचारियों का पैर धोकर उनको इज्जत दिया हो लेकिन उनकी जिंदगी बचाने के लिए उन्होंने अब तक कोई बड़ा काम नहीं किया है।

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