इंडस्ट्री दो तरह की होती हैं. एक पब्लिक सेक्टर की, दूसरी प्राइवेट सेक्टर की. पब्लिक सेक्टर का उद्देश्य प्रॉफिट कमाने के साथ-साथ लोगों की सेवा करना भी होता है. यह इंडस्ट्री ज्यादातर सरकार द्वारा चलाई जाती हैं. या फिर इन इंडस्ट्रीज़ में सरकार इन्वेस्ट करती है. इसके ठीक उल्टा प्राइवेट इंडस्ट्रीज़ में होता है. इसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ प्रॉफिट कमाना होता है. यही वजह है कि भारत में सबसे ज्यादा तरजीह पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को दिया जाता है. इनमें रेलवे, पेट्रोलियम कंपनी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि शामिल हैं. हालांकि, बीते कुछ समय से मोदी सरकार लगातार इन सभी सेक्टर्स के निजीकरण यानि प्राइवेट करने पर जोर दे रही हैं.

इसका सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि अपनी नाकामियों से पीछा छुड़ाया जाए और प्राइवेट सेक्टर्स पर इसे मढ़ दिया जाए. रेलवे के बाद सरकार ने पेट्रोल को भी एक तरह से प्राइवेटाइज करने का मन बना लिया है.

BPCL (भारतीय पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड), फोटो सोर्स: गूगल
BPCL (भारतीय पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड), फोटो सोर्स: गूगल

भारतीय पेट्रोलियम बिकने वाली है?

मोदी सरकार ने देश की सबसे बड़ी पेट्रोलियम कंपनी BPCL (भारतीय पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड) को बेचने का पूरा मन बना लिया है.

जनसत्ता में छपी ख़बर के अनुसार, जापानी स्टॉकब्रोकर नोमुरा रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के अलावा सरकारी क्षेत्र की एक अन्य तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने भी BPCL (भारतीय पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटिड) में हिस्सेदारी खरीदने में इंट्रेस्ट दिखाया है.

वित्त मंत्री निर्मला सितारमण,फोटो सोर्स: गूगल
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण,फोटो सोर्स: गूगल

इसकी वजह क्या है?

सरकार पेट्रोलियम ईंधन के खुदरा बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाना चाहती है. ताकि बाजार में कॉम्पिटिशन बढ़े. इसी को ध्यान में रखते हुए विनिवेश मामलों के कोर ग्रुप ने रणनीतिक निवेश के तहत BPCL में सरकार की पूरी 53.29 फीसदी हिस्सेदारी को बेचने की सिफारिश की थी.

भारतीय संसद, फोटो सोर्स: गूगल
भारतीय संसद, फोटो सोर्स: गूगल

संसद की मंज़ूरी की जरूरत नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2003 में व्यवस्था दी थी कि BPCL (भारतीय पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटिड) और HPCL (हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन) का निजीकरण सरकार द्वारा कानून में संशोधन के बाद ही किया जा सकता है. संसद द्वार ही दोनों कंपनियों के राष्ट्रीयकरण का फैसला लिया गया था.

हालांकि मोदी सरकार ने 2016 में इस (राष्ट्रीयकरण कानून) को रद्द कर दिया था. अब जब सरकार इसके निजीकरण का फैसला ले रही है तो इसके लिए उसे संसद की मंज़ूरी की कोई जरूरत नहीं है.

नोमुरा का भी इसको लेकर यही कहना है कि सचिवों की समिति की तरफ से कंपनी की पूरी हिस्सेदारी बेचे जाने की सिफारिश के बाद संसद से मंजूरी लेना महज औपचारिकता मात्र है.

भारत के पूर्व-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, फोटो सोर्स: गूगल
भारत के पूर्व-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, फोटो सोर्स: गूगल

यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है

इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की गठबंधन (NDA) सरकार में इस तरह की योजना लाई गई थी. उस समय यह योजना बनाई गई थी कि HPCL की 51.1 फीसदी हिस्सेदारी में से सरकार 34.1 फीसदी हिस्सेदारी निजी कंपनियों को बेचा देगी. हालांकि तब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी.

उस समय रिलायंस इंडस्ट्रीज के अलावा ब्रिटेन की BPPLC, कुवैत पेट्रोलियम, मलेशिया की पेट्रोनास जैसी कंपनियों ने इसे खरीदने में इंट्रेस्ट था.

यह समझने की जरूरत है कि प्राइवेट सेक्टर के निवेश के बाद चीजें बेहतर हो जाती हैं. उससे कई सहूलियतें भी मिलती हैं. लेकिन, इन सबके बाद चीजों के दाम भी आसमान छूने लगते हैं. बिना लोगों की पर्चेज़िंग पावर को बढ़ाए अगर सरकार निजीकरण पर जोर देती हैं तो, इसका सीधा असर लोगों की जेबों पर पड़ेगा. वैसे भी आज देश में नौकरियों की क्या हालत है यह किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में पब्लिक सेक्टर्स की कंपनियाँ ही हैं जिन्होंने लोगों को कुछ राहत दे रखी हैं. अगर इन कंपनियों का भी निजीकरण हो जाएगा तो गिरती हुई GDP और बढ़ती हुई महंगाई में से GDP सुधर जाएगी, सरकार की खामियों वाली लिस्ट थोड़ी कम हो जाएगी. पर इन सबमें हमेशा की तरह एक चीज रह जाएगी, महंगाई.

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