‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी. लगता है हमारे देश में इसी को फॉलो भी किया जा रहा है. आज के समाज में कमजोर लोगों को दबाने की मानो प्रथा सी चल पड़ी है. कहीं भी अगर भीड़ ने एक या दो लोगों को घेर लिया तो ऐसा कम ही देखने को मिला है कि वह एक व्यक्ति भीड़ से सुरक्षित बाहर आया हो. शासन-प्रशासन भी  भीड़ से काफी डरता है तभी तो, अगर केस भी उस भीड़ के खिलाफ होता है तब भी उस भीड़ में से एक या दो लोगों को सज़ा होती है और वो भी कुछ दिनों में छूट कर बाहर आ जाते हैं. कुछ साल पहले ऐसे ही एक भीड़ ने अखलाक को पीट-पीट कर मार डाला था बस इस शक पर कि उसके घर में गाय का मांस रखा हुआ था.

पहले अखलाक और उनका पूरा परिवार बिसाद में रहते थे पर अखलाक की हत्या के बाद उन्हे अपना गाँव छोड़ कर जाना पड़ा और सरकार ने उन्हें एक घर दिया. गौतमबुद्ध नगर के ब्लॉक ऑफिसर ने बताया कि वे कई महीने से अपने गाँव में नहीं रह रहे हैं. अखलाक के भाई जान मोहम्मद ने बताया कि इतने सालों में पहली बार ऐसा हुआ है कि उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर वोट देना पड़ा. इससे पहले खबर आई थी कि अखलाक के परिवार वालों का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है. ब्लॉक ऑफिसर ने बताया कि वह काफी दिनों से घर में नहीं थे जिसके वजह से उनका नाम लिस्ट से हटा दिया गया है. अखलाक के परिवार वालों ने अपना वोट इस बार दादरी में दिया था.

अखलाक का बेटा सरताज फोटो सोर्स गूगल

2015 के घटना के बाद डर से उन्होनें अपना गाँव छोड़ दिया था. अखलाक का 20 लोगों का परिवार है जो अब दादरी में रहता है. मोहम्मद ने मीडिया को बताया –

“हमने एक ऐसे उम्मीदवार को वोट दिया, जिसे हम मानते हैं, जिससे समाज के सभी वर्गों का विकास सुनिश्चित हो सके. मैं आज उदास था. मुझे अपने गाँव की याद आती है जहाँ मैं पैदा हुआ था और 40 साल तक रहा. गाँव में अभी भी हमारे घर हैं. मैंने सात अन्य पारिवारिक सदस्यों के साथ आज दादरी के एक मतदान केंद्र पर मतदान किया.”

इस पूरे मामले को जानने के बाद ये साफ हो जाता है कि न्याय से बड़ी भीड़ और उससे भी ऊंचे वो लोग हैं जो इस पूरी व्यवस्था को अपनी हाथ की कठपुतलियाँ बना कर रखे हैं. आज भी दोषी सिर्फ दोषी रह गए हैं. अभी तक उनपर हत्यारे का टैग नहीं लगा है. इस पूरे केस में भुक्तभोगी कौन हुआ? गलत भीड़ थी सज़ा किसे मिली? कार्यवाही भीड़ पर होनी चाहिए थी पर घर किसे छोड़ना पड़ा?

 

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